कामदा एकादशी चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो राम नवमी के दो दिन बाद आती है और नए चांद्र वर्ष की पहली एकादशी मानी जाती है। इसकी कथा गंधर्व ललित की है, जो एक शाप से राक्षस बन गए थे, और उनकी पत्नी ललिता की, जिनके इस दिन के व्रत ने उन्हें फिर से अपना रूप लौटा दिया।
आने वाली सब एकादशियाँ, स्मार्त और वैष्णव दिन, और आपके शहर में पारण का समय एकादशी व्रत की तिथियाँ पृष्ठ पर हैं; वहाँ कामदा एकादशी वाला दिन खोलकर देख लें कि व्रत कब खोलना है। नीचे केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
कामदा एकादशी की कथा
एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा, "भगवन, फाल्गुन के अंत वाली एकादशी की महिमा आपने सुना दी। अब चैत्र के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है और उसका फल क्या है?"
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, "यही प्रश्न कभी श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप ने अपने गुरु वसिष्ठ जी से पूछा था। सुनो, मुनि ने उन्हें क्या बताया।"
भोगीपुर का गायक
पुराने समय में भोगीपुर नाम का एक नगर था, सोने-चाँदी और बाग़-बग़ीचों से भरा हुआ। वहाँ नागों के राजा पुंडरीक राज करते थे। उनकी सभा में गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ रहती थीं, और हर शाम गाना-बजाना होता था। उन्हीं गायकों में एक नौजवान गंधर्व था, ललित, जिसकी आवाज़ पर पूरी सभा मोहित रहती थी। उसकी पत्नी ललिता नृत्य करती थी। दोनों में इतना प्रेम था कि एक-दूसरे से थोड़ी देर का बिछोह भी उन्हें खलता था।
एक दिन ललित को राजा के सामने गाने बुलाया गया। उस दिन ललिता साथ नहीं थी। ललित ने अच्छी शुरुआत की, पर गाते-गाते उसका मन पत्नी की ओर चला गया। उसे ललिता का चेहरा याद आने लगा, उसकी बातें याद आने लगीं, और वह भूल गया कि कहाँ खड़ा है। सुर फिसल गया, ताल डगमगा गई, बोल आगे-पीछे हो गए।
सभा में कर्कोटक नाम का एक नाग बैठा था, जिसकी नज़र से कुछ नहीं छिपता था। उसने राजा के कान में बता दिया कि गायक का ध्यान कहाँ है। पुंडरीक को बहुत क्रोध आया। उन्होंने कहा, "मेरे सामने खड़े होकर तुम पत्नी के बारे में सोचते हो! जाओ, जिस रूप से गाते हो वह रूप खो दो। नरभक्षी राक्षस बन जाओ।"
उसी क्षण ललित का रूप बदल गया। शरीर विशाल और काला हो गया, चेहरा भयानक, और भूख ऐसी कि मिटे ही नहीं। वह नगर छोड़कर जंगल में भाग गया और वहाँ दिन-रात बेचैन भटकने लगा।
वन में ललिता
ललिता ने यह सुना तो घर बैठकर आँसू नहीं बहाए। वह पति के पीछे चल पड़ी। जंगल में उस डरावने जीव के पीछे-पीछे चलती रही; जब पास जाना ठीक न होता तो दूर रहती, और जब हो सकता तो पास जाकर बैठ जाती। एक ही बात उसके मन में थी: इन्हें इस हाल से कैसे निकालूँ।
चलते-चलते वह विंध्य पर्वत पर पहुँची और वहाँ शृंगी ऋषि का आश्रम देखा। भीतर जाकर उसने प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी रही। ऋषि ने पूछा, "बेटी, तुम कौन हो, यहाँ कैसे आई?" ललिता बोली, "महाराज, मैं गंधर्व ललित की पत्नी हूँ। मेरे पति शाप से राक्षस बन गए हैं। बताइए, मैं उन्हें कैसे छुड़ाऊँ?"
