जितिया की व्रत कथा जीमूतवाहन की कथा है — वह विद्याधर राजकुमार, जो डरे हुए नाग बालक की जगह ख़ुद गरुड़ की शिला पर जाकर लेट गया, और जिसकी दया ने गरुड़ का मन बदल दिया। इसके साथ माताएँ चील और सियारिन की लोककथा भी सुनाती हैं, दो सहेलियाँ जिन्होंने एक साथ जितिया रखा, पर एक ने सच्चे मन से निभाया और दूसरी ने केवल दिखावे के लिए।
व्रत का दिन, उससे पहले का नहाय-खाय और पारण की सुबह जितिया की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और आपके शहर में अष्टमी कब लगती और उतरती है, यह पंचांग में देखा जा सकता है। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
जीमूतवाहन की कथा
बहुत पुरानी बात है। आकाश में रहने वाले विद्याधरों के राजा थे जीमूतकेतु। उनका बेटा जीमूतवाहन बचपन से ही बड़ा कोमल मन का था। दूसरे राजकुमार चीज़ें जुटाते, वह बाँट देता। बड़ा हुआ तो राज-पाट से ज़्यादा उसका मन बूढ़े माँ-बाप की सेवा में लगता था। आख़िर उसने राज्य अपने भाई-बंधुओं को सौंप दिया और माता-पिता को लेकर मलय पर्वत के जंगलों में सादा जीवन जीने चला गया।
वहीं उसका ब्याह उस देश की राजकुमारी मलयवती से हुआ, और कुछ समय सुख-शांति से बीता। एक दिन घूमते-घूमते वह समुद्र के किनारे जा पहुँचा। वहाँ किसी स्त्री के रोने की आवाज़ आ रही थी। पास जाकर देखा तो एक नागमाता अपने बेटे को छाती से लगाए बैठी थी, जैसे अब कभी छोड़ेगी ही नहीं।
जीमूतवाहन ने पूछा, माँ, क्या हुआ? उसने बताया कि विष्णु जी के वाहन गरुड़ से नागों का पुराना बैर है। गरुड़ कहीं सारे नागों का नाश न कर दें, इसलिए नागों ने उनसे समझौता किया था कि हर दिन एक नाग अपने आप समुद्र-तट की एक चौड़ी शिला पर पहुँचा दिया जाएगा। आज उसके बेटे की बारी थी। बेटे का नाम शंखचूड़ था, और वही उसकी इकलौती संतान थी।
राजकुमार ने ज़्यादा सोच-विचार नहीं किया। बोला, माँ, बेटे को घर ले जाओ, आज शिला पर मैं जाऊँगा। शंखचूड़ पहले राज़ी नहीं हुआ; उसे यह मंज़ूर नहीं था कि उसकी जगह कोई और मरे। वह समय आने से पहले पास के एक देवस्थान में प्रार्थना करने चला गया। इसी बीच जीमूतवाहन ने वह लाल वस्त्र ओढ़ लिया जो गरुड़ के भोजन की पहचान था, और चुपचाप शिला पर लेट गया।
आकाश से गरुड़ उतरे, उसे पंजों में दबाया और एक पहाड़ की चोटी पर ले गए। पर चोंच मारते ही उन्हें कुछ अजीब लगा। जिसे वे पकड़े हुए थे, वह न छटपटाता था, न चीख़ता था। वह शांत पड़ा था, जैसे कोई भेंट दे रहा हो। गरुड़ रुक गए और पूछा, तुम कौन हो? तुम नाग तो नहीं लगते।
उसी समय शंखचूड़ हाँफता हुआ पहाड़ पर चढ़ आया और पुकारने लगा कि आपने ग़लत प्राणी पकड़ लिया है, बारी तो मेरी थी। गरुड़ ने दोनों को देखा और सारी बात समझ गए: इस परदेसी ने अपना शरीर इसलिए दे दिया था कि एक माँ का बेटा बच जाए।
गरुड़ लज्जित हो गए। उन्होंने जीमूतवाहन से पूछा, बताओ, मैं इसका क्या प्रायश्चित करूँ? राजकुमार ने बस इतना माँगा कि आज के बाद आप किसी नाग के प्राण न लें। गरुड़ ने वचन दे दिया। ज़्यादातर कहने वाले आगे बताते हैं कि गरुड़ अमृत ले आए, जीमूतवाहन के घाव भर दिए और पहले जिन नागों को ले गए थे, उन्हें भी जीवित कर दिया। राजकुमार अपने घर लौट आया, और नागमाता को उसका बेटा वापस मिल गया।
इसीलिए जितिया के दिन माताएँ जीमूतवाहन को पूजती हैं। वे उस रक्षक के रूप में याद किए जाते हैं जो बिना किसी नाते के एक बच्चे और मौत के बीच खड़ा हो गया। व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका भी इसी कामना से है कि संतान जीती रहे, फले-फूले।
चील और सियारिन की कथा
दूसरी कथा गाँव-घर की है। एक नदी किनारे पाकड़ का एक बड़ा पेड़ था। उसकी डाल पर एक चील रहती थी और जड़ के पास की खोह में एक सियारिन। दोनों में गहरी दोस्ती थी।
