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व्रत कथा · षटतिला एकादशी

षटतिला एकादशी व्रत कथा: अन्न से ख़ाली घर

षटतिला एकादशी व्रत कथा सरल शब्दों में: हर व्रत रखने वाली पर कभी अन्न न देने वाली ब्राह्मणी, भिक्षापात्र में मिट्टी का ढेला, और तिल के छह प्रयोग।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

षटतिला एकादशी माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत पंचांग में इसे पौष कृष्ण कहते हैं), जो साल के सबसे ठंडे दिनों में आती है। इसकी कथा एक ऐसी स्त्री की है जो हर व्रत बड़े नियम से रखती थी, पर जिसने कभी किसी को एक कौर अन्न नहीं दिया, और उस घर की है जो उसे परलोक में मिला।

यह एकादशी अगली बार किस दिन है, यह एकादशी व्रत की तिथियाँ सूची में देखिए; वहाँ हर एकादशी के पृष्ठ पर आपके शहर का पारण समय भी है, जिससे पता चलता है कि व्रत कब खोला जा सकता है। यहाँ हम कथा अपने शब्दों में कह रहे हैं।

षटतिला एकादशी की कथा

युधिष्ठिर ने कहा, "हे कृष्ण, माघ के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है और उसे कैसे रखा जाता है?"

श्रीकृष्ण ने बताया कि यही प्रश्न कभी दाल्भ्य ऋषि ने पुलस्त्य मुनि से पूछा था। दाल्भ्य जानना चाहते थे कि रोज़ की ज़िंदगी की भूलों में उलझे साधारण लोग कैसे हल्के हों। पुलस्त्य जी ने उन्हें तिल की महिमा बताई: माघ में तिल डालकर नहाओ, तिल का उबटन लगाओ, तिल से हवन करो, पितरों को तिल मिला जल दो, तिल खाओ और तिल दान करो। "ये छह प्रयोग हैं," उन्होंने कहा, "इसीलिए इस पखवाड़े की एकादशी षटतिला कहलाती है।"

फिर श्रीकृष्ण ने वह कथा सुनाई जो इस दिन के साथ जुड़ी है, जो उन्होंने कभी नारद जी को सुनाई थी।

हर व्रत रखने वाली ब्राह्मणी

बहुत पहले धरती पर एक ब्राह्मणी रहती थी, जो कम उम्र में ही विधवा हो गई थी। उसने अपना पूरा जीवन पूजा-पाठ में लगा दिया। पंचांग में जितने व्रत थे, सब रखती थी; कभी-कभी तो महीने भर का व्रत। इतने उपवास करती थी कि शरीर सूखकर दुबला हो गया था। उसकी श्रद्धा सच्ची थी, और बहुत-सी बातों में वह सराहने लायक थी।

पर एक काम उसने कभी नहीं किया। इतने बरसों में उसने किसी को खाना नहीं दिया: न अतिथि को, न ब्राह्मण को, न दरवाज़े पर आए किसी भूखे को। अपनी भूख तो वह भगवान को चढ़ा देती थी, पर बाक़ी सब अपने पास रखती थी। श्रीकृष्ण ने कहा, "मैंने देखा कि उपवास से इसका शरीर शुद्ध हो गया है, और यह मेरे लोक तक पहुँचेगी। पर इसके हाथ से आज तक किसी का पेट नहीं भरा।"

इसलिए भगवान ने एक भिखारी साधु का रूप लिया, हाथ में भिक्षापात्र लिया, और उसके दरवाज़े पर जा पहुँचे।

ब्राह्मणी ने पूछा, "किसलिए आए हो?"

साधु बोले, "भिक्षा के लिए, माई," और पात्र आगे कर दिया।

उसने एक पल उन्हें देखा, फिर झुककर ज़मीन से मिट्टी का एक ढेला उठाया और पात्र में डाल दिया। साधु ने आशीर्वाद दिया और चले गए।

ख़ाली घर

समय आने पर ब्राह्मणी का शरीर छूटा, और अपने इतने व्रतों के बल से वह स्वर्ग पहुँची। वहाँ उसे एक घर मिला, बहुत सुंदर, पर भीतर गई तो देखा कि कुछ भी नहीं है। भंडार में अन्न नहीं, रसोई में खाना नहीं, किसी तरह का धन नहीं। कुछ कथाओं में कहते हैं कि आँगन में बस एक आम का पेड़ था, और कुछ नहीं।

वह दुखी होकर भगवान के पास गई। "प्रभु, मैंने जीवन भर इतने व्रत किए, आपकी पूजा की। फिर मेरा घर ख़ाली क्यों है?"

भगवान ने प्रेम से समझाया, "तुमने अपनी भूख तो दी, पर कभी अन्न नहीं दिया। भिखारी के पात्र में तुमने जो डाला, वह मिट्टी का ढेला था; वही लौटकर तुम्हारे पास आया है।" फिर उपाय भी बताया। "देवताओं की पत्नियाँ तुम्हें देखने आएँगी, नए आए व्यक्ति के बारे में जानने की उत्सुकता से। तुरंत दरवाज़ा मत खोलना। पहले उनसे षटतिला एकादशी के बारे में पूछना, और तभी खोलना जब कोई पूरी विधि बता दे।"

ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। देव-स्त्रियाँ आईं तो उसने दरवाज़ा बंद रखा और अपना प्रश्न पूछा। एक-एक करके कई लौट गईं, पर आख़िर एक रुक गई और उसने सब कुछ बताया: तिल के छह प्रयोग, उपवास, पूजा और दान। ब्राह्मणी ने दरवाज़ा खोला, उसका आदर किया, और जैसा सुना था ठीक वैसे षटतिला एकादशी का व्रत रखा।

व्रत पूरा होते ही घर बदल गया। भंडार अन्न से भर गए, कमरे अच्छी चीज़ों से, और उसका नया घर जितना सुंदर था, उतना ही भरा-पूरा और उजला हो गया।

श्रीकृष्ण ने कथा के अंत में कहा कि जो इस दिन तिल का प्रयोग करता है और दूसरों को अन्न और तिल देता है, उसका घर न इस लोक में ख़ाली रहता है, न उस लोक में।

कथा को सहज मन से पढ़ें

स्वर्ग में ख़ाली घर की बात एक सीधी सीख कहने का तरीक़ा है, कोई धमकी नहीं। किसी परिवार को यह नहीं डराया जा रहा कि दान छूट गया तो सज़ा मिलेगी। ब्राह्मणी भी कहानी की खलनायिका नहीं है; वह भक्त थी, अनुशासन वाली थी, और कथा उसके साथ धीरज से पेश आती है। भगवान उसे लज्जित नहीं करते, बस दिखा देते हैं कि क्या कमी रह गई, और उसे पूरा करने का रास्ता भी देते हैं। घरों में यह कथा इसी याद के लिए सुनाई जाती है कि जो व्रत सिर्फ़ अपने भीतर मुड़ा रहे, वह आधा है; भक्ति को दूसरों की थाली तक पहुँचना चाहिए।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

माहात्म्य कहता है कि इस दिन का तिल कई जन्मों के दोष मिटाता है, और दान किए हर तिल के बदले स्वर्ग में एक-एक बरस की बात करता है। ये ग्रंथ के प्रशंसा-वचन हैं। ज़्यादातर लोग षटतिला से कथा की सीख ही लेते हैं: व्रत देने से पूरा होता है।

यह दिन अपने मौसम से भी मेल खाता है। माघ में कड़ाके की ठंड होती है, तिल और गुड़ शरीर को गरम रखते हैं, और ग़रीब को इन दिनों कंबल और भोजन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। इस एकादशी पर तिल-गुड़ बाँटना पूरे साल की एकादशियों में सबसे व्यावहारिक रीतियों में से है।

कैसे रखी जाती है

षटतिला एकादशी पर बहुत-से लोग नहाने के पानी में तिल डालते हैं, नहाने से पहले थोड़ा तिल का उबटन लगाते हैं, और कुछ लोग छोटा-सा हवन करके उसमें तिल की आहुति देते हैं। पितरों को तिल मिला जल दिया जाता है, फलाहार में तिल के लड्डू या तिल-गुड़ की कोई मिठाई ली जाती है, और तिल, गुड़, अनाज, कंबल या गरम कपड़े दान किए जाते हैं। बाक़ी दिन एकादशी के सामान्य नियम से चलता है, जो एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर लिखा है, और द्वादशी को पारण होता है। बीमार, गर्भवती या बुज़ुर्ग लोग फलाहार रखकर भी तिल के छहों प्रयोग कर सकते हैं।

आस-पास की एकादशियाँ

इससे पहले पौष के शुक्ल पक्ष में पौष पुत्रदा एकादशी आती है, जो संतान की कामना से रखी जाती है। इसके बाद वसंत पंचमी के कुछ दिन बाद जया एकादशी आती है, जिसकी कथा शाप से छूटे दो गायकों की है। अपने शहर की तिथि का समय पंचांग में देखें, और सुबह की पूजा अच्छे समय में शुरू करनी हो तो चौघड़िया काम आता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

षटतिला एकादशी पर तिल के छह प्रयोग कौन-से हैं?

तिल मिले जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल मिला जल अर्पित करना, तिल खाना और तिल का दान। षट् यानी छह और तिल, इन्हीं से इस एकादशी का नाम बना है।

षटतिला एकादशी की कथा किसने सुनाई थी?

व्रत की पुस्तकों में यह श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद में आती है। पद्म पुराण के अनुसार पहले पुलस्त्य मुनि दाल्भ्य ऋषि को तिल के प्रयोग बताते हैं, और ब्राह्मणी वाली कथा श्रीकृष्ण नारद जी को सुनाते हैं।

इस दिन क्या दान किया जाता है?

ज़्यादातर तिल और गुड़, अक्सर तिल के लड्डू के रूप में, और साथ में अन्न, कंबल या गरम कपड़े, क्योंकि यह माघ की ठंड में आती है। जिससे जितना बने, उतना देते हैं; कथा का ज़ोर देने पर है, मात्रा पर नहीं।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • पद्म पुराण, उत्तर खंड, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • उत्तर भारत की एकादशी व्रत कथा पुस्तकें, यहाँ अपने शब्दों में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति