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व्रत कथा · अजा एकादशी

अजा एकादशी व्रत कथा: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र

अजा एकादशी व्रत कथा: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का राज-पाट और परिवार छूटना, श्मशान में गौतम ऋषि से भेंट, और एकादशी से परीक्षा का अंत।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

अजा एकादशी भादों के कृष्ण पक्ष (अमांत में सावन) की एकादशी है, जो जन्माष्टमी के कुछ दिन बाद आती है, और इसकी कथा राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा के अंत की कथा है। कभी वचन न तोड़ने वाले राजा का सब कुछ छिन गया था, और श्मशान में एक ऋषि के कहने पर रखी गई इसी एकादशी से उन्हें सब वापस मिला।

अगली अजा एकादशी कब है, स्मार्त और वैष्णव दिन कौन-से हैं, यह एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर देखें; वहाँ हर दिन के पन्ने पर आपके शहर का पारण समय दिया है। अब कथा।

व्रत कथा

युधिष्ठिर ने कहा, "हे जनार्दन, भादों के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है, और उसे कैसे रखते हैं?"

श्रीकृष्ण बोले, "उसका नाम अजा है। वह मनुष्य के दोष मिटाती है, और उसकी चर्चा सुनना भी शुभ माना गया है। हरिश्चंद्र की कहानी सुनो।"

पुराने समय में अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र पूरी धरती के सम्राट थे। उनकी कीर्ति एक ही बात पर टिकी थी: उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला और कभी अपने वचन से नहीं फिरे। देवता तक उनकी चर्चा करते थे।

फिर उनके जीवन में एक लंबी, कठिन परीक्षा आई। सपने में दिए गए वचन से, या एक ऋषि को दिए दान के संकल्प से, राजा ने अपना पूरा राज्य दे दिया। दिया हुआ दान वापस नहीं लिया जाता, इसलिए वे रानी और छोटे बेटे को साथ लेकर ख़ाली हाथ महल से निकल पड़े। फिर भी वचन की दक्षिणा चुकानी बाक़ी थी। उसे चुकाने के लिए उन्होंने पत्नी और पुत्र को एक ब्राह्मण के घर सेवा के लिए बेच दिया, और ख़ुद को काशी के श्मशान के रखवाले के हाथ बेच दिया।

इस तरह धरती का सम्राट चिताओं के बीच नौकर बन गया। वे लकड़ी ढोते, आग सँभालते, और हर दाह-संस्कार पर मालिक का तय किया कर वसूलते। पहनने को मोटा कपड़ा, खाने को रूखी-सूखी रोटी। बरसों तक उन्होंने बिना शिकायत यह काम किया, क्योंकि वचन दे चुके थे। पर अकेले में बैठकर वे सोचते, "अब क्या करूँ? यह सब कब और कैसे ख़त्म होगा?"

एक दिन जब वे इसी सोच में डूबे बैठे थे, उधर से गौतम ऋषि निकले। हरिश्चंद्र ने संत को पहचाना, उठकर प्रणाम किया, और अपनी पूरी कहानी कह सुनाई: राज्य, रानी, बेटा, और यह श्मशान जहाँ अब वे काम करते थे।

गौतम ऋषि का मन करुणा से भर आया। बोले, "राजन, हिम्मत मत हारो। कुछ ही दिनों में भादों के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आ रही है। उसे पूरे मन से रखो। दिन भर उपवास करो, रात भर हरि का नाम लेते हुए जागो, तो तुम्हारा लंबा कष्ट ख़त्म हो जाएगा। तुम्हारा भाग्य है कि यह दिन इतना पास है।" इतना कहकर ऋषि आगे चले गए।

हरिश्चंद्र ने ठीक वैसा ही किया। एकादशी आई तो उन्होंने उपवास रखा, श्मशान के एक सेवक से जितना बन सका उतनी विष्णु पूजा की, और रात भर बैठकर भगवान को याद करते रहे। उसी रात उनके दुखों का हिसाब पूरा हो गया।

सुबह आकाश में नगाड़े बजे और उनके चारों ओर फूल बरसने लगे। ब्रह्मा और इंद्र समेत देवता प्रकट हुए और बोले कि उनकी परीक्षा पूरी हुई। जिस बेटे को वे खोया हुआ समझ बैठे थे, वह जीवित सामने खड़ा था। रानी फिर से रानी के वेश में बेटे के पास खड़ी थीं। उन्हें उनका राज्य लौटा दिया गया, और उन्होंने बहुत बरस तक राज किया। जीवन के अंत में वे परिवार और प्रजा के साथ स्वर्ग गए।

श्रीकृष्ण बोले, "यह अजा एकादशी का प्रभाव है। जो इसे रखता है और जो यह कथा सुनता है, वह हरिश्चंद्र की तरह संकट से उबर जाता है।"

कथा को सहज मन से पढ़ें

यह कठिन कथा है: बिकी हुई पत्नी और बच्चा, श्मशान, खोया हुआ बेटा। बड़ी कथा में ये सब परीक्षाएँ थीं, ताकि दुनिया एक आदमी की सच्चाई देख सके, और इनमें से कोई भी अंत नहीं था। एकादशी किसी से ऐसा कष्ट उठाने को नहीं कहती। यह उन लोगों से बात करती है जो किसी लंबी मुश्किल से गुज़र रहे हों, और प्यार से कहती है कि मुश्किल का भी अंत होता है।

कथा के दूसरे रूप

हरिश्चंद्र की पूरी कथा मार्कंडेय पुराण में मिलती है और उत्तर भारत के लोक-नाटकों में बहुत प्रिय है। उसमें राजा की परीक्षा लेने वाले विश्वामित्र हैं, और वह मार्मिक दृश्य है जब रानी तारामती अपने बेटे को उसी श्मशान में लाती हैं जिसकी रखवाली उनके पति करते हैं, और राजा को तब भी उनसे कर माँगना पड़ता है। अजा का माहात्म्य उस बड़ी कथा को मानकर चलता है और उसका अपना अंत जोड़ता है: वह व्रत जिससे परीक्षा पूरी हुई।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

लोग अजा एकादशी कठिन समय में भी सच पर टिके रहने के लिए रखते हैं, और इस प्रार्थना के साथ कि कोई लंबी मुसीबत, चाहे क़र्ज़ हो, घर में बीमारी हो या किसी से बिछोह, अपने अंत तक पहुँचे। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत पुराने दोष मिटाकर विष्णु लोक तक ले जाता है; परिवार इसे कथा से मिली आस की तरह मानते हैं।

यह एकादशी कैसे रखी जाती है

व्रत का क्रम हर एकादशी जैसा ही है, पर बहुत-से घर इसके दूसरे नाम अन्नदा के भाव से किसी ज़रूरतमंद को अनाज, आटा या भोजन देते हैं। जन्माष्टमी के तुरंत बाद आने से कई घरों में उसी उत्सव की कृष्ण पूजा आगे चलती रहती है। कुछ लोग इस दिन मन में सच बोलने का छोटा-सा संकल्प लेते हैं। पूरी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आगे-पीछे की एकादशियाँ

अजा से पहले श्रावण पुत्रदा एकादशी आती है, और इसके बाद परिवर्तिनी एकादशी, जब भगवान नींद में करवट बदलते हैं। अपने शहर की तिथि किसी भी दिन पंचांग में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अजा एकादशी की कथा किसने सुनाई?

व्रत की किताबों में श्रीकृष्ण यह कथा युधिष्ठिर को सुनाते हैं, जब वे भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछते हैं। कथा के भीतर गौतम ऋषि राजा हरिश्चंद्र को आने वाली अजा एकादशी के बारे में बताते हैं।

अजा एकादशी का राजा हरिश्चंद्र से क्या संबंध है?

इस एकादशी की कथा हरिश्चंद्र की लंबी परीक्षा का अंत है। वचन निभाने में राज्य, पत्नी और पुत्र सब छूट जाने के बाद, माहात्म्य के अनुसार अजा एकादशी के व्रत से ही उनका दुख ख़त्म हुआ और परिवार फिर मिला।

अन्नदा एकादशी किसे कहते हैं?

बहुत-से पंचांगों और व्रत की किताबों में अजा एकादशी का दूसरा नाम अन्नदा है, यानी अन्न देने वाली। कुछ परिवार इस दिन किसी ज़रूरतमंद को अनाज या भोजन देते हैं।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • पद्म पुराण, उत्तर खंड, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • भविष्योत्तर पुराण, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • उत्तर भारत के घरों और लोक-नाटकों में कही जाने वाली हरिश्चंद्र की कथा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति