मंगला गौरी व्रत कथा सेठ धर्मपाल की कहानी है, जिनके घर संतान नहीं थी और जिन्हें गौरी माता ने बेटा तो दिया, पर यह भी बता दिया कि उसकी आयु छोटी है। उस बेटे का ब्याह मंगला से हुआ, जिसकी माँ बरसों से सावन के मंगलवार को गौरी का व्रत रखती आई थीं, और उसी व्रत की छाया ने लड़के को उसके भाग्य से बचा लिया।
यह व्रत सावन के हर मंगलवार को रखा जाता है। सावन का महीना कब से कब तक है, उत्तर भारत की गिनती से भी और अमांत गिनती से भी, यह सावन सोमवार वाले पृष्ठ पर दिया है; उसी महीने के मंगलवार इस व्रत के दिन हैं। इसी मौसम में हरियाली तीज भी आती है। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
सेठ धर्मपाल की कथा
एक बड़े व्यापारी नगर में धर्मपाल नाम के सेठ रहते थे। गोदाम अनाज और कपड़े से भरे रहते, दूर-दूर तक उनकी गाड़ियाँ जातीं और बाज़ार में उनकी बात का मान था। फिर भी घर का आँगन सूना था। सेठ-सेठानी के कोई संतान नहीं थी, और जैसे-जैसे बरस बीतते गए, यह सूनापन किसी भी घाटे से ज़्यादा भारी लगने लगा।
दोनों दान-पुण्य करते, साधु-संतों को भोजन कराते और बड़ों के बताए व्रत रखते। एक दिन द्वार पर एक जोगी भिक्षा माँगने आया। सेठानी ने भिक्षा दी, और जोगी ने उसकी आवाज़ में छिपा दुख पहचान लिया। उसने कहा, "माँ गौरी की शरण लो। जो माँगना है, उन्हीं से माँगो।" सेठ-सेठानी ने यही किया। रोज़ मन लगाकर गौरी की पूजा की, और आख़िर माता प्रसन्न हुईं।
कुछ कहानियों में माता सपने में आती हैं, कुछ में पूजा करती सेठानी के सामने प्रकट होती हैं। उन्होंने पूछा, "क्या चाहिए?" दोनों ने हाथ जोड़कर कहा, "एक बेटा।" माता ने बड़े स्नेह से कहा कि बेटा मिलेगा, पर उसकी आयु लंबी नहीं है। ज़्यादातर घरों में कहा जाता है कि उसकी उम्र सोलह बरस लिखी थी, और कई जगह यह भी जोड़ते हैं कि उसका कारण एक साँप बनेगा। सेठ-सेठानी ने यह वरदान भी सिर माथे लिया। उन्होंने सोचा, थोड़े दिन का ही सही, बच्चा तो घर में खेलेगा; आगे की चिंता माता पर छोड़ दी।
बेटा हुआ तो घर में फिर से रौनक लौट आई। लड़का पढ़ने-लिखने में तेज़ और स्वभाव का सीधा निकला। पर जैसे-जैसे सोलहवाँ बरस पास आया, माँ-बाप की नींद उड़ गई। उन्होंने कुल-पुरोहित से सलाह ली। पुरोहित ने कहा, "ऐसी बहू ढूँढिए जिसके घर पर गौरी माता की कृपा हो।"
मंगला और उसकी माँ का व्रत
दूसरे नगर में एक स्त्री रहती थीं जो बरसों से सावन के मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत रखती थीं। हर मंगलवार भोर में नहातीं, चौकी पर गौरी को बिठातीं, हर चीज़ सोलह-सोलह चढ़ातीं और माता की कथा सुनतीं। उनकी बेटी का नाम मंगला था। मोहल्ले की औरतें कहती थीं कि ऐसी माँ की बेटी का सुहाग कभी सूना नहीं होगा।
सेठ के घर तक यह बात पहुँची तो रिश्ता भेजा गया। बात पक्की हुई, और गीत-मंगल के साथ सेठ के बेटे और मंगला का ब्याह हो गया।
जिस दिन का डर था, वह ब्याह के कुछ ही समय बाद आ गया। जिन कहानियों में साँप आता है, उनमें वह रात को कमरे में घुसता है और सोते हुए दूल्हे की ओर बढ़ता है। मंगला जाग रही थी। उसने न चीख़ मारी, न भागी। उसने साँप के रास्ते में दूध का कटोरा रख दिया, कहीं-कहीं कहते हैं कि एक घड़ा रख दिया, और बैठकर गौरी माता का नाम लेती रही। साँप दूध पीकर लौट गया, या घड़े में जाकर बैठ गया और सुबह उसे दूर छोड़ दिया गया। पति को पता भी नहीं चला कि रात में क्या हुआ।
