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व्रत कथा · वरूथिनी एकादशी

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा: राजा मांधाता और भालू

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा अपने शब्दों में: नर्मदा तट पर तप करते राजा मांधाता, भालू का हमला, सुदर्शन चक्र, और मथुरा का व्रत जिसने उनका शरीर लौटाया।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

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वरूथिनी एकादशी वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी है; जो पंचांग महीना अमावस्या पर पूरा करते हैं, उनमें यह चैत्र में गिनी जाती है। इसकी कथा राजा मांधाता की है, जिन पर ध्यान में बैठे हुए एक भालू ने हमला किया, पर उन्होंने लड़ने के बजाय भगवान को पुकारा, और मथुरा में यही व्रत रखकर उनका शरीर फिर से पूरा हुआ।

अगली वरूथिनी एकादशी कब है और आपके शहर में पारण का समय क्या है, यह एकादशी की तिथियों वाले पृष्ठ पर देखें; वहाँ हर एकादशी का अपना पन्ना है। यहाँ हम केवल कथा कह रहे हैं।

वरूथिनी एकादशी की कथा

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से वैशाख के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। भगवान बोले, "राजन, उसका नाम वरूथिनी है, यानी कवच की तरह रक्षा करने वाली। वह इस लोक में सौभाग्य देती है और परलोक में भी साथ देती है। सुनो, एक राजा ने इसे अपने अनुभव से कैसे जाना।"

नर्मदा किनारे तपस्वी राजा

बहुत समय पहले नर्मदा के किनारे मांधाता नाम के राजा राज करते थे। वे दानी थे, न्यायप्रिय थे, और प्रजा उन्हें बहुत मानती थी। समय के साथ राज-काज से उनका मन उचट गया, और वे नदी किनारे के वन में तपस्या करने चले गए। वहाँ वे बिल्कुल स्थिर बैठे रहते, साँस धीमी, मन भगवान विष्णु में लगा हुआ। दिन कब बीतते, उन्हें पता ही न चलता।

एक दिन पेड़ों के बीच से एक जंगली भालू निकला। उसने एक आदमी को बिना हिले-डुले बैठा देखा तो सोचा, यह तो भोजन है। उसने राजा का पैर मुँह में दबाया और चबाने लगा, फिर उन्हें घसीटता हुआ घने जंगल की ओर ले चला।

राजा को पीड़ा तो हुई, पर उन्होंने अपना नियम नहीं तोड़ा। उन्होंने मन में कहा, तपस्वी चोट का जवाब क्रोध से नहीं देता, और किसी जीव पर हाथ नहीं उठाता, भले वह दुख दे। न उन्होंने हथियार उठाया, न भालू को शाप दिया। उन्होंने पूरे मन से उसी को पुकारा जिसका ध्यान कर रहे थे: "हे हरि, मेरी रक्षा करो।"

पुकार सुनते ही भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हुए। उनके हाथ में सुदर्शन चक्र था। एक ही वार में उन्होंने भालू को गिरा दिया और राजा को छुड़ा लिया।

मथुरा में व्रत

पर भालू अपना काम कर चुका था। राजा का एक पैर नहीं रहा था। वे ज़मीन पर पड़े दर्द और दुख में सोच रहे थे कि अब कैसे जिएँगे, और इतनी तपस्या का क्या हुआ।

भगवान ने उन्हें प्यार से समझाया, "दुखी मत हो, राजन। यह चोट पिछले जन्म के किसी कर्म का फल है; इसका अर्थ यह नहीं कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया। तुम मथुरा जाओ। वहाँ वैशाख कृष्ण की वरूथिनी एकादशी का व्रत करो और मेरे वराह रूप की पूजा करो, उसी रूप की जिसने धरती को जल से ऊपर उठाया था। उस व्रत से तुम्हारा शरीर फिर पूरा हो जाएगा।"

मांधाता मथुरा पहुँचे। उन्होंने पूरी श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत रखा, वराह भगवान की पूजा की और रात भर जागरण किया। व्रत पूरा होते ही उनका शरीर पहले जैसा स्वस्थ और सुंदर हो गया। वे लौटकर शांति से राज करने लगे और अंत में भगवान के धाम को गए।

श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि इस एकादशी से और भी कई राजाओं का भला हुआ; राजा धुंधुमार इसी व्रत से शिव जी के शाप से छूटे, ऐसा कथा में आता है।

