पौष पुत्रदा एकादशी पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, कड़ाके की सर्दी के दिनों में आने वाली, और साल की दो पुत्रदा एकादशियों में से दूसरी। इसकी कथा भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या की है, जिनके कोई संतान नहीं थी, और उस दिन की है जब राजा अकेले घोड़े पर वन में निकल गए और वहाँ उन्हें ऋषियों ने बताया कि आज कौन-सा दिन है।
यह एकादशी अगली बार कब आएगी, यह साल की बाक़ी एकादशियों के साथ एकादशी व्रत की तिथियाँ सूची में देखा जा सकता है; वहाँ हर दिन के पृष्ठ पर आपके शहर का पारण समय भी दिया है, यानी व्रत खोलने का समय। नीचे केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
पौष पुत्रदा एकादशी की कथा
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, "हे केशव, पौष के कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी की बात तो आपने सुना दी। अब शुक्ल पक्ष वाली एकादशी का नाम क्या है, और उस दिन किसकी पूजा होती है?"
श्रीकृष्ण बोले, "राजन, उसका नाम पुत्रदा है, और उस दिन स्वयं नारायण पूजे जाते हैं। तीनों लोकों में इससे बढ़कर फल देने वाला व्रत मुश्किल से मिलेगा। सुनो, एक राजा को यह व्रत लगभग संयोग से कैसे मिला।"
सब कुछ था, बस एक कमी थी
भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम के राजा राज करते थे, और उनकी रानी का नाम शैब्या था। राज्य में धन-धान्य की कमी नहीं थी, ख़ज़ाना भरा था, सेना वफ़ादार थी, प्रजा सुखी थी। पर महल में कोई बच्चा नहीं खेलता था। साल बीतते गए, और राजा-रानी इस बारे में बोलते कम थे, पर मन ही मन घुलते ज़्यादा थे।
राजा का दुख घर के सूनेपन से आगे तक जाता था। वह पितरों का तर्पण करते और सोचते कि पुराने समय की रीत में पिता के बाद पुत्र ही यह जल और पिंड आगे देता है। धीरे-धीरे उनके मन में बैठ गया कि पितर उनका दिया जल भी आह भरकर लेते होंगे, यह सोचकर कि इसके बाद हमें कोई कुछ नहीं देगा। यह बात उनके मन से निकलती ही नहीं थी। धन, मित्र, राजगद्दी, सब कुछ उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे उन्हीं के साथ ख़त्म हो जाएगा।
रानी भी अपने ढंग से दुखी रहती थीं, और दोनों की कितनी ही शामें चुपचाप बीत जाती थीं।
घने वन में
एक दिन राजा से महल में रहा न गया। किसी से कुछ कहे बिना वे घोड़े पर सवार हुए और एक घने जंगल में चले गए। रास्ते में हिरनी अपने छौनों के साथ चर रही थी, घोंसलों में चिड़ियाँ बच्चों को दाना खिला रही थीं, हाथी अपने बच्चों को बीच में लिए चल रहे थे। जिधर देखते, माँ-बाप और बच्चे ही दिखते, और हर दृश्य उनके मन की टीस को और गहरा कर देता।
दोपहर होते-होते वे थक गए, प्यास से गला सूखने लगा, और मन में यही चलने लगा कि इस जन्म में या पिछले किसी जन्म में ऐसा क्या किया था कि यह दिन देखना पड़ा। तभी पेड़ों के बीच से पानी चमका। एक बड़ा सरोवर था, कमलों से ढका हुआ, जिसमें हंस और बत्तखें तैर रहे थे। किनारे पर ऋषियों की छोटी-छोटी कुटियाँ थीं, और कई मुनि जल के पास बैठे भगवान का नाम जप रहे थे।
राजा का मन खिल उठा। वे घोड़े से उतरे, हाथ जोड़कर ऋषियों के पास गए और एक-एक को प्रणाम किया। ऋषि उनकी नम्रता से प्रसन्न हुए और बोले, "राजन, हम तुमसे प्रसन्न हैं। बताओ, तुम्हारे मन में क्या दुख है?"
