पापांकुशा एकादशी आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो दशहरे के अगले दिन आती है, और इसकी कथा क्रोधन नाम के एक बहेलिए की है जिसने पूरा जीवन क्रूरता में बिताया था। जब उसे पता चला कि उसका अंत पास है, तो वह डरकर अंगिरा ऋषि के पास भागा, और सच्चे मन से रखी एक एकादशी ने उसकी दिशा बदल दी।
अगली पापांकुशा एकादशी, उसके स्मार्त और वैष्णव दिन एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर देखें; हर दिन के पन्ने पर आपके शहर का पारण समय दिया है। आगे कथा है।
व्रत कथा
युधिष्ठिर ने कहा, "हे मधुसूदन, आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? कृपा करके उसके बारे में बताइए।"
श्रीकृष्ण बोले, "उसका नाम पापांकुशा है। उस दिन मेरी पद्मनाभ रूप में पूजा करनी चाहिए। उसका फल लंबी तपस्या के बराबर है, और उसकी कथा छोटी और सीधी है। सुनो।"
विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। जैसा नाम, वैसा ही स्वभाव। चिड़ियाँ फँसाना और जानवर मारना उसकी रोज़ी थी, पर बात वहीं ख़त्म नहीं होती थी। वह जंगल के रास्तों पर राहगीरों को लूटता, शराब पीता, झगड़ा करता और ऐसे लोगों को भी सताता जिन्होंने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा था। न कभी पूजा की, न किसी को कुछ दिया, न कभी सोचा कि ज़िंदगी किस ओर जा रही है।
बरस ऐसे ही बीत गए। बुढ़ापे में एक रात उसे एक भयानक दृश्य दिखा। यमराज के दूत उसके सामने खड़े थे। वे बोले, "क्रोधन, तेरा समय पूरा हुआ। कल हम तुझे लेने आएँगे।"
ज़िंदगी में पहली बार क्रोधन को डर लगा। रात भर नींद नहीं आई। पौ फटते ही वह पहाड़ से नीचे भागा, बिना यह जाने कि कहाँ जा रहा है, और एक नदी के किनारे अंगिरा ऋषि के आश्रम तक जा पहुँचा। ऋषि अभी-अभी स्नान करके लौटे थे; उनकी जटाएँ भीगी थीं और चेहरा शांत था।
क्रोधन उनके पैरों में गिर पड़ा। "मुनिवर, मैंने जीवन भर बुरा ही बुरा किया है। जान ली है, चोरी की है, लोगों को सताया है। कभी किसी को एक दाना तक नहीं दिया। अब मौत दरवाज़े पर खड़ी है। मुझ जैसे आदमी के लिए भी कोई रास्ता है?"
अंगिरा ऋषि ने उस डरे हुए बूढ़े को बिना घृणा के देखा। वे समझ गए कि डर ने उसके भीतर कुछ खोल दिया है। बोले, "सुनो। आश्विन का शुक्ल पक्ष चल रहा है और उसकी पापांकुशा एकादशी बहुत पास है। उसे रखो। दिन भर उपवास करो। भगवान विष्णु की पद्मनाभ रूप में पूजा करो, जो शेषनाग पर लेटे हैं और जिनकी नाभि से कमल उठा है। रात को जागकर उनका नाम लो। तुमने जो भी किया हो, उस दिन का सच्चा मन नई शुरुआत के लिए काफ़ी है।"
क्रोधन ने ठीक वैसा ही किया। वह आश्रम के पास ही रुका, स्नान किया, उपवास रखा, जंगली फूल और जल भगवान को चढ़ाए, और रात भर बैठकर वैसे ही हरि का नाम दोहराता रहा जैसे ऋषि ने सिखाया था। इतनी देर वह जीवन में कभी शांत नहीं बैठा था।
माहात्म्य कहता है कि उस एक व्रत के पुण्य से उसके बीते जीवन का बोझ उतर गया। जब उसका समय आया, तो उसे लेने यमदूत नहीं, विष्णु के पार्षद आए, और वह गरुड़ पर बैठकर विष्णु धाम गया।
कथा पूरी करके श्रीकृष्ण बोले, "ऐसी है पापांकुशा। कहते हैं, जो इसे रखता है, वह अपने ननिहाल, अपने पितृकुल और अपनी पत्नी के कुल की दस-दस पीढ़ियों को भी तार देता है। और जो इस दिन सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न, जल, छाता या जूते दान करता है, उसे यमपुरी नहीं देखनी पड़ती।"
कथा को सहज मन से पढ़ें
कथा में यमदूत भी हैं और डरा हुआ आदमी भी, पर इसकी सीख डर के ठीक उलट है। जिसने बहुत नुक़सान किया था, उसे ऋषि दुत्कारते नहीं; उसे एक दरवाज़ा दिखाते हैं। कथा यह नहीं कहती कि एक व्रत दूसरों को पहुँचाए दुख को मिटा देता है। वह इतना कहती है कि लौटना हमेशा संभव है, और लौटने वाले का स्वागत होता है।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
लोग पापांकुशा नई शुरुआत के लिए रखते हैं: उन आदतों को छोड़ने के लिए जिन पर उन्हें गर्व नहीं, और दशहरे की विजय के बाद एक साफ़ दिन से फिर शुरू करने के लिए। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत जीवन भर के दोष मिटाता है और दोनों ओर के कुल को आशीर्वाद देता है; घरों में इसे कथा की उदारता की तरह पढ़ा जाता है, किसी नाप-तौल वाले दावे की तरह नहीं।
यह एकादशी कैसे रखी जाती है
भगवान की पद्मनाभ रूप में पूजा होती है, अक्सर कमल या दूसरे फूलों और दीपक के साथ। माहात्म्य में इस दिन के दान की प्रशंसा है, इसलिए बहुत-से परिवार किसी ज़रूरतमंद को अनाज, तिल, कंबल, छाता या चप्पल देते हैं। दशहरे की अगली सुबह होने से कई घरों में यह मेले-ठेले की भीड़ के बाद का एक शांत दिन बन जाता है। व्रत के पूरे चरण एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर हैं।
आगे-पीछे की एकादशियाँ
इससे पहले पितृ पक्ष में पितरों के लिए रखी जाने वाली इंदिरा एकादशी आती है, और इसके बाद दीपावली से कुछ दिन पहले की रमा एकादशी। अपने शहर में दिन के शुभ समय चौघड़िया में देखें।