कथा को सहज मन से पढ़ें

कथा में हमला है, चोट है, और पिछले जन्म के कर्म की बात है। यह सुनकर कोई अपनी बीमारी या चोट को सज़ा न समझे; परंपरा ऐसा नहीं कहती। कथा का केंद्र मांधाता का संयम है: दर्द में भी उन्होंने पलटकर वार नहीं किया, और भरोसा नहीं छोड़ा। मथुरा का चमत्कार कृपा की तरह कहा गया है, और जो किसी चोट या कमी के साथ जी रहा है, वह भगवान को किसी से कम प्रिय नहीं।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

वरूथिनी का अर्थ है जिसकी रक्षा कवच कर रहा हो। माहात्म्य इस व्रत को दुर्भाग्य से बचाने वाला और सौभाग्य देने वाला बताता है। वह इसके पुण्य की तुलना बरसों के तप और बड़े दानों से करता है, और दानों में अन्नदान को बड़ा, और उससे भी बड़ा विद्यादान को बताता है। ये ग्रंथ के वचन हैं; घर-परिवार इन्हें इस दिन दान करने की प्रेरणा की तरह सुनते हैं।

इस दिन भगवान के वराह रूप का स्मरण होता है, जिन्होंने डूबी हुई धरती को अपने दाँतों पर उठाया था। पुष्टिमार्ग के अनुयायियों के लिए यह श्री वल्लभाचार्य की जयंती भी है, और श्रीनाथजी की हवेलियों में इस दिन विशेष दर्शन और भोग होते हैं।

कैसे रखी जाती है

वरूथिनी के कुछ अपने नियम हैं, जो पुरानी व्रत पुस्तकों में दशमी और एकादशी दोनों के लिए गिनाए गए हैं: बहुत-से घरों में काँसे के बर्तन में भोजन नहीं करते, मसूर की दाल, शहद और पराए घर का भोजन नहीं लेते, और दशमी को एक ही बार खाते हैं। कई लोग यह दिन चुपचाप बिताते हैं, कम बोलते हैं, क्रोध और निंदा से दूर रहते हैं, जैसे मांधाता शांत रहे थे। पूजा में वराह भगवान का स्मरण होता है, और अन्न, तिल या पुस्तकों का दान आम है। बाक़ी व्रत एकादशी की साझा पूजा विधि के अनुसार चलता है; जिन्हें ज़रूरत हो, वे पानी और फल लेकर व्रत रखें।

आगे-पीछे की एकादशियाँ

इससे पहले की एकादशी कामदा एकादशी है, गंधर्व ललित और उनकी पत्नी ललिता की कथा। इसके बाद वैशाख शुक्ल में मोहिनी एकादशी आती है, जिसकी कथा एक भटके हुए बेटे के लौटने की है। व्रत के दिन के शुभ समय के लिए अपने शहर का चौघड़िया देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वरूथिनी एकादशी की कथा क्या है?

नर्मदा किनारे तपस्या में लीन राजा मांधाता का पैर एक भालू ने पकड़ लिया और उन्हें जंगल में घसीट ले गया। राजा ने क्रोध नहीं किया, भगवान विष्णु को पुकारा। भगवान ने चक्र से उन्हें छुड़ाया और मथुरा जाकर वरूथिनी एकादशी पर वराह रूप की पूजा करने को कहा, जिससे राजा का शरीर फिर पूरा हो गया।

इस दिन वराह भगवान की पूजा क्यों होती है?

कथा में स्वयं भगवान विष्णु मांधाता से अपने वराह रूप की पूजा करने को कहते हैं। इसलिए इस दिन की पूजा में वराह अवतार का स्मरण किया जाता है।

वरूथिनी एकादशी और वल्लभाचार्य जयंती का क्या संबंध है?

पुष्टिमार्ग में माना जाता है कि श्री वल्लभाचार्य का जन्म इसी एकादशी को हुआ था। इसलिए पुष्टिमार्गी हवेलियों में यह दिन व्रत के साथ उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • पद्म पुराण, उत्तर खंड, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • भविष्योत्तर पुराण के एकादशी प्रसंग, व्रत कथा संग्रहों में जैसे कहे जाते हैं
  • वल्लभाचार्य जयंती पर पुष्टिमार्गी घरों की परंपरा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति