वट सावित्री की पूजा बरगद के पेड़ की पूजा है, जो सुहागिनें सावित्री और सत्यवान की याद में व्रत रखकर दिन के पहले हिस्से में करती हैं। संक्षेप में: नहाकर संकल्प लें, थाली लेकर बरगद के पास जाएँ, जल, रोली, फूल, भीगे चने और फल चढ़ाएँ, परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटें, पेड़ को पंखा झलें, कथा सुनें और बड़ों के पैर छुएँ।
उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को होता है; महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण में लगभग पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में। दोनों दिन वट सावित्री की तिथि वाले पृष्ठ पर हैं। यहाँ पेड़ के नीचे होने वाली पूजा का क्रम है।
पूजा सामग्री
- पूजा की थाली, जल से भरा लोटा, और घर की रीति हो तो छोटा कलश
- कच्चा सूत, सफ़ेद या पीला, जितने फेरे लगाने हों उतना; कुछ घरों में मौली
- रोली, हल्दी, सिंदूर, अक्षत और चंदन
- रात भर भिगोए काले चने; कई घरों में थोड़े अंकुरित भी
- मौसम के फल, उत्तर भारत में अक्सर आम, लीची या जामुन
- फूल, माला और दूब
- बाँस या ताड़ के पत्ते का पंखा, पेड़ को झलने के लिए, और कई घरों में बाद में पति को झलने के लिए
- घी का दीया और धूप
- पूड़ी, मीठे पुए या गुलगुले, और घर में जो पकवान बनता हो उसका भोग
- सावित्री-सत्यवान की छोटी मूर्तियाँ या चित्र, यदि घर में पेड़ के साथ उनकी भी पूजा होती है
- चढ़ाने या देने को सुहाग का सामान: चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, लाल कपड़ा
- सास के लिए बायना: फल, चने, कपड़े और मिठाई से भरी टोकरी
पूजा का क्रम
- स्नान और संकल्प। सुबह जल्दी नहाकर सुहागिन की तरह पूरा श्रृंगार करें; बहुत-सी महिलाएँ लाल या शादी वाली साड़ी पहनती हैं। दाएँ हाथ में जल लेकर अपने शब्दों में कहें कि आप पति की लंबी आयु और परिवार के कुशल के लिए वट सावित्री का व्रत रख रही हैं। जल धरती पर छोड़ दें।
- थाली सजाएँ। रोली, चावल, फूल, भीगे चने, फल, सूत, पंखा और दीया थाली में रखें, और लोटे में जल भर लें।
- बरगद के पास जाएँ। अक्सर मोहल्ले की औरतें मिलकर पास के या मंदिर वाले बरगद तक जाती हैं। जड़ के पास थोड़ी जगह साफ़ कर लें। सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या चित्र हो तो वहीं रखें।
- पहले गणेश जी। थोड़ी रोली, अक्षत और एक फूल से गणेश जी का स्मरण करें।
- पेड़ की पूजा। जड़ में जल चढ़ाएँ। तने पर रोली और हल्दी लगाएँ, अक्षत, फूल, माला, भीगे चने, फल और मिठाई चढ़ाएँ। दीया और धूप जलाएँ।
- सूत लपेटें। कच्चे सूत का सिरा तने से लगाकर पेड़ की परिक्रमा करें, घड़ी की सुई की दिशा में, और चलते-चलते सूत तने पर लिपटता जाए। सात फेरे सबसे आम हैं; बहुत-से घरों में एक सौ आठ। कुछ महिलाएँ हर फेरे पर एक चना या दाना चढ़ाती हैं।
- पंखा झलें। बाँस के पंखे से बरगद को कुछ बार हवा करें, जैसे कहते हैं सावित्री ने गर्मी में सत्यवान को झला था।
- कथा सुनें। छाँव में बैठकर, हाथ में कुछ दाने लेकर वट सावित्री व्रत कथा सुनें, जिसमें सावित्री, सत्यवान और यमराज की कहानी है। बाद में दाने जड़ पर चढ़ा दें।
- आरती और आशीर्वाद। आरती करें। वहाँ मौजूद बड़ी महिलाओं के पैर छुएँ और सास को बायना दें। बहुत-सी औरतें एक-दूसरे की माँग में सिंदूर भरती हैं।
- घर लौटकर। घर आकर बहुत-सी महिलाएँ पति को पंखा झलती हैं और उनके पैर छूती हैं, और पति उन्हें कोई छोटी-सी भेंट देते हैं। इसके बाद घर की रीति के अनुसार व्रत खुलता है।
समय कैसे देखें
बरगद की पूजा परंपरा से मध्याह्न से पहले या उसके आस-पास होती है, यानी दिन के बीच वाले हिस्से में। व्रत का दिन भी वही चुना जाता है जिस दिन मध्याह्न में अमावस्या हो, या वट पूर्णिमा के लिए पूर्णिमा हो; यह गणना तिथि वाले पृष्ठ पर की गई है। सुबह के भीतर शुभ समय में शुरुआत चाहें तो अपने शहर का चौघड़िया देखें और राहु काल छोड़ दें। जेठ की धूप तेज़ होती है, इसलिए जल्दी पूजा कर लेना सबके लिए आरामदेह रहता है।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की रीति सबसे पहले है।
- कुछ महिलाएँ पूजा तक निर्जल रहती हैं, बहुत-सी जल और फल लेती हैं; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग महिलाएँ डॉक्टर की सलाह के अनुसार खाती-पीती हैं।
- पूजा के बाद पहला आहार अक्सर भीगे चने होते हैं, जिन्हें पानी के साथ साबुत निगला जाता है।
- सूत पेड़ पर ही छोड़ दिया जाता है, खोला नहीं जाता।
- बहुत-से घरों में विवाह के बाद की पहली वट सावित्री पर मायके से सामान आता है।
- कुछ परिवार त्रयोदशी से अमावस्या या पूर्णिमा तक तीन दिन का व्रत रखते हैं, जैसे कथा में सावित्री ने तीन दिन व्रत रखा था।
- कुँवारी लड़कियाँ कभी-कभी बिना व्रत के पूजा में शामिल हो जाती हैं।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश: ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री; बरगद के नीचे औरतों की टोलियाँ, भीगे चने और पंखा। बिहार में पंखे और मौसमी फलों का खास महत्त्व है, और मैथिल परिवार इसे बड़े मन से रखते हैं। अमांत पंचांग में यही अमावस्या वैशाख अमावस्या कहलाती है।
- महाराष्ट्र और गोवा: ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा। नौवारी या त्योहारी साड़ियों में महिलाएँ बरगद के पास जुटती हैं, सूत बाँधती हैं, पाँच फल चढ़ाती हैं और आपस में वाण यानी छोटी-छोटी भेंटें बदलती हैं।
- गुजरात: यहाँ भी वट पूर्णिमा, व्रत और बरगद की पूजा के साथ, अक्सर तीन दिन तक।
- ओडिशा: अमावस्या को सावित्री व्रत, जो ज़्यादातर घर पर सावित्री की प्रतिमा और मौसमी फलों की थाली के साथ होता है।
- दक्षिण भारत: कुछ समाजों में पूर्णिमा को, वट पूर्णिमा के रूप में।
पूजा के बाद
चने, फल और मिठाई प्रसाद में बाँटें। घर पर बरगद की टहनी पूजी हो तो दिन बीतने पर उसे गमले में लगा दें या साफ़ पानी में रख दें। संकल्प की एक और कथा हरतालिका तीज व्रत कथा में है, और पति की लंबी आयु के लिए कार्तिक का व्रत करवा चौथ व्रत कथा में।