सोलह सोमवार का व्रत शिव जी और पार्वती जी के लिए लगातार सोलह सोमवारों का उपवास है, जिसमें घर या मंदिर में सादी पूजा, जल और दूध से अभिषेक, बेलपत्र, कथा, और तीन भागों में बँटने वाला चूरमे का प्रसाद होता है। संक्षेप में: पहले सोमवार संकल्प लें, हर सोमवार शिव-पार्वती की पूजा करें, कथा सुनें, प्रसाद के तीन भाग करें, एक बार भोजन करें, और सत्रहवें सोमवार को उद्यापन करें।
बहुत-से लोग सावन से यह व्रत शुरू करते हैं; साल भर के सावन सोमवार सावन सोमवार की तिथि वाले पृष्ठ पर हैं। हर सोमवार पढ़ी जाने वाली कथा सोलह सोमवार व्रत कथा पृष्ठ पर है।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- छोटा शिवलिंग, या शिव-पार्वती का चित्र; बहुत-से लोग पास के मंदिर चले जाते हैं
- साफ़ जल का लोटा, हो तो गंगाजल
- कच्चा दूध, और पूरे अभिषेक के लिए दही, शहद, घी और शक्कर
- बेलपत्र, तीन पत्तियों वाले, धुले हुए और साबुत
- सफ़ेद फूल, मिल जाएँ तो धतूरा या आक के फूल, अक्षत, चंदन
- पार्वती जी के लिए लाल चुनरी, कुमकुम, चूड़ियाँ या सुहाग का थोड़ा सामान
- घी का दीया, धूप-अगरबत्ती, कपूर
- चूरमे के लिए गेहूँ का आटा, घी, गुड़ या शक्कर
- कथा की पुस्तक
इनमें से कुछ भी महँगा होना ज़रूरी नहीं। मंदिर के शिवलिंग पर एक लोटा जल और कुछ बेलपत्र अपने आप में पूरी पूजा है।
हर सोमवार की पूजा का क्रम
- पहला सोमवार: संकल्प। नहाकर शिव जी के सामने बैठें, दाएँ हाथ में जल, अक्षत और एक बेलपत्र लेकर अपने शब्दों में कहें कि आप सोलह सोमवार का व्रत रख रहे हैं, किसके लिए और किस कामना से। बाद के सोमवारों को छोटी-सी प्रार्थना काफ़ी है।
- चूरमा बनाएँ। गेहूँ के आटे में घी डालकर कड़ा आटा गूँधें, मोटी रोटियाँ या बाटियाँ बनाकर धीमी आँच पर सेंकें, फिर उन्हें चूरकर घी और गुड़ या शक्कर में मिलाएँ। कुछ घर चूरमे के लड्डू बाँध लेते हैं।
- अभिषेक। ॐ नमः शिवाय कहते हुए शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ, फिर कच्चा दूध, फिर दोबारा जल। पूरा अभिषेक करने वाले बीच में दही, शहद, घी और शक्कर भी चढ़ाते हैं।
- शिव-पार्वती पूजन। शिव जी को चंदन, अक्षत, सफ़ेद फूल और बेलपत्र चढ़ाएँ, बेलपत्र का चिकना हिस्सा नीचे की ओर; पार्वती जी को कुमकुम, चुनरी और सुहाग का सामान। दीया और धूप जलाएँ।
- भोग लगाएँ। चूरमा शिव-पार्वती के सामने रखें।
- कथा सुनें। हाथ में चावल के कुछ दाने या एक फूल लेकर सोलह सोमवार की कथा पढ़ें या सुनें, और अंत में उन्हें चढ़ा दें।
- आरती। ओम जय शिव ओंकारा आरती गाएँ।
- प्रसाद के तीन भाग। रीति के अनुसार चूरमे के तीन हिस्से करें: एक शिव जी का, जो गाय को दिया जाता है या मंदिर में रख दिया जाता है; एक वहाँ मौजूद लोगों में बाँटें; और एक स्वयं खाएँ।
- बाकी दिन। बहुत-से लोग बस यही प्रसाद लेते हैं, या शाम की पूजा के बाद एक बार सादा भोजन करते हैं; कुछ घरों में उस दिन नमक नहीं खाया जाता।
सत्रहवें सोमवार का उद्यापन
- बाकी सोमवारों की तरह पूरी पूजा करें; चाहें तो अभिषेक बड़ा रखें।
- चूरमा ज़्यादा मात्रा में बनाएँ; कुछ परिवारों में आटे की मात्रा घर की रीति से तय होती है।
- बहुत-से परिवार छोटा-सा हवन करते हैं या पंडित जी से करवाते हैं।
- रीति के अनुसार पंडित जी, किसी सुहागिन जोड़े, या परिवार और पड़ोसियों को भोजन कराएँ, और चूरमा दूर-दूर तक बाँटें।
- शिव-पार्वती को धन्यवाद दें, और कथा की उन अप्सराओं को याद करें जिन्होंने यह व्रत सबसे पहले आगे बढ़ाया।
समय कैसे देखें
सोमवार की पूजा प्रायः सुबह नहाने के बाद होती है, या शाम को प्रदोष काल में, यानी सूर्यास्त के आसपास का वह समय जो शिव जी को प्रिय माना जाता है। कोई तय मुहूर्त नहीं है। जो परिवार राहु काल से बचते हैं, वे अपने शहर का सोमवार का राहु काल देखते हैं, जो ज़्यादातर जगह सोमवार को सुबह के समय पड़ता है, और उससे पहले या बाद में पूजा शुरू करते हैं। अच्छी घड़ी के लिए चौघड़िया काम का है। पहला या सत्रहवाँ सोमवार चुनने के लिए पंचांग में तिथि देखें, और यह भी कि कहीं वह सोमवार प्रदोष का दिन तो नहीं, जिसे बहुत-से लोग खास तौर पर शुभ मानते हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- ज़्यादातर लोग सावन या कार्तिक से शुरू करते हैं, और जिन महीनों के लिए घर के पंडित जी मना करें, उनमें शुरुआत नहीं करते।
- बीमारी, यात्रा या मासिक धर्म के कारण कोई सोमवार छूट जाए, तो बहुत-से लोग अगला सोमवार रख लेते हैं और अंत में एक सोमवार जोड़ देते हैं।
- कुछ लोग व्रत के सोमवारों पर नमक नहीं खाते; कुछ एक बार सामान्य शाकाहारी भोजन करते हैं।
- कुँवारी कन्याएँ अक्सर अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, और पति-पत्नी साथ में भी रखते हैं।
- कुछ घरों में सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़े जाते, इसलिए एक दिन पहले तोड़कर रख लिए जाते हैं।
- व्रत हल्का भी रखा जा सकता है: बहुत-से लोग फल और दूध लेते हैं, और गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग लोग ज़रूरत के हिसाब से खाएँ। डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश: चूरमे का प्रसाद, सोमवार सुबह मंदिर में जलाभिषेक, और घर पर कथा।
- राजस्थान: चूरमा यहाँ खास तौर पर प्रिय है, और उद्यापन अक्सर दाल-बाटी-चूरमे के साथ पूरे परिवार का जमावड़ा बन जाता है।
- दिल्ली, हरियाणा और पंजाब: युवतियों में यह व्रत बहुत लोकप्रिय है, अक्सर सावन में मंगलवार के मंगला गौरी व्रत के साथ शुरू होता है।
- महाराष्ट्र और गुजरात: श्रावण के सोमवार खूब रखे जाते हैं; सोलह सोमवार भी इसी ढंग से होता है, प्रसाद में अक्सर शीरा बनता है।
पूजा के बाद
अभिषेक का जल किसी पौधे की जड़ में डालें, सूखे बेलपत्र विसर्जन के लिए रख लें, और चूरमा सबमें बाँटें। इससे जुड़ी एक और कथा है — त्रयोदशी की शाम शिव जी के लिए रखे जाने वाले प्रदोष व्रत की कथा।