निर्जला एकादशी ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो प्रायः गंगा दशहरा के अगले दिन आती है और परंपरा में बिना अन्न, यहाँ तक कि बिना पानी के रखी जाती है। इसकी कथा पांडव भीम की है, जिनकी भूख उनके बल जितनी ही बड़ी थी, और जिन्हें व्यास जी ने सब एकादशियों के बदले यह एक व्रत बताया।
निर्जला एकादशी किस दिन है और पारण कब करें, यह एकादशी व्रत तिथियाँ पृष्ठ पर अपने शहर के लिए देखें; बिना पानी के दिन के बाद सही समय पर पारण का बहुत महत्व है। इससे ठीक पहले आने वाला त्योहार गंगा दशहरा है। अब कथा।
निर्जला एकादशी की कथा
युधिष्ठिर कई एकादशियों की कथाएँ सुन चुके थे। ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी के बारे में पूछा तो श्रीकृष्ण बोले, "इसकी कथा तो तुम्हारे अपने घर में घटी थी, और इसे कहने वाले स्वयं तुम्हारे पितामह व्यास जी थे।"
भीम की उलझन
एक बार व्यास जी पांडवों से मिलने आए। सब साथ बैठे थे, और बातों-बातों में व्रत-उपवास की चर्चा चल पड़ी। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव हर एकादशी रखते थे, माता कुंती और द्रौपदी भी। भीम चुपचाप सुनते रहे, कुछ बेचैनी से पहलू बदलते रहे, फिर आख़िर बोल ही पड़े।
"पितामह, मेरे भाई एकादशी रखते हैं, माँ रखती हैं, द्रौपदी रखती है। हर पखवाड़े सब मुझसे कहते हैं, भीम, आज कुछ मत खाना। मैं इसका पुण्य समझता हूँ। पूजा कर सकता हूँ, दान दे सकता हूँ, पूरी कथा बैठकर सुन सकता हूँ। पर भूखा नहीं रह सकता। मेरे पेट में वृक नाम की आग है, इसीलिए तो लोग मुझे वृकोदर कहते हैं। वह तभी शांत होती है जब भरपेट खा लूँ। मैं दिन में एक बार खाकर भी नहीं रह पाता, महीने में दो बार पूरा दिन उपवास तो दूर की बात है। मुझ जैसे के लिए कोई रास्ता नहीं?"
व्यास जी ने पोते को स्नेह से देखा। वे जानते थे कि भीम आलसी नहीं, बस उनकी बनावट ही ऐसी है। बोले, "एकादशी का पुण्य चाहिए तो रास्ता व्रत ही है। पर अगर सब नहीं रख सकते, तो एक रखो, और पूरी निष्ठा से रखो।"
एक एकादशी
"ज्येष्ठ के महीने में, जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हों और गर्मी चरम पर हो, तब शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है। उस दिन सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक न अन्न लो, न जल। केवल आचमन के लिए, यानी पूजा से पहले शुद्धि के लिए जो ज़रा-सा जल होंठों से लगाया जाता है, उतना ही; उससे ज़्यादा नहीं।
"अगली सुबह द्वादशी को स्नान करो, विष्णु की पूजा करो, ज़रूरतमंदों को जल, अन्न और दान दो, फिर परिवार के साथ भोजन करो। जो इस तरह यह एक व्रत रखता है, उसे साल भर की सब एकादशियों का फल मिलता है।"
भीम कुछ देर चुप रहे। ज्येष्ठ की गर्मी में बिना पानी का दिन उनके लिए भी आसान बात नहीं थी। पर दिन एक ही था, और एक दिन का सामना वे कर सकते थे। बोले, "मैं यह व्रत रखूँगा।"
और उन्होंने रखा। धूप कड़ी थी, दिन लंबा था; कथा कहती है कि शाम होते-होते महाबली भीम भी निढाल होकर ज़मीन पर लेट गए। पर उन्होंने अपना वचन नहीं तोड़ा। द्वादशी को स्नान, पूजा और दान करके उन्होंने भाइयों के साथ व्रत खोला। तब से यह दिन उनके नाम पर भीमसेनी एकादशी और पूरे परिवार के नाम पर पांडव एकादशी कहलाता है।
कथा को सहज मन से पढ़ें
कुछ कथाओं में व्यास जी यमदूतों और मृत्यु के बाद की बातें भी कहते हैं, जो भीम को मनाने का उनका ढंग है। आज के घरों में इसे धमकी की तरह नहीं सुना जाता। कथा का असली मर्म व्यास जी की करुणा है: उन्होंने भीम को इस बात पर शर्मिंदा नहीं किया कि वे उपवास नहीं कर पाते, बल्कि उनके स्वभाव के हिसाब से रास्ता ढूँढा। यही भाव याद रखने लायक़ है, उनके लिए भी जिनका शरीर बिना पानी का दिन नहीं झेल सकता।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
माहात्म्य कहता है कि निर्जला में साल की चौबीसों एकादशियों का पुण्य है, और सब तीर्थों में स्नान और सब दानों का फल भी। ये ग्रंथ के वचन हैं, और इन्हीं से समझ आता है कि जो लोग बाक़ी एकादशियाँ नहीं रखते, वे भी यह एक क्यों रखते हैं। पर यह दिन केवल त्याग का नहीं है। साल के सबसे गर्म दिनों में पड़ने के कारण इसका दूसरा आधा हिस्सा देना है: प्यासे को पानी, धूप में खड़े को छाँव।
कैसे रखी जाती है, और कब पानी पीना ठीक है
परंपरा में व्रत एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक बिना अन्न और जल के होता है, आचमन को छोड़कर। पर इसमें सावधानी ज़रूरी है। भीषण गर्मी में बिना पानी का दिन शरीर पर सचमुच भारी पड़ता है। बच्चे, बुज़ुर्ग, गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताएँ, और जिन्हें मधुमेह, दिल या गुर्दे की तकलीफ़, कम रक्तचाप हो या जो रोज़ दवा लेते हों, वे यह व्रत सूखा न रखें; पहले डॉक्टर से बात करें। व्रत की किताबें ख़ुद कहती हैं कि बीमार, बालक और वृद्ध जल और फल ले सकते हैं, और श्रद्धा से फल-जल पर रखा गया व्रत भी पूरा व्रत है। बहुत-से लोग यही राह चुनते हैं।
इस दिन लोग मिट्टी के घड़ों में पानी भरकर, ऊपर कपड़ा और थोड़ी चीनी या फल रखकर दान करते हैं; कुछ पंखे, छाते और जूते-चप्पल बाँटते हैं। दिल्ली, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मोहल्ले-मोहल्ले सड़क किनारे छबील लगती है, जहाँ हर आने-जाने वाले को ठंडा मीठा पानी पिलाया जाता है, और बहुत-से लोग इसे इस दिन का सबसे सुंदर काम मानते हैं। बाक़ी विधि, पारण में पहले पानी और फिर हल्के भोजन से धीरे-धीरे व्रत खोलने समेत, एकादशी पूजा विधि में है।
इसके दोनों ओर की एकादशियाँ
निर्जला से पहले अपरा एकादशी आती है, राजा महीध्वज और धौम्य ऋषि की कथा। इसके बाद आषाढ़ कृष्ण में योगिनी एकादशी आती है, कुबेर के माली हेममाली की कथा। आपके शहर में एकादशी और द्वादशी कब लगती हैं, यह पंचांग में देखें।