ऋषि का मन पिघल गया। उन्होंने कहा, "चैत्र शुक्ल की एकादशी पास ही है। उसका नाम कामदा है, क्योंकि सच्चे मन से माँगी हुई इच्छा वह पूरी करती है। विधि से उसका व्रत करो और उसका पुण्य अपने पति को दे दो। शाप टिक नहीं पाएगा।"
ललिता ने ठीक वैसा ही किया। एकादशी को उसने श्रद्धा से उपवास रखा, दिन भर भगवान का भजन-पूजन किया और रात जागकर बिताई। द्वादशी की सुबह उसने ऋषि के सामने और भगवान वासुदेव की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहा, "इस व्रत से जो भी पुण्य मिला है, वह मेरे पति को मिले, और वे इस शाप से मुक्त हों।"
उसके इतना कहते ही शाप टूट गया। ललित अपने पुराने रूप में सामने खड़ा था, वही सुंदर गंधर्व, वही मीठी आवाज़, वही कोमल स्वभाव। आकाश से उनके लिए विमान आया, और दोनों साथ-साथ अपने लोक लौट गए।
वसिष्ठ जी ने कथा पूरी करके दिलीप से कहा कि यह एकादशी भारी से भारी दोष भी मिटा देती है, और इसकी कथा सुनने-पढ़ने वाले को भी उसका फल मिलता है।
कथा को सहज मन से पढ़ें
इस कथा के बीच में एक राजा का शाप है, और सुनने में कठोर लगता है कि ज़रा-सा मन भटका और आदमी राक्षस बन गया। परंपरा इसे यह चेतावनी नहीं मानती कि छोटी भूल का बड़ा दंड मिलता है। पुराने लोग इसे ऐसे समझाते थे कि जो काम कर रहे हो, उसमें पूरा मन लगाओ; संगीत जैसी विद्या पूरा ध्यान माँगती है। कथा का असली भार ललिता पर है, जिसने मुसीबत का जवाब धीरज, हिम्मत और प्रेम से दिया।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
नाम ही सब कहता है: कामदा, यानी कामना पूरी करने वाली। माहात्म्य में लिखा है कि यह व्रत दोषों को ऐसे जला देता है जैसे आग सूखी घास को, और जैसे ललित राक्षस-योनि से छूटे, वैसे ही श्रद्धा से व्रत करने वाला कठिन दशा से छूटता है। यह ग्रंथ का कथन है; घर-परिवार इसे दिन पर मिला आशीर्वाद मानकर सुनते हैं, कोई लेन-देन नहीं।
ज़्यादातर लोगों के लिए इसका अर्थ और भी सीधा है। साल की पहली एकादशी होने के कारण बहुत-से लोग यहीं से हर एकादशी का नियम शुरू करते हैं। और एकादशी की कथाओं में यह सबसे साफ़ उदाहरण है किसी दूसरे के लिए व्रत रखने का। ललिता ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा था। आज भी पत्नियाँ, माताएँ, पिता और बच्चे किसी अपने को मन में रखकर यह व्रत करते हैं।
कैसे रखी जाती है
कामदा एकादशी बाक़ी एकादशियों की तरह ही रखी जाती है: दशमी की शाम हल्का भोजन, एकादशी को फलाहार या निर्जल उपवास, तुलसी के साथ विष्णु पूजा, और द्वादशी को पारण। राम नवमी के ठीक बाद पड़ने से कई घरों में इस दिन की पूजा में श्रीराम का नाम भी जुड़ जाता है। कुछ लोग ललिता की तरह रात भर भजन करते हैं, और द्वादशी की पूजा में मन ही मन उस अपने का नाम लेते हैं जिसके लिए व्रत रखा था। संकल्प से पारण तक पूरी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है; बुज़ुर्ग, गर्भवती स्त्रियाँ और दवा लेने वाले लोग पानी और फल के साथ व्रत रख सकते हैं, और पहले डॉक्टर की सलाह मानें।
आस-पास की एकादशियाँ
कामदा से साल शुरू होता है। इससे ठीक पहले, फाल्गुन के अंत में, पापमोचिनी एकादशी आती है, और परमा एकादशी उन दो एकादशियों में से है जो केवल अधिक मास वाले साल में आती हैं। कामदा के बाद वैशाख के कृष्ण पक्ष में वरूथिनी एकादशी आती है, राजा मांधाता और भालू की कथा वाली। आपके शहर में एकादशी कब लगती और कब उतरती है, यह आज का पंचांग बताता है।