मंगला गौरी व्रत सावन के हर मंगलवार को गौरी माता की पूजा और उपवास है, जिसे ज़्यादातर नई बहुएँ विवाह के बाद पहले पाँच साल रखती हैं। संक्षेप में: नहाकर संकल्प लें, चौकी पर गौरी को बिठाएँ, सोलह श्रृंगार और हर चीज़ सोलह-सोलह चढ़ाएँ, सोलह बत्ती का दीया जलाएँ, कथा सुनें, आरती करें, और आख़िरी साल उद्यापन करके व्रत पूरा करें।
व्रत के दिन सावन के मंगलवार हैं। सावन कब शुरू होकर कब ख़त्म होता है, पूर्णिमांत गिनती से भी और महाराष्ट्र-गुजरात की अमांत गिनती से भी, यह सावन सोमवार पृष्ठ पर है। इसी महीने का गौरी पर्व हरियाली तीज अलग पृष्ठ पर है। यहाँ मंगलवार की पूजा का क्रम है।
पूजा सामग्री
- लकड़ी की छोटी चौकी और उस पर बिछाने को लाल या पीला कपड़ा
- गौरी माता: चित्र, धातु की छोटी मूर्ति, या साफ़ मिट्टी अथवा गेहूँ के आटे से बनाई गौरी, जैसा बहुत-से घरों में होता है
- गणेश जी, या मौली लपेटी एक सुपारी जो उनका रूप मानी जाती है
- कलश, आम के पत्ते और नारियल, यदि आपके घर में कलश रखा जाता है
- रोली, हल्दी, सिंदूर, अक्षत, चंदन और मौली
- गौरी के लिए सोलह श्रृंगार: चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, कंघी, शीशा, महावर, लाल चुनरी और दूसरे छोटे गहने
- जहाँ तक हो सके हर चीज़ सोलह: सोलह चूड़ियाँ, सोलह पान-सुपारी, सोलह लौंग-इलायची, सोलह फल, सोलह लड्डू या मिठाई
- सोलह बत्तियों वाला घी का दीया, या सोलह छोटे दीये; धूप-अगरबत्ती
- फूल, माला और दूब
- कथा के समय हाथ में रखने को चावल या गेहूँ के दाने
- उद्यापन के लिए सुहाग का सामान, कपड़े और मिठाई
इनमें कुछ भी महँगा होना ज़रूरी नहीं। सोलह की गिनती पूरेपन का भाव है; जो घर सब कुछ सोलह नहीं जुटा पाते, वे जो है उसी से पूजा करते हैं।
पूजा का क्रम
- स्नान और संकल्प। सुबह जल्दी उठकर नहाएँ और साफ़ कपड़े पहनें; बहुत-सी बहुएँ लाल या हरी साड़ी पहनती हैं। पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें, दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने शब्दों में कहें कि आप सुहाग और परिवार की कुशलता के लिए मंगला गौरी का व्रत रख रही हैं। जल धरती पर छोड़ दें।
- स्थान तैयार करें। पूजा का कोना साफ़ करके चौकी रखें और कपड़ा बिछाएँ। बीच में गौरी माता और बगल में गणेश जी को बिठाएँ। कलश हो तो दाईं ओर रखें।
- पहले गणेश जी। धूप जलाकर गणेश जी को रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएँ और प्रार्थना करें कि पूजा निर्विघ्न हो।
- गौरी का स्नान और श्रृंगार। धातु की मूर्ति हो तो जल और थोड़े दूध से नहलाकर पोंछ लें; मिट्टी या आटे की गौरी पर बस जल के छींटे दें। लाल चुनरी ओढ़ाएँ और सोलह श्रृंगार एक-एक करके चढ़ाएँ।
- सोलह-सोलह का अर्पण। सोलह चूड़ियाँ, पान, लौंग, फल और मिठाई चढ़ाएँ। बहुत-सी बहुएँ सास के सामने एक-एक गिनकर चढ़ाती हैं।
- दीया जलाएँ। सोलह बत्तियों वाला दीया या सोलह छोटे दीये जलाएँ, और फूल व दूब चढ़ाएँ।
- कथा सुनें। हाथ में थोड़े अक्षत लेकर मंगला गौरी व्रत कथा सुनें या पढ़ें, जिसमें सेठ धर्मपाल और मंगला की कहानी है। कथा के बाद अक्षत माता के चरणों में चढ़ा दें।
- आरती। दीये से गौरी माता की आरती करें; घर की रीति हो तो गणेश जी की भी। अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँग लें।
- बड़ों का आशीर्वाद। इसके बाद बहू सास के पैर छूकर उन्हें मिठाई और सुहाग की कुछ चीज़ें देती है।
- भोजन। कुछ बहुएँ पूजा के बाद एक बार भोजन करती हैं, कई घरों में बिना नमक या बिना अनाज का; कुछ दिन भर फल-दूध लेती हैं। घर की रीति और अपनी सेहत, दोनों देखकर तय करें।
समय कैसे देखें
इस पूजा का कोई एक तय क्षण नहीं है। परंपरा से यह सावन के हर मंगलवार को सुबह या दिन के पहले हिस्से में होती है। असली बात यह जानना है कि आपकी गिनती से कौन-कौन से मंगलवार सावन के भीतर पड़ते हैं, और यह सावन सोमवार पृष्ठ पर मिल जाएगा। जो परिवार अच्छे समय में पूजा शुरू करना पसंद करते हैं, वे अपने शहर का चौघड़िया देखते हैं और उस मंगलवार के राहु काल से बचते हैं। किसी मंगलवार को सफ़र या बीमारी हो तो बहुएँ जहाँ हैं वहीं छोटी-सी पूजा कर लेती हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की रीति सबसे पहले है।
- व्रत विवाह के बाद के पहले सावन से शुरू होकर पाँच साल चलता है; कुछ घरों में कुल सोलह या बीस मंगलवार गिने जाते हैं।
- आख़िरी साल उद्यापन होता है: बड़ी पूजा, अक्सर छोटा हवन, और सोलह सुहागिनों को, या जितनी हो सकें उतनी को, सुहाग का सामान, कपड़े और भोजन दिया जाता है।
- बहुत-सी बहुएँ पहले सावन का पहला मंगलवार मायके में रखती हैं और बाकी ससुराल में।
- पूजा के पूरे समय दीया जलता रहता है, और कुछ घरों में दिन भर।
- कुछ परिवार हर मंगलवार आटे की नई गौरी बनाकर पूजा के बाद जल में विसर्जित करते हैं; कुछ पूरे महीने एक ही मूर्ति रखते हैं।
- बीमार, गर्भवती या बुज़ुर्ग महिलाएँ फल-दूध के साथ व्रत रखती हैं, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले है।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान: घर में सुबह की शांत पूजा, सोलह-सोलह का अर्पण और कथा; अक्सर पड़ोस की नई बहुएँ भी साथ बैठ जाती हैं।
- महाराष्ट्र: यहाँ यह दिन मंगळागौर है। नई बहुएँ एक घर में मिलकर पूजा करती हैं, और शाम से देर रात तक फुगड़ी, झिम्मा जैसे पुराने खेल खेलती और गीत गाती हैं। पूजा अक्सर पुरोहित कराते हैं और बहू के मायके से भेंट आती है।
- बिहार और पूरब के कुछ हिस्से: कुछ परिवारों में सावन के मंगलवार इसी ढंग से रखे जाते हैं, कहीं-कहीं सोमवार के व्रत के साथ।
पूजा के बाद
मिठाई प्रसाद के रूप में बाँटें। गौरी मिट्टी या आटे की हो तो उसे किसी बर्तन के जल में चुपचाप विसर्जित करें और वह जल किसी पौधे में डाल दें। इसी महीने के सोमवारों की अपनी कहानी सोलह सोमवार व्रत कथा में है, और भादों में शिव-गौरी का व्रत हरतालिका तीज की कथा में।