शीतला अष्टमी, यानी बसौड़ा, में खाना एक शाम पहले बनाया जाता है और अष्टमी की सुबह वही ठंडा भोजन ठंडे जल, हल्दी और फूलों के साथ शीतला माता को चढ़ाया जाता है। संक्षेप में: सप्तमी को रसोई करें, अष्टमी को रिवाज के अनुसार चूल्हा ठंडा रखें, माता और नीम की जल से पूजा करें, कथा सुनें, और पूरा परिवार मिलकर बासी भोजन करे।
आपके शहर में यह किस दिन है, यह शीतला अष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है; ज़्यादातर परिवार सूर्योदय के समय की अष्टमी देखते हैं, जो पंचांग में मिल जाती है। समय यहाँ नहीं लिखे गए, क्योंकि वे हर शहर में अलग होते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
सप्तमी की शाम बनने वाला बासी भोग:
- मीठे चावल (गुड़ या चीनी वाले), या दही-भात
- पूरी, और राजस्थान में बाजरे की रोटी या पुए
- रबड़ी या गाढ़ा मीठा दूध
- गुलगुले (आटे और गुड़ के मीठे पकौड़े) या मालपुए
- दही, रायता, और ऐसी सूखी सब्ज़ी जो रात भर ठीक रहे
- कुछ घरों में पकौड़ी, कढ़ी या हलवा
पूजा के लिए:
- ठंडे जल का लोटा, और नीम के लिए जल का छोटा पात्र
- हल्दी, रोली या कुमकुम, अक्षत, मेहंदी, कुछ फूल
- मौली
- दीया केवल तभी, जब घर की रीति में हो; बहुत-से घरों में इस दिन दीया नहीं जलता
- शीतला माता का चित्र, या माता के थान पर जाना
- नीम की पत्तियाँ
पूजा का क्रम
- सप्तमी की रसोई। एक शाम पहले रसोई साफ़ करके अगले दिन का खाना बनाएँ। माता के भोग का हिस्सा अलग ढककर रख दें। बहुत-से घरों में इसके बाद चूल्हा धोकर-पोंछकर ठंडा छोड़ दिया जाता है।
- अष्टमी का स्नान। सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहाएँ, जैसा इस दिन बहुत-से घरों में होता है, और साफ़ कपड़े पहनें।
- थाली सजाएँ। हर व्यंजन का थोड़ा-थोड़ा थाली में रखें, साथ में जल का लोटा, हल्दी, रोली, अक्षत, फूल, मौली और मेहंदी।
- माता का पूजन। घर पर साफ़ कपड़े पर माता का चित्र रखें, या थाली लेकर गाँव-मोहल्ले के थान पर जाएँ, जो अक्सर नीम के नीचे सिंदूर लगा एक पत्थर भर होता है। माता के आगे ठंडा जल चढ़ाएँ, हल्दी-रोली लगाएँ, अक्षत, फूल और मेहंदी चढ़ाएँ, मौली बाँधें और ठंडा भोजन भोग में रखें। माता की सवारी गधे को भी याद करें, जो उनके साथ बना रहता है।
- नीम। नीम की जड़ में जल डालें और वहाँ भी थोड़ी हल्दी-रोली चढ़ाएँ। बहुत-से लोग चढ़ाए जल की एक बूँद आँखों से लगाते हैं।
- कथा। साथ बैठकर शीतला अष्टमी व्रत कथा सुनें, बूढ़ी माई और कुम्हारिन वाली। कुछ लोग शीतलाष्टक का पाठ भी करते हैं।
- प्रार्थना। अपने शब्दों में घर के सबके स्वास्थ्य की, ख़ासकर बच्चों की, प्रार्थना करें।
- घर लौटकर। बहुत-से घरों में चढ़ाया हुआ थोड़ा जल घर में छिड़का जाता है, और कुछ लोग दरवाज़े पर हल्दी के हाथ का छापा लगाते हैं। फिर पूरा परिवार बासी भोजन करता है।
समय कैसे देखें
शाम के किसी मुहूर्त का इंतज़ार नहीं करना होता; पूजा सुबह-सुबह अष्टमी तिथि में होती है। सूर्योदय की तिथि पंचांग में देखें। जो लोग भीड़ वाले मंदिर जाते हैं, वे कभी-कभी सुबह का अच्छा समय चौघड़िया से चुनते हैं। अष्टमी छोटी हो या दो सूर्योदयों में फैली हो, तो दिन कैसे तय होता है, यह तिथि वाले पृष्ठ पर समझाया गया है।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं। आपके घर की रीति सबसे पहले है।
- अष्टमी को रसोई में आग नहीं, केवल एक दिन पहले बना भोजन।
- एक दिन पहले रसोई और घर झाड़ा-धोया जाता है, और झाड़ू को माता के चिह्नों में से एक मानकर उसका आदर किया जाता है।
- कुछ घरों में उस दिन कपड़े नहीं धोए जाते और सिर नहीं धोया जाता।
- बासी भोजन पड़ोसियों, रिश्तेदारों और ज़रूरतमंदों में बाँटा जाता है, और थोड़ा गधे या गाय को भी दिया जाता है।
- छोटे बच्चे, बीमार और बुज़ुर्ग वही खाएँ जो उन्हें ठीक बैठे, और जिसे गरम करना हो वह गरम किया जाए; माता स्वास्थ्य की देवी हैं, कष्ट की नहीं।
- कुछ परिवारों में नई बहू या नवजात शिशु की माँ का पहला बसौड़ा विशेष ध्यान से मनाया जाता है।
सेहत की बात
पुराने समय में चेचक और दानों वाले बुख़ार में माता से प्रार्थना होती थी। चेचक अब टीकों से मिट चुकी है, और आज कोई भी बुख़ार या दाने हों तो डॉक्टर को दिखाएँ; बच्चों के टीके ही वह असली रक्षा हैं जो पुरानी प्रार्थनाएँ माँगती थीं। रात भर रखा खाना ढककर ठंडी जगह रखें, और जिसमें गंध आ जाए वह न खाएँ।
प्रांतों के अपने ढंग
- राजस्थान: बसौड़ा वसंत के सबसे बड़े दिनों में है। जयपुर के पास चाकसू के शीतला माता मंदिर के मेले में बड़ी भीड़ जुटती है, और बहुत-से कस्बों में मेले लगते हैं। बाजरे की रोटी, रबड़ी और केर-सांगरी ठंडे भोजन का हिस्सा होते हैं।
- गुजरात: शीतला सातम गुजराती पंचांग से श्रावण की कृष्ण सप्तमी को आती है। उससे एक दिन पहले रांधण छठ होती है, जब सारा खाना पहले से बना लिया जाता है; सातम को चूल्हा आराम करता है और परिवार ठंडा खाना खाता है।
- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश: घर की रीति के अनुसार बहुत-से परिवार सप्तमी या अष्टमी को बसौड़ा मनाते हैं; पूरी, गुलगुले और मीठे चावल बनते हैं, और औरतें टोली में माता के थान पर जाती हैं।
- हरियाणा और दिल्ली: गुरुग्राम के शीतला माता मंदिर में इस मौसम में भारी भीड़ रहती है, और बहुत-से परिवार वहाँ बच्चों का मुंडन कराते हैं।
पूजा के बाद
भोग बाँटें। बसौड़ा से पहले का त्योहार होली है; प्रह्लाद की कथा होलिका दहन की कथा में पढ़ें, और माताओं की एक और अष्टमी के लिए अहोई अष्टमी देखें।