योगिनी एकादशी आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी है (अमांत गणना में ज्येष्ठ), और देवशयनी व चातुर्मास से पहले की आख़िरी एकादशी है। इसकी कथा कुबेर की नगरी के माली हेममाली की है, जिसने अपना इकलौता काम भुला दिया, शाप से बीमार हुआ, और मार्कंडेय ऋषि के कहने पर यह व्रत रखकर ठीक हुआ।
अगली योगिनी एकादशी कब है और आपके शहर में पारण का समय क्या है, यह एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर मिलेगा। नीचे कथा, हमारे शब्दों में।
योगिनी एकादशी की कथा
युधिष्ठिर ने आषाढ़ कृष्ण की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले, "उसका नाम योगिनी है। वह दोषों को धो देती है और संसार-सागर से पार लगाती है। सुनो, एक ऐसे जीव की कहानी, जिसने बड़ी ठोकर खाकर इसका मोल जाना।"
शिव जी के फूल
हिमालय में अलकापुरी नाम की जगमगाती नगरी है, जहाँ धन के स्वामी कुबेर रहते हैं। इतने ख़ज़ाने के बावजूद कुबेर सबसे पहले शिव जी के भक्त थे, और रोज़ ताज़े फूलों से उनकी पूजा करते थे। फूल लाने का काम उनके माली का था, हेममाली नाम के एक यक्ष का। वह हर सुबह मानसरोवर जाता और पूजा के लिए कमल और दूसरे फूल चुनकर लाता।
हेममाली की पत्नी थी विशालाक्षी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली, और वह उसे बहुत चाहता था। एक सुबह वह रोज़ की तरह सरोवर गया और फूल तोड़े। पर महल जाने के बजाय वह पहले घर चला गया, टोकरी रखी, और पत्नी के पास ही रुक गया। घंटे बीतते गए। महल की बात उसके दिमाग़ से ही निकल गई।
कुबेर की प्रतीक्षा
उधर महल में कुबेर पूजा के लिए तैयार बैठे थे। समय निकल गया, फूल नहीं आए। दोपहर होते-होते उनका मन बेचैन हो गया। उन्होंने सेवकों को पता लगाने भेजा। सेवक लौटे और बोले, "महाराज, माली घर पर पत्नी के साथ है। वह आया ही नहीं।"
कुबेर का धीरज टूट गया। उन्होंने हेममाली को बुलवाया। वह काँपता हुआ आया, हाथ में अब भी फूल थे, और सिर झुकाए खड़ा हो गया।
कुबेर बोले, "अपने सुख के लिए तुमने भगवान शिव को इंतज़ार कराया। तो अब जानो कि अपने प्रिय से दूर रहना क्या होता है। तुम्हारा शरीर सफ़ेद घावों से भर जाए, और तुम इस नगरी को छोड़कर मनुष्यों के लोक में जा गिरो।"
उसी क्षण हेममाली के शरीर पर घाव उभर आए। वह अलकापुरी से धरती पर आ गिरा, अकेला, विशालाक्षी से दूर, और हर जानी-पहचानी चीज़ से दूर।
मार्कंडेय ऋषि तक का लंबा रास्ता
धरती पर वह जंगलों में भटकता रहा। न खाने को कुछ, न सिर पर छत, ऊपर से रोग और पीड़ा। पर एक चीज़ उससे नहीं छूटी थी: इतने समय शिव पूजा की सेवा करने के कारण उसे याद था कि वह कौन है और उससे क्या भूल हुई। यही याद उसे निराशा में डूबने से बचाती रही, और यही उसे चलाती रही।
आख़िर वह हिमालय की चढ़ाई चढ़कर मार्कंडेय ऋषि के आश्रम पहुँचा। ये वही मार्कंडेय थे जिन्हें स्वयं शिव जी ने लंबी आयु का वर दिया था; कथाएँ कहती हैं कि उनकी आयु ब्रह्मा जी जैसी लंबी थी। हेममाली ने उन्हें दूर से देखा और दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा।
ऋषि ने पूछा, "तुम कौन हो, और इस हाल में कैसे पहुँचे?" हेममाली ने सब कुछ बता दिया, अपनी ग़लती भी नहीं छिपाई। बोला, "महाराज, मेरा एक ही काम था, और वही मैंने भुला दिया। स्वामी ने शाप दिया, और ठीक ही दिया। पर क्या लौटने का कोई रास्ता है?"
उसकी सच्चाई ने ऋषि का मन छू लिया। वे बोले, "तुमने सच कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक व्रत बताता हूँ जो तुम्हें इस हाल से निकालेगा। आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में योगिनी नाम की एकादशी आती है। उसे श्रद्धा से रखो, शाप तुमसे छूट जाएगा।"
हेममाली ने ठीक वैसे ही व्रत रखा जैसे ऋषि ने सिखाया था। व्रत पूरा होते ही उसके घाव मिट गए, शरीर फिर से स्वस्थ और तेजस्वी हो गया, और वह अलकापुरी लौट गया, कुबेर की सेवा में और विशालाक्षी के पास।
कथा को सहज मन से पढ़ें
इस कथा के बीच में शाप से मिला एक रोग है, और अगर घर में कोई बीमार हो तो यह सुनकर मन दुखता है। परंपरा यह नहीं कहती कि बीमारी किसी ग़लती की सज़ा है, और इसे इस तरह पढ़ना भी नहीं चाहिए। कथा जिस बात को सामने रखती है, वह है हेममाली की सच्चाई, जब उसने आख़िरकार अपनी भूल मानी, और वे ऋषि जिन्होंने उस सच्चाई का जवाब फ़ैसले से नहीं, मदद से दिया। स्वस्थ होना कृपा की तरह कहा गया है; किसी का रोग उसके बारे में कोई फ़ैसला नहीं।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
माहात्म्य कहता है कि योगिनी एकादशी रखने से अट्ठासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य मिलता है, और यह दोषों और रोगों को हरती है। ये ग्रंथ के वचन हैं। परिवार इनमें सुधार का एक दिन देखते हैं: कोई छूटा हुआ कर्तव्य फिर से निभाने का, किसी बीमार अपने के लिए प्रार्थना करने का, और कोई ज़रूरी काम जो टल गया था, उसे फिर हाथ में लेने का।
भगवान के चार महीने के विश्राम से पहले की आख़िरी एकादशी होने के कारण यह एक दहलीज़ जैसी भी लगती है, चातुर्मास शुरू होने से पहले घर और मन सँवार लेने का समय।
कैसे रखी जाती है
योगिनी एकादशी की विधि वही है जो एकादशी पूजा विधि में दी गई है, दशमी के हल्के भोजन से द्वादशी के पारण तक। हेममाली को याद करते हुए कुछ परिवार इस दिन विष्णु जी और शिव जी दोनों को ताज़े फूल चढ़ाते हैं, और कुछ लोग तुलसी के आगे दीया जलाने के साथ-साथ शिव मंदिर में भी दीपक रख आते हैं। बहुत-से लोग किसी ख़ास बीमार व्यक्ति को मन में रखकर व्रत करते हैं। जो ख़ुद बीमार हों, वे डॉक्टर की सलाह से खाएँ-पिएँ; प्रार्थना के लिए उपवास ज़रूरी नहीं।
पास की एकादशियाँ
योगिनी से पहले निर्जला एकादशी आती है, भीम का बिना पानी वाला व्रत। इसके बाद देवशयनी एकादशी आती है, जब भगवान विश्राम में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। उस दिन की तिथि और शुभ समय के लिए दैनिक पंचांग देखें।