एक बार अष्टमी आई तो दोनों ने देखा कि पास के गाँव की औरतें जितिया की तैयारी कर रही हैं: नहा-धोकर नहाय-खाय का खाना बना रही हैं, और फिर पूरे दिन-रात के लिए अन्न-जल छोड़ रही हैं। दोनों सहेलियों ने भी तय किया कि हम भी व्रत रखेंगी, और सुबह तक मुँह में कुछ नहीं डालेंगी।
चील ने अपनी बात रखी। लंबा दिन और उससे भी लंबी रात वह अपनी डाल पर चुपचाप बैठी रही। अँधेरा होते ही सियारिन को भूख सताने लगी। जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा, वह धीरे से नदी किनारे खिसक गई, वहाँ जो मिला खा लिया, और ऐसे लौट आई जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कथा कहती है कि अगले जन्म में दोनों एक सेठ के घर बहनें बनकर पैदा हुईं। बड़ी, जो पिछले जन्म में चील थी, बहुत-सी कथाओं में शीलवती कहलाती है; छोटी, जो सियारिन थी, कपूरवती। शीलवती का ब्याह मंत्री के बेटे से हुआ, और उसके बच्चे उसकी आँखों के सामने हँसते-खेलते बड़े हुए। कपूरवती राजघराने में ब्याही गई, पर उसकी गोद बार-बार सूनी रह गई। दुख धीरे-धीरे जलन में बदल गया और उसने बहन के बेटों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। पर वह षड्यंत्र विफल हुआ: कथा में सातों बेटे सही-सलामत घर लौट आए, और कहने वाली कहती हैं कि उनकी रक्षा स्वयं जीमूतवाहन ने की।
आख़िर शीलवती को पिछला जन्म याद आया। वह बहन को उसी नदी किनारे वाले पेड़ के पास ले गई और उसे वह व्रत याद दिलाया जो दोनों ने साथ रखा था, और वह रात भी, जब सियारिन ने छिपकर खा लिया था। कपूरवती की आँखें खुल गईं, वह फूट-फूटकर रोई, और नरम कथाओं में दोनों बहनों में मेल हो गया और छोटी ने उसके बाद पूरे मन से जितिया रखा।
कथा को शांत मन से समझें
यह लोककथा है, और अपनी बात कहने के लिए यह माँ के सबसे पुराने डर का सहारा लेती है। इसका यह अर्थ नहीं कि किसी एक दिन माँ के खाने-पीने पर बच्चे का जीवन टिका है; व्रत में माँ के पानी पी लेने से आज तक किसी बच्चे का कुछ नहीं बिगड़ा। कथा असल में वचन निभाने का आदर करती है, और इसका अंत सज़ा में नहीं, पहचान और मेल-मिलाप में होता है। गर्भवती, दूध पिलाने वाली, बीमार और बुज़ुर्ग माताएँ हमेशा से हल्का जितिया रखती आई हैं, और डॉक्टर की राय हर रिवाज से पहले है।
कथा के दूसरे रूप
- कथा की भूमिका। कुछ पुस्तिकाओं में शिव जी पार्वती जी को यह कथा सुनाते हैं, कुछ में कोई ऋषि स्त्रियों की सभा में। गाँव-गाँव में यह शुरुआत बदल जाती है।
- मलयवती। हर्ष के संस्कृत नाटक नागानंद में जीमूतवाहन की पत्नी मलयवती की बड़ी भूमिका है; व्रत की कथा में प्रायः उनका नाम भर आता है।
- बहनों का अंत। कुछ गाँवों में छोटी बहन पिछला जन्म याद आते ही पछतावे में प्राण छोड़ देती है; बहुत-से घरों में उसे क्षमा मिल जाती है। हमने यही नरम अंत लिया है, जो भी ख़ूब कहा जाता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
मुख्य व्रत वाले दिन शाम को घर या टोले की माताएँ आँगन में खोदे गए छोटे-से गड्ढे या पोखरी के चारों ओर, या किसी नीची चौकी के पास बैठती हैं। बीच में कुश के जीमूतवाहन रखे जाते हैं और पास में मिट्टी या गोबर से बनी चील और सियारिन। कोई बड़ी-बूढ़ी दोनों कथाएँ कहती हैं और बाक़ी हाथ में फूल या अक्षत लेकर सुनती हैं। बहुत-से घरों में कथा के बाद लाल-पीला जितिया धागा पहना जाता है। तीनों दिनों का पूरा क्रम जितिया पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
जो माताएँ जितिया रखती हैं, उनके लिए यह साल का सबसे कठिन व्रत होता है, और कथा उस भूख-प्यास को एक अर्थ देती है। माताओं के पर्व का नायक एक ऐसा युवक है जो किसी का पिता भी नहीं था — यही इसकी सुंदरता है: उसने पराई माँ के बेटे को अपना समझा। आज बहुत-सी माताएँ यह व्रत बेटे और बेटी दोनों के लिए रखती हैं।
आगे चलकर उत्तर भारत की माताएँ संतान के लिए अहोई अष्टमी रखती हैं, और पूरब के यही घर जल्द ही छठ की तैयारी में लग जाते हैं। शाम की पूजा अच्छे समय में शुरू करनी हो तो अपने शहर का चौघड़िया देख लें।