राजा ने पहले पूछा, "आप कौन हैं, और यहाँ किसलिए इकट्ठे हुए हैं?" ऋषियों ने कहा, "हम विश्वेदेव हैं। आज पुत्रदा एकादशी है, जो व्रत करने वाले को संतान देती है, इसलिए हम इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।"
राजा का गला भर आया। बड़ी मुश्किल से बोले, "मेरे कोई पुत्र नहीं है। आप प्रसन्न हैं, तो यही वर दीजिए।"
ऋषियों ने कहा, "तो आज ही यह व्रत करो, क्योंकि आज ही वह दिन है। पूरे मन से करोगे तो तुम्हारे घर पुत्र जन्म लेगा।"
सरोवर के किनारे व्रत
सुकेतुमान तैयारी के लिए महल नहीं लौटे। उन्होंने वहीं, ऋषियों के बीच, उसी दिन एकादशी का व्रत रख लिया। अन्न का एक दाना नहीं लिया, मन विष्णु में लगाए रखा, और दिन-रात ऋषियों के जप-भजन सुनते रहे। द्वादशी की सुबह उनके बताए अनुसार पारण किया, बार-बार उनके चरणों में सिर नवाया, और भद्रावती लौट आए।
कुछ समय बाद रानी शैब्या ने गर्भ धारण किया, और महल में पुत्र का जन्म हुआ। वह बालक बड़ा होकर तेजस्वी और योग्य राजकुमार बना, माता-पिता का सहारा, और उनके बाद प्रजा का अच्छा राजा।
कथा पूरी करके श्रीकृष्ण ने कहा कि जो पुत्रदा एकादशी का व्रत रखता है, और जो ध्यान से इसकी कथा सुनता या पढ़ता है, उसे भी वैसा ही आशीर्वाद मिलता है जैसा राजा को मिला।
कथा को सहज मन से पढ़ें
राजा का दुख उस पुराने ज़माने का है, जब वंश बेटे से चलता माना जाता था और पितरों का श्राद्ध उसी के हाथों होता था। आज के परिवार इसे उसी संदर्भ में सुनते हैं। वे यह व्रत बेटा हो या बेटी, किसी भी संतान के लिए रखते हैं, सुरक्षित प्रसव के लिए रखते हैं, या घर में जो बच्चे हैं उनकी भलाई के लिए रखते हैं। यह कथा यह नहीं कहती कि बिना संतान का घर अधूरा है। सुनने वालों के मन में राजा का अपने दुख को सच्चाई से कह देना और ऋषियों का स्नेह से उसका उत्तर देना ही रह जाता है।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
पुत्रदा का अर्थ है संतान देने वाली, और माहात्म्य साफ़ कहता है कि यह व्रत संतान के साथ इस लोक और परलोक का सुख भी देता है। यह ग्रंथ का अपना कथन है; परिवार इसे सौदे की तरह नहीं, दिन के आशीर्वाद की तरह सुनते हैं।
असल में इस दिन का दायरा और बड़ा है। संतान की आस रखने वाले पति-पत्नी साथ मिलकर व्रत रखते हैं; माता-पिता उन बच्चों के लिए रखते हैं जो बीमार हैं, दूर हैं, या कोई नया काम शुरू कर रहे हैं; दादा-दादी पूरे परिवार के लिए रखते हैं। पौष की यह एकादशी सबसे ठंडे दिनों में आती है, इसलिए इसमें एक शांत, घर के भीतर की गर्माहट वाला भाव रहता है।
कैसे रखी जाती है
पौष पुत्रदा एकादशी बाक़ी एकादशियों की तरह ही रखी जाती है: विष्णु पूजा, तुलसी दल, फलाहार और द्वादशी को पारण। कथा के अंत में राजा और रानी दोनों साथ हैं, इसलिए कई दंपती पूजा में साथ बैठते हैं, और कुछ लोग किसी बच्चे का नाम लेकर, या जिसकी आस है उसे मन में रखकर प्रार्थना करते हैं। दक्षिण भारत में जब यही दिन वैकुंठ एकादशी होता है, तो लोग भोर से पहले विष्णु मंदिरों में जाकर उस उत्तरी द्वार से गुज़रते हैं जो इसी दिन खोला जाता है। संकल्प से पारण तक पूरी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है; गर्भवती स्त्रियाँ ख़ास तौर पर हल्का व्रत ही रखें, और पहले डॉक्टर की सलाह मानें।
आस-पास की एकादशियाँ
इससे पहले पौष के कृष्ण पक्ष में सफला एकादशी आती है। इसके बाद माघ के कृष्ण पक्ष में षटतिला एकादशी आती है, जिस दिन तिल का छह तरह से उपयोग होता है। आपके शहर में एकादशी तिथि कब शुरू और कब ख़त्म होती है, यह आज का पंचांग बताता है।