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व्रत कथा · कामिका एकादशी

कामिका एकादशी व्रत कथा: ठाकुर का पश्चाताप

कामिका एकादशी व्रत कथा सरल शब्दों में: क्रोध में ब्राह्मण की जान लेने वाला ठाकुर, उसका पछतावा, और तुलसी पूजा व रात्रि जागरण जिससे उसे शांति मिली।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

कामिका एकादशी श्रावण के कृष्ण पक्ष में आती है (अमांत गणना में आषाढ़), और चातुर्मास की पहली एकादशी है। इसकी कथा एक ठाकुर की है, जिसके हाथों क्रोध में एक जान चली गई, और जो सच्चे पछतावे, ऋषियों की सीख और इस दिन तुलसी पूजा के साथ बिताई एक रात से फिर राह पर लौटा।

अगली कामिका एकादशी और आपके शहर में पारण का समय एकादशी व्रत की तिथियाँ पृष्ठ पर देखें। नीचे कथा है, अपने शब्दों में।

कामिका एकादशी की कथा

युधिष्ठिर ने श्रावण कृष्ण की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले, "यही प्रश्न कभी नारद जी ने ब्रह्मा जी से किया था, और ब्रह्मा जी ने उत्तर में एक कथा सुनाई थी। इस एकादशी का नाम कामिका है, और कहते हैं कि इसकी महिमा सुनने भर से यज्ञ का फल मिलता है।"

गाँव का झगड़ा

किसी गाँव में एक ठाकुर रहता था। ज़मीन-जायदाद वाला, ताक़तवर, और हुक्म चलाने का आदी। स्वभाव का बड़ा गरम था। एक दिन गाँव के एक ब्राह्मण से उसकी किसी बात पर कहा-सुनी हो गई। व्रत की किताबें यह नहीं बतातीं कि बात क्या थी; बस इतना कि दोनों तरफ़ से बात बढ़ती गई।

ठाकुर अपने आपे में न रहा। ग़ुस्से के उस एक पल में उसने ब्राह्मण पर हाथ उठा दिया, और उस वार से ब्राह्मण की जान चली गई।

ग़ुस्सा उतरा तो ठाकुर सन्न रह गया। उसके हाथों एक जान गई थी, और वह भी एक विद्वान की। वह जो हो सके, वह करना चाहता था; उसने ब्राह्मण का अंतिम संस्कार ख़ुद करवाना चाहा। पर गाँव के दूसरे ब्राह्मणों ने उसके साथ बैठने और उसके घर भोजन करने से साफ़ मना कर दिया। लोग उसे देखकर रास्ता बदल लेते। वह अपने किए के साथ बिल्कुल अकेला रह गया।

ऋषियों की सीख

ठाकुर ने कोई बहाना नहीं बनाया। वह ऋषियों के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, "मुझसे बहुत बड़ा अपराध हुआ है, और मैं उसे लौटा नहीं सकता। बताइए, क्या मेरे लिए प्रायश्चित का कोई रास्ता है?"

ऋषियों ने देखा कि उसका पछतावा सच्चा है। उन्होंने कहा, "श्रावण के कृष्ण पक्ष में कामिका नाम की एकादशी आती है। उसे शुद्ध मन से रखो। तुलसी दल से भगवान विष्णु की पूजा करो, उन्हें दीपक दिखाओ, और रात भर जागकर प्रार्थना करो। पूरे मन से क्षमा माँगो।"

ठाकुर ने वैसा ही किया। दिन भर उपवास रखा, एक-एक तुलसी पत्ता भगवान को चढ़ाया, घी का दीया जलाया, और रात भर मूर्ति के सामने बैठकर प्रार्थना करता रहा।

सपना

आधी रात के बाद, जब वह थोड़ी देर के लिए मूर्ति के पास ही लेट गया, उसे एक सपना आया। भगवान विष्णु उसके सामने थे। उन्होंने कहा, "तुम्हारा पछतावा सच्चा है और तुम्हारा व्रत पूरा हुआ। इस कर्म का बोझ तुमसे उतर गया। जाओ, और अब से सही राह पर चलो।"

सुबह उठा तो उसे लगा जैसे सीने से कोई पहाड़ हट गया हो। गाँव के ब्राह्मणों को उसके व्रत और सपने की बात पता चली तो वे द्वादशी के भोजन पर उसके घर आए, और वह फिर से अपने लोगों के बीच अपनाया गया। बाक़ी जीवन उसने ईमानदारी और भक्ति में बिताया।

ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा कि कामिका एकादशी इतने भारी दोष से भी छुड़ा देती है, और इस दिन तुलसी से विष्णु पूजा करने वाला भगवान को उतना ही प्रिय है जितना रत्न चढ़ाने वाला।

कथा को सहज मन से पढ़ें

यह एक जान जाने की कथा है, और यह उस अपराध को छोटा करके नहीं दिखाती। यह भी नहीं कहती कि उपवास से किसी दूसरे को पहुँचाई चोट मिट जाती है, या कि कोई अनुष्ठान उन लोगों से माफ़ी माँगने और भरपाई करने की जगह ले लेता है जिनका नुक़सान हुआ। कथा जिस बात को सामने रखती है, वह है ठाकुर का बदलना: वह बहाने छोड़ता है, अपना अपराध मानता है, अकेलापन सहता है, और नम्रता से नई राह माँगता है। घरों में यह पछतावे की कथा की तरह सुनाई जाती है, और इस बात की कि जो सचमुच बदल जाए, उससे उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

कामिका का माहात्म्य कहता है कि इसका पुण्य गंगा, काशी, नैमिषारण्य और पुष्कर में स्नान के बराबर है, और वह तुलसी की बड़ी महिमा गाता है: तुलसी के दर्शन से दोष मिटते हैं, उसे छूने से शरीर पवित्र होता है, उसे सींचना, उसे प्रणाम करना और उसे लगाना, सब पूजा के ही रूप हैं। वह दीपक की भी महिमा बताता है कि इस रात भगवान के आगे घी या तिल के तेल का दीया जलाने वाले का उनके धाम में मान होता है। ये ग्रंथ के वचन हैं, और परिवार इन्हें तुलसी की सेवा करने और दीया जलाए रखने का न्योता मानते हैं।

चातुर्मास की पहली एकादशी होने से कामिका आगे के चार महीनों की शांत भक्ति का सुर भी बाँध देती है।

कैसे रखी जाती है

कामिका में तुलसी की ख़ास देखभाल होती है। बहुत-से घरों में सुबह पौधे को पानी देकर साफ़ किया जाता है, भगवान को उनके नाम लेते हुए एक-एक तुलसी दल चढ़ाया जाता है, और साँझ को पौधे के आगे घी या तिल के तेल का दीया जलाकर, जब तक सुरक्षित हो, जलने दिया जाता है। कई परिवार ठाकुर की तरह रात भर भजन करते हुए जागते हैं। बरसात का मौसम होने से सादा फलाहार आम है, और जो बीमार हों वे ज़रूरत के हिसाब से खाएँ-पिएँ। बाक़ी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

कामिका से पहले और बाद

कामिका से पहले देवशयनी एकादशी आती है, जब भगवान विश्राम में जाते हैं और राजा मांधाता के राज्य में वर्षा लौटती है। इसके बाद श्रावण शुक्ल में श्रावण पुत्रदा एकादशी आती है, जो ख़ास तौर पर संतान के लिए रखी जाती है। किसी भी दिन की तिथि के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कामिका एकादशी की कथा क्या है?

एक गाँव के ठाकुर का एक ब्राह्मण से झगड़ा हुआ और ग़ुस्से में उसके हाथ से ब्राह्मण की मृत्यु हो गई। सबने उसका साथ छोड़ दिया। पछतावे में डूबे ठाकुर ने ऋषियों से प्रायश्चित पूछा। उन्होंने कामिका एकादशी पर तुलसी से विष्णु पूजा और रात भर जागरण करने को कहा, और उस व्रत से वह अपने अपराध के बोझ से मुक्त हुआ।

कामिका एकादशी पर तुलसी का इतना महत्व क्यों है?

इस एकादशी के माहात्म्य में तुलसी की लंबी महिमा है: उसे देखना, छूना, सींचना और उसके पत्ते भगवान को चढ़ाना, सबकी प्रशंसा की गई है। इसलिए इस दिन तुलसी दल चढ़ाना, पौधे के आगे दीया जलाना और उसकी सेवा करना ख़ास माना जाता है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • पद्म पुराण, उत्तर खंड, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • उत्तर भारत की एकादशी व्रत कथा पुस्तकें, यहाँ अपने शब्दों में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति