मोहिनी एकादशी वैशाख के शुक्ल पक्ष में आती है, और इसका नाम भगवान विष्णु के उस मोहिनी रूप पर है जो उन्होंने समुद्र मंथन के समय धरा था। इसकी कथा वसिष्ठ मुनि ने श्रीराम को सुनाई थी: धनी सेठ का बेटा धृष्टबुद्धि अपना सब कुछ बर्बाद कर बैठा, और एक ऋषि की करुणा और इस एक व्रत ने उसकी ज़िंदगी पलट दी।
अगली मोहिनी एकादशी किस दिन है और आपके शहर में व्रत खोलने का समय क्या है, यह एकादशी व्रत तिथियाँ पृष्ठ पर है, जहाँ हर एकादशी का अलग पन्ना है। यहाँ कथा अपने शब्दों में।
मोहिनी एकादशी की कथा
युधिष्ठिर ने पूछा, "हे कृष्ण, वैशाख के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है?" श्रीकृष्ण बोले, "यही बात कभी श्रीराम ने अपने गुरु से पूछी थी। सीता जी से बिछड़कर जब उनका शोक किसी तरह कम नहीं हो रहा था, तब उन्होंने वसिष्ठ जी से कहा कि कोई ऐसा व्रत बताइए जो दुख हरे और मन को साफ़ करे। वसिष्ठ जी ने उन्हें मोहिनी एकादशी के बारे में बताया, और एक ऐसे नौजवान की कहानी सुनाई जिसने इसका असर अपने जीवन में देखा।"
भद्रावती के सेठ
सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम का सुंदर नगर था, जहाँ राजा द्युतिमान का राज था। उसी नगर में धनपाल नाम के एक सेठ रहते थे। जैसा नाम, वैसा धन, पर धन को उन्होंने अच्छे कामों में लगाया था। उन्होंने कुएँ और तालाब खुदवाए, बाग़ लगवाए, मुसाफ़िरों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं, और गर्मी में रास्तों पर प्याऊ बिठाए। वे विष्णु भक्त थे और सबके साथ उदार।
धनपाल के पाँच बेटे थे। बड़े चार सीधे और भले थे। सबसे छोटा, धृष्टबुद्धि, ठीक उल्टा निकला। दिन जुए में बीतता, रातें बुरी संगत में। शराब पीता, झूठ बोलता, बड़ों का अपमान करता। घर से बिना पूछे पैसा उठाता और उतनी ही जल्दी उड़ा देता।
पिता ने पहले समझाया, फिर मिन्नतें कीं, फिर डाँटा। जब कुछ न बदला, तो भारी मन से धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया। भाइयों और रिश्तेदारों ने भी मुँह फेर लिया।
भटकने के बरस
कुछ दिन तो धृष्टबुद्धि अपने पास बचे सामान पर जिया। अँगूठियाँ बेचीं, अच्छे कपड़े बेचे, गहने बेचे। जब वह सब ख़त्म हुआ, तो मौज-मस्ती के साथी भी ग़ायब हो गए। भूख से तंग आकर उसने चोरी शुरू कर दी। पकड़ा गया, सज़ा हुई, जेल में डाला गया, और छूटने पर राजा ने उसे नगर से बाहर निकाल दिया।
वह जंगल में चला गया। वहाँ शिकारी बनकर रहने लगा, पशु-पक्षी मारकर पेट भरता। मन कभी शांत न होता, पेट कभी पूरा न भरता। बरस इसी तरह बीतते गए, और उसके किए हुए कर्मों का बोझ तन-मन दोनों पर बढ़ता गया।
पानी की चंद बूँदें
एक दिन, वैशाख के महीने में, दुख और भूख से टूटा हुआ धृष्टबुद्धि भटकते-भटकते कौंडिन्य ऋषि के आश्रम जा पहुँचा। ऋषि अभी-अभी गंगा स्नान करके लौटे थे और उनके वस्त्र गीले थे। पास से गुज़रते हुए उनके कपड़ों से पानी की कुछ बूँदें धृष्टबुद्धि पर गिर पड़ीं।
उन बूँदों के छूते ही उसके भीतर कुछ बदल गया। बरसों बाद पहली बार उसका मन इतना साफ़ हुआ कि वह देख सका कि उसने अपने जीवन का क्या हाल कर दिया है। वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और बोला, "महाराज, ऐसा कोई ग़लत काम नहीं जो मैंने न किया हो। मेरे पास कुछ नहीं बचा, आत्मसम्मान भी नहीं। क्या मुझ जैसे के लिए भी कोई रास्ता है, ऐसा रास्ता जिसमें धन न लगे?"
