विजया एकादशी फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत पंचांग में माघ कृष्ण), जो महाशिवरात्रि से कुछ दिन पहले आती है। इसकी कथा हमें दक्षिण के समुद्र तट पर ले जाती है, जहाँ सेना इकट्ठी थी, लहरों के उस पार कहीं लंका थी, और श्रीराम को समझ नहीं आ रहा था कि पार कैसे जाएँ; तब एक मुनि ने उन्हें यह व्रत बताया।
यह एकादशी अगली बार किस दिन है, यह एकादशी व्रत की तिथियाँ सूची में मिलेगा; वहाँ इसका पृष्ठ खोलकर अपने शहर का पारण समय देख लें, जिससे पता चलता है कि व्रत कब खोला जा सकता है। आगे कथा है, हमारे शब्दों में।
विजया एकादशी की कथा
युधिष्ठिर ने कहा, "हे कृष्ण, फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है और उससे क्या मिलता है?"
श्रीकृष्ण बोले, "उसका नाम विजया है, और वह विजय दिलाती है। एक बार नारद जी ने ब्रह्मा जी से इसके बारे में पूछा था, तो ब्रह्मा जी ने त्रेता युग की एक कथा सुनाई। सुनो।"
समुद्र के किनारे
श्रीराम को चौदह बरस का वनवास मिला था, और सीता जी और लक्ष्मण जी उनके साथ वन गए थे। वन में रावण सीता जी को हरकर लंका ले गया। दोनों भाइयों ने उन्हें खोजा, सुग्रीव से मित्रता की, और हनुमान जी समुद्र लाँघकर सीता जी का पता लगा लाए। अब वानरों की पूरी सेना दक्षिण की ओर कूच करके समुद्र के किनारे आ खड़ी हुई थी।
श्रीराम ने समुद्र की ओर देखा। पानी क्षितिज तक फैला था, गहरा और बेचैन, बड़ी-बड़ी मछलियों, समुद्री सर्पों और न जाने कैसे-कैसे जीवों से भरा। न कोई नाव थी जो सेना को ले जा सके, न कोई उथली जगह जहाँ से पैदल जाया जा सके, न कोई और रास्ता। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "भैया, इसे पार कैसे करें? मुझे कोई रास्ता नहीं सूझता।"
लक्ष्मण बोले, "भैया, आप तो सब जानते हैं, फिर भी मुझसे पूछते हैं। यहाँ से थोड़ी ही दूर, किनारे-किनारे चलकर, बकदाल्भ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने ब्रह्मा जी के कितने ही युग आते-जाते देखे हैं। चलिए, उन्हीं से पूछते हैं।"
मुनि की सलाह
दोनों भाई आश्रम पहुँचे, प्रणाम किया और मुनि के सामने बैठ गए। बूढ़े मुनि ने श्रीराम को तुरंत पहचान लिया और आनंद से भर गए। "राम, किस काम से आए हो?"
श्रीराम ने कहा, "मुनिवर, सीता को लंका से वापस लाने के लिए मैं सेना लेकर इस तट तक आया हूँ, पर समुद्र रास्ता रोके खड़ा है। बताइए, इसे कैसे पार करें और कैसे जीतें।"
मुनि बोले, "फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में विजया नाम की एकादशी आती है। अपने साथियों और सेनापतियों के साथ उसका व्रत करो; तुम समुद्र भी पार करोगे और विजय भी पाओगे। विधि सुनो।"
उन्होंने बताया कि दशमी के दिन सोने, चाँदी या ताँबे का कलश बनवाओ, और कुछ न मिले तो मिट्टी का ही सही। उसमें जल भरो, मुँह पर आम के पत्ते रखो, और उसे सात तरह के अनाज की छोटी-सी ढेरी पर स्थापित करो। ऊपर भगवान नारायण की प्रतिमा रखो। एकादशी की सुबह स्नान करके फूल, माला, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य से कलश की पूजा करो, और पूरा दिन उपवास और भगवान के स्मरण में बिताओ। रात भर उसके सामने जागो। द्वादशी को सूर्योदय के समय कलश को किसी नदी या सरोवर के किनारे ले जाओ, एक बार फिर पूजा करो, और आदर के साथ किसी विद्वान ब्राह्मण को दान कर दो।
व्रत और समुद्र पार
श्रीराम ने ठीक वैसा ही किया। कलश स्थापित किया, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान और सेना के प्रमुखों के साथ व्रत रखा, दिन भर पूजा की, रात भर जागे, और द्वादशी को जल के किनारे कलश का दान किया।
इसके बाद रास्ता खुल गया। जैसा सब जानते हैं, समुद्र देव स्वयं श्रीराम के सामने आए, वानरों ने पत्थर-पत्थर जोड़कर सेतु बनाया, और सेना लंका पहुँच गई। युद्ध हुआ, विजय मिली, रावण का अंत हुआ, और सीता जी घर लौटीं।
ब्रह्मा जी ने कथा पूरी करके नारद जी से कहा कि जो इस विधि से विजया एकादशी रखता है, वह इस लोक में भी जीतता है और परलोक में भी, और इसकी कथा पढ़ने-सुनने से भी पुण्य मिलता है।
कथा को सहज मन से पढ़ें
कथा का अंत युद्ध और रावण के पतन पर होता है, पर माहात्म्य लड़ाई पर नहीं ठहरता। इसका दृश्य शांत है: एक महान राजकुमार जिसे रास्ता नहीं सूझ रहा, एक छोटा भाई जो सलाह लेने की बात कहता है, और एक बूढ़े मुनि जो धीरज से उत्तर देते हैं। घरों में इसे इस छूट की तरह सुना जाता है कि कठिन काम से पहले रुककर मान लेना कि रास्ता नहीं पता, और किसी जानकार से पूछ लेना, कोई छोटी बात नहीं।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
विजया का अर्थ है जीत, और माहात्म्य इस एकादशी को सफलता देने वाली और दोष मिटाने वाली बताता है। ग्रंथ बड़ी विजय की बात करता है; घर-परिवार इसे ईमानदार मेहनत पर आशीर्वाद मानकर सुनते हैं, यह नहीं कि व्रत मेहनत की जगह ले लेगा।
श्रीराम की अपनी कथा भी यही कहती है। व्रत उन्होंने रखा, पर उसके बाद भी सेतु बनाना पड़ा और युद्ध लड़ना पड़ा। लोग परीक्षा, साक्षात्कार, मुक़दमे, लंबी यात्रा या किसी कठिन बातचीत से पहले विजया एकादशी रखते हैं, रास्ते के लिए साफ़ समझ और स्थिर मन माँगते हैं, और फिर अपने काम में जुट जाते हैं।
कैसे रखी जाती है
विजया एकादशी पर बहुत-से परिवार दशमी की शाम ताँबे या मिट्टी का छोटा कलश रखते हैं, उसमें जल भरकर मुँह पर आम के पत्ते लगाते हैं, नीचे सात तरह के अनाज के कुछ दाने रखते हैं, और पास में विष्णु या श्रीराम का चित्र या छोटी मूर्ति रखते हैं। दिन भर एकादशी की सामान्य पूजा और फलाहार के साथ कलश की पूजा होती है, और द्वादशी को कलश का जल किसी पेड़ या तुलसी की जड़ में डाल दिया जाता है और अनाज दान कर दिया जाता है। कुछ लोग शाम को रामायण का सुंदरकांड या लंका वाला प्रसंग पढ़ते हैं। बाक़ी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है; बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और बीमार लोग पानी और फल के साथ व्रत रख सकते हैं।
आस-पास की एकादशियाँ
इससे पहले माघ के शुक्ल पक्ष में जया एकादशी आती है, शाप से छूटे दो गायकों की कथा वाली। इसके बाद फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में आमलकी एकादशी आती है, आँवले के पेड़ का दिन। अपने शहर की तिथि के लिए पंचांग देखें, और कलश पूजा शुरू करने का अच्छा समय चौघड़िया में।