कुछ घरों में साँप की बात ही नहीं आती। वहाँ कहते हैं कि सोलहवें बरस के पास लड़का बीमार पड़ा, मंगला रात भर सिरहाने बैठी माता को याद करती रही, और सुबह होते-होते संकट टल गया। अंत हर कहानी में एक-सा है। गौरी माता प्रकट होकर कहती हैं कि मंगला की माँ के व्रत और मंगला की अपनी आस्था ने लिखा हुआ बदल दिया है। सेठ का बेटा लंबी उम्र जीता है, घर में आनंद होता है, और मंगला ख़ुद भी सावन के मंगलवार का व्रत उठा लेती है, ताकि यह आशीर्वाद उसकी बेटियों तक पहुँचे।
कथा को शांत मन से समझें
बहुत-सी व्रत कथाओं की तरह यह कहानी भी छोटी आयु और डर भरी रात के सहारे अपनी बात कहती है। इसे लोककथा की तरह सुनें, किसी के असली स्वास्थ्य या भविष्य की भविष्यवाणी की तरह नहीं। किसी परिवार का कुशल-मंगल इस पर नहीं टिका कि बहू ने व्रत रखा या नहीं। कथा जो सँभालकर रखती है, वह कोमल चीज़ है: माँ की वह फ़िक्र जो बेटी के साथ ससुराल तक जाती है, घबराने की जगह धीरज रखने वाली बहू, और यह भरोसा कि आस्था कठिन भाग्य को भी नरम कर सकती है। जो बहुएँ अस्वस्थ या गर्भवती हैं, वे फल और दूध लेकर मंगलवार रखती हैं, और परंपरा में इसकी हमेशा जगह रही है।
कथा के दूसरे रूप
- शिव जी पार्वती को सुनाते हैं। कुछ पुस्तिकाओं में शुरुआत यह होती है कि शिव जी पार्वती को, या श्रीकृष्ण द्रौपदी को, इस व्रत के बारे में बताते हैं, और सेठ की कहानी उसके भीतर आती है।
- जोगी की परीक्षा। एक रूप में जोगी निःसंतान घर से भिक्षा नहीं लेता, तो सेठानी चुपके से उसके पात्र में सोना डाल देती है। जोगी इस छल से नाराज़ तो होता है, फिर भी गौरी की राह बता देता है। घरों में यह हिस्सा हल्के ढंग से कहा जाता है, कि माता के पास सीधे मन से जाना चाहिए।
- महाराष्ट्र की मंगळागौर। मराठी परिवारों में सावन के यही मंगलवार नई बहुओं की मंगळागौर कहलाते हैं। वहाँ कथा अक्सर छोटी होती है और पूजा के बाद रात भर के खेल और गीत ज़्यादा बड़ी जगह लेते हैं।
कथा कैसे सुनी जाती है
सावन के हर मंगलवार की पूजा के बीच कथा होती है। गौरी माता को स्नान, वस्त्र और सोलह-सोलह चीज़ें चढ़ जाने के बाद बहू हाथ में थोड़े अक्षत लेकर बैठती है। अक्सर सास या बुआ छोटी पुस्तिका से पढ़ती हैं; कई गलियों में आस-पास की नई ब्याहताएँ एक घर में इकट्ठी होती हैं और उनमें से कोई एक पढ़ती है। कथा ख़त्म होने पर अक्षत माता के चरणों में चढ़ा दिए जाते हैं, फिर आरती होती है।
मंगलवार की पूजा का पूरा क्रम, सोलह-सोलह की सामग्री और उद्यापन की बात मंगला गौरी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
बहुत-सी लड़कियों के लिए यह व्रत ससुराल में उनका पहला साल होता है। सावन के मंगलवार नई सहेलियाँ बनाने, श्रृंगार दिखाने और बड़ी औरतों की बातें सुनने का बहाना बन जाते हैं। कथा माँ-बेटी के रिश्ते की वह बात भी कहती है जिसे हर घर पहचानता है: बेटी के विदा हो जाने के बाद भी माँ की दुआ उसके साथ चलती रहती है।
इसी महीने के सोमवारों की कथा सोलह सोमवार व्रत कथा में है, और गौरी के इसी प्रेम से जुड़ा भादों का कठिन व्रत हरतालिका तीज की कथा में। मंगलवार की पूजा सुबह के शांत समय में शुरू करनी हो तो अपने शहर का चौघड़िया और उस दिन का राहु काल देख लें।