कौंडिन्य ने उसे करुणा से देखा और कहा, "है, बेटा। इसी महीने की शुक्ल एकादशी आने वाली है। उसका नाम मोहिनी है। सच्चे मन से उसका व्रत करो। कहते हैं, वह पहाड़ जैसे ढेर हुए दोषों को भी मिटा देती है।"
धृष्टबुद्धि ने वैसा ही किया। उसने उपवास रखा, भगवान विष्णु की पूजा की, रात जागकर बिताई, और यह सब सच्चे मन से किया, बीते कल पर पछतावे और आने वाले कल की आस के साथ। जो बोझ वह बरसों से ढो रहा था, वह उतर गया। उसका जीवन बदल गया, और कथा कहती है कि अंत में वह गरुड़ पर बैठकर भगवान के धाम गया।
वसिष्ठ जी ने श्रीराम से कहा कि मन पर छाए धुंध को हटाने में तीनों लोकों में मोहिनी जैसा कोई व्रत नहीं, और इसकी कथा पढ़ने-सुनने से भी बड़े दान जितना पुण्य मिलता है।
कथा को सहज मन से पढ़ें
कथा में सज़ा है, जेल है, देश-निकाला है, जंगल का कठिन जीवन है, और माहात्म्य पहाड़ जैसे पापों की बात करता है। इसमें से कुछ भी डराने के लिए नहीं है। असल में यह दूसरे मौक़े की कथा है: जिसे सबने ठुकरा दिया था, उसे भी किसी ने प्रेम से देखा, और लौटने का रास्ता पानी की कुछ बूँदों और एक ऐसे ऋषि से शुरू हुआ जिसने उसे दुत्कारा नहीं। घरों में यह कथा इसीलिए सुनाई जाती है कि कोई ख़ुद को लौटने के लायक़ न मानने की भूल न करे।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
मोहिनी यानी मोह लेने वाली। समुद्र मंथन में मोहिनी बने भगवान ने असुरों का ध्यान खींच लिया और अमृत देवताओं तक पहुँच गया। यह दिन उसी भाव से रखा जाता है: मन को नीचे खींचने वाली आदतों और मोह की पकड़ ढीली करने के लिए। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत मोह और शोक दूर करता है और बड़े तीर्थों और दानों जितना फल देता है; परिवार इन वचनों को हौसला मानकर सुनते हैं, कोई हिसाब-किताब नहीं।
चूँकि इस कथा के श्रोता श्रीराम हैं, बहुत-से घरों में मोहिनी एकादशी पर श्रीकृष्ण के साथ श्रीराम का भी स्मरण होता है।
कैसे रखी जाती है
मोहिनी एकादशी वैशाख की गर्मी में आती है, इसलिए इस दिन का दान अक्सर सेठ धनपाल की राह पर चलता है: प्याऊ लगाना, पीने के पानी के घड़े रखना, धूप में काम करने वालों को फल और पंखे देना। कई लोग ऋषि कौंडिन्य की तरह भोर में स्नान करते हैं और पूजा से पहले थोड़ा गंगाजल छिड़कते हैं। ज़्यादातर लोग फलाहार रखते हैं, और जिन्हें गर्मी भारी पड़ती हो वे बेझिझक पानी पीते रहें। संकल्प से पारण तक बाक़ी विधि एकादशी पूजा विधि वाले पृष्ठ पर है।
इसके पहले और बाद की एकादशी
मोहिनी से पहले वरूथिनी एकादशी आती है, राजा मांधाता, भालू और मथुरा के व्रत की कथा। इसके बाद ज्येष्ठ कृष्ण में अपरा एकादशी आती है, जिसमें एक मारे गए राजा और एक ऋषि के दान की कहानी है। किसी भी दिन की तिथि देखने के लिए अपने शहर का पंचांग खोलें।