पापमोचिनी एकादशी चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण), जो होली और चैत्र नवरात्रि के बीच आती है और चांद्र वर्ष की आख़िरी एकादशी होती है। इसकी कथा युवा मेधावी मुनि और अप्सरा मंजुघोषा की है: लंबे समय तक सब कुछ भूल जाने की, क्रोध में दिए शाप की, और उस व्रत की जिसने दोनों को छुड़ाया।
यह एकादशी अगली बार किस दिन है, और अगली सुबह किस समय के बाद व्रत खोला जा सकता है, यह जानने के लिए एकादशी व्रत की तिथियाँ सूची खोलें; वहाँ हर एकादशी के पृष्ठ पर आपके शहर का पारण दिया है। नीचे कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
पापमोचिनी एकादशी की कथा
युधिष्ठिर बोले, "हे कृष्ण, आमलकी एकादशी की कथा आपने सुना दी। अब चैत्र के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है और उससे क्या होता है?"
श्रीकृष्ण ने कहा, "उसका नाम पापमोचिनी है, यानी पापों से छुड़ाने वाली। एक बार राजा मांधाता ने लोमश ऋषि से पूछा था कि अनजाने में हुई भूलों से मनुष्य कैसे छूटे, तब लोमश जी ने यह कथा सुनाई। सुनो।"
चैत्ररथ वन
देवताओं का एक उपवन है, चैत्ररथ, जो कुबेर का है और जहाँ हमेशा वसंत रहता है। वहाँ के पेड़ सदा फूलों से लदे रहते हैं, पक्षी सदा गाते हैं, और इंद्र और दूसरे देवताओं के साथ अप्सराएँ और गंधर्व वहाँ घूमते हैं। उसी वन में एक शांत आश्रम के पास महर्षि च्यवन के पुत्र, युवा मेधावी मुनि तपस्या में लीन थे। वे शिव के भक्त थे, अपने नियमों के पक्के, और ध्यान में ऐसे स्थिर कि लगता था पूरा वन उनके चारों ओर चुप हो गया है।
कामदेव शिव के भक्तों से चिढ़ा रहता था, और उसे यहाँ मौक़ा दिखा। अप्सराओं में मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा थी, जिसकी आवाज़ अपने नाम की तरह ही मीठी थी। उसकी नज़र मेधावी पर पड़ चुकी थी और उसका मन उनकी ओर खिंचता था। कामदेव ने उसे उकसाया और अपनी शक्ति भी दे दी।
मंजुघोषा आश्रम से थोड़ी दूर बैठकर वीणा पर गाने लगी, पहले धीरे-धीरे, फिर इतना सुंदर जितना उसने कभी नहीं गाया था। वह संगीत बहता हुआ मेधावी तक पहुँचा। उन्होंने आँखें खोलीं, उसे देखा, और उसी पल उनकी तपस्या टूट गई।
बरसों का भूलना
मेधावी अपना आसन छोड़कर उसके पास चले गए। व्रत भूल गए, पूजा भूल गए, यहाँ तक कि दिन और रात का आना-जाना भी भूल गए। दोनों उसी वन में साथ रहने लगे, और ऋतुएँ बदलती रहीं, बार-बार बदलती रहीं, पर मुनि ने कभी गिनती नहीं की। व्रत की पुस्तकों में इन बरसों की संख्या पचास से भी ऊपर बताई जाती है।
आख़िर मंजुघोषा ने कहा कि अब उसे स्वर्ग लौटना है। मेधावी बोले, "थोड़ा और रुक जाओ, कम से कम शाम तक।" वह रुक गई। कुछ समय बाद उसने फिर कहा, और फिर वही उत्तर मिला, शाम तक रुक जाओ। ऐसा एक बार और हुआ। फिर एक दिन, जब मुनि संध्या-वंदन के लिए उठे, उसने धीरे से पूछा, "मुनिवर, आपको क्या लगता है, मेरे आने के बाद कितनी शामें बीत गईं?"
मुनि ठिठक गए, गिनती की, और सन्न रह गए। इतने बरस निकल गए थे। तपस्या मिट्टी में मिल गई थी, पुण्य बिखर गया था। सदमा तुरंत क्रोध बन गया, और क्रोध उसी पर उतरा। "तुमने मेरा बनाया सब कुछ नष्ट कर दिया," उन्होंने कहा। "पिशाचिनी बन जाओ, भटकती फिरो, जैसे तुमने मेरा जीवन भटका दिया।"
दोनों की मुक्ति
मंजुघोषा उनके पैरों पर गिर पड़ी। "मेरा आना ग़लत था," उसने कहा, "पर मैंने आपको रुकने पर मजबूर नहीं किया था, और ये बरस जितने मेरे थे उतने आपके भी थे। ज्ञानी कहते हैं कि सात क़दम साथ चलने से भी मित्रता हो जाती है। मुझ पर कुछ दया कीजिए। बताइए, यह शाप कैसे छूटेगा।"
मेधावी का क्रोध ठंडा पड़ गया। उन्होंने कहा, "चैत्र के कृष्ण पक्ष में पापमोचिनी नाम की एकादशी आती है। उसका व्रत करो, शाप तुमसे उतर जाएगा।"
फिर वे अपने पिता के आश्रम लौटे। च्यवन ऋषि ने बेटे को देखते ही समझ लिया कि क्या हुआ है। उन्होंने कहा, "बेटा, तुमने भी बहुत कुछ खोया है। सुख के लिए तपस्या छोड़ी, और फिर क्रोध में किसी को शाप दे दिया। तुम भी वही व्रत करो। वह हर तरह के दोष से छुड़ाता है।"
दोनों ने पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखा। मंजुघोषा शाप से छूटकर अपने उजले रूप में स्वर्ग लौट गई। मेधावी अपने दोषों और अपने क्रोध से मुक्त होकर फिर तपस्या में और पिता की सेवा में लग गए।
लोमश जी ने कथा पूरी करके मांधाता से कहा कि जो यह एकादशी रखता है, या इसकी कथा सुनता-पढ़ता है, वह जाने-अनजाने हुए दोषों से छूट जाता है।
कथा को सहज मन से पढ़ें
कथा में क्रोध में दिया शाप है और एक स्त्री का पिशाचिनी बन जाना है, और इसे अप्सरा के ख़िलाफ़ कठोरता से भी पढ़ा जा सकता है। माहात्म्य इसे ऐसे नहीं पढ़ता। वह दोनों से हिसाब माँगता है, ध्यान भटकाने वाली से भी और भूल जाने वाले से भी, और दोनों को लौटने का एक ही रास्ता देता है। बहुत-से घरों में इसे क्रोध की कथा माना जाता है: मुनि ने इतने बरस खोकर जितना गँवाया, उससे ज़्यादा एक शाप देकर गँवाया, और पिता की पहली चिंता बेटे को फिर से अपने आप में लौटाने की है।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
पापमोचिनी का अर्थ है पापों से छुड़ाने वाली। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत हर तरह के दोष से, भारी दोष से भी, मुक्त करता है, और इसकी कथा सुनना भी अपने आप में आशीर्वाद है। ये ग्रंथ के अपने शब्द हैं, दिन की प्रशंसा में।
चांद्र वर्ष की आख़िरी एकादशी होने के कारण बहुत-से लोग इसे साल का हिसाब बंद करने की तरह रखते हैं: बीते साल पर नज़र डालना, जहाँ माफ़ी माँगनी हो वहाँ माँग लेना, और चैत्र नवरात्रि और नए साल से पहले मन की गाँठें खोल देना। इस तरह यह दो हफ़्ते बाद आने वाली कामदा एकादशी से अपने आप जुड़ जाती है, जो साल की शुरुआत करती है।
कैसे रखी जाती है
पापमोचिनी एकादशी सामान्य एकादशी की तरह विष्णु पूजा, तुलसी, फलाहार और द्वादशी के पारण के साथ रखी जाती है। होली अभी-अभी बीती होती है, इसलिए कई लोग यह दिन सादा और शांत रखते हैं, और कुछ लोग मुनि और अप्सरा की कथा के भाव में इस दिन किसी रूठे हुए अपने से सुलह कर लेते हैं। पूरी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है; बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले लोग पानी और फल के साथ व्रत रख सकते हैं, और डॉक्टर की बात पहले मानें।
आस-पास की एकादशियाँ
इससे पहले फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में आँवले के पेड़ वाली आमलकी एकादशी आती है। दो एकादशियाँ ऐसी भी हैं जो केवल अधिक मास वाले साल में आती हैं; उनमें पहली अधिक मास के शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी है। अपने शहर में तिथि का समय पंचांग में देखें।