इंदिरा एकादशी आश्विन के कृष्ण पक्ष (अमांत में भादों) की एकादशी है, और यह हमेशा पितृ पक्ष के भीतर पड़ती है। इसकी कथा एक ऐसे राजा की है जिसे पता चला कि उसके दिवंगत पिता को अभी विश्राम नहीं मिला है, और जिसने यह व्रत रखकर उसका पुण्य पिता को दिया ताकि वे शांति से आगे जा सकें।
अगली इंदिरा एकादशी कब है, स्मार्त और वैष्णव दिन कौन-से हैं, यह एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर देखें; वहाँ उस दिन को खोलने पर आपके शहर का पारण समय मिलेगा। इसके आसपास का पूरा पखवाड़ा पितृ पक्ष पृष्ठ पर है।
व्रत कथा
युधिष्ठिर बोले, "हे गोविंद, आश्विन के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है और उसे रखने से क्या होता है?"
श्रीकृष्ण ने कहा, "उसका नाम इंदिरा है। वह उन्हें भी शांति देती है जो हमसे पहले जा चुके हैं। इसकी कथा सुनो।"
सतयुग में माहिष्मती नगरी में इंद्रसेन नाम के राजा राज करते थे। वे विष्णु के भक्त थे, प्रजा पर दया रखते थे, और बेटे-पोते, धन-धान्य सबसे भरे-पूरे थे। उनके दिन कर्तव्य और भगवान के स्मरण में बीतते थे।
एक दिन वे दरबार में बैठे थे कि वीणा बजाते हुए नारद मुनि आकाश से उतर आए। राजा उठे, उनके चरण धोए, ऊँचे आसन पर बिठाया और पूछा, "मुनिवर, आज कैसे आना हुआ? जिन लोकों में आप घूमते हैं, वहाँ सब कुशल तो है?"
नारद जी बोले, "राजन, मैं एक संदेश लेकर आया हूँ। कुछ समय पहले मैं यमराज के लोक गया था। वहाँ प्रतीक्षा करने वालों के बीच मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उनके साथ अच्छा व्यवहार हो रहा था, पर वे आगे नहीं जा पा रहे थे। जीवन में उन्होंने एकादशी का एक व्रत शुरू करके अधूरा छोड़ दिया था, और वही अधूरा व्रत उन्हें वहाँ रोके हुए था। मुझे देखकर उन्होंने कहा, 'मुनिवर, मेरा बेटा इंद्रसेन माहिष्मती में राज करता है। आप उसके पास जाइए। उससे कहिए कि आश्विन की इंदिरा एकादशी रखकर उसका पुण्य मुझे दे दे, ताकि मैं आगे जा सकूँ।' इसीलिए मैं आया हूँ।"
राजा की आँखें भर आईं। हाथ जोड़कर बोले, "मुनिवर, विधि बताइए, मैं ठीक वैसा ही करूँगा।"
नारद जी ने समझाया, "दशमी को सुबह शांत मन से स्नान करो। दोपहर को श्रद्धा से पितरों का श्राद्ध करो और दिन में एक ही बार भोजन करो। एकादशी की सुबह भगवान के सामने संकल्प लो: 'प्रभु, आज मैं कुछ नहीं खाऊँगा, कल आपकी शरण में भोजन करूँगा।' दोपहर को शालिग्राम के सामने फिर पिता के लिए श्राद्ध करो, ब्राह्मणों को भोजन कराओ, और अर्पित अन्न का एक भाग गाय को दो। फूल और धूप से हरि की पूजा करो, और रात भर उनके नाम गाते हुए जागो। द्वादशी की सुबह फिर पूजा करके ब्राह्मणों को खिलाओ, फिर परिवार और आश्रितों के साथ चुपचाप भोजन करो।"
आश्विन आया तो इंद्रसेन ने अपनी रानियों, बच्चों और पूरे घर के साथ ठीक नारद जी की बताई विधि से एकादशी रखी। व्रत पूरा होते ही आकाश से फूल बरसे। प्रतीक्षा से छूटे उनके पिता गरुड़ पर बैठकर विष्णु धाम चले गए, और जाते-जाते बेटे को आशीर्वाद दे गए।
इंद्रसेन ने बहुत बरस तक निर्विघ्न राज किया। समय आने पर उन्होंने राजगद्दी बेटे को सौंपी और वे भी विष्णु लोक को गए।
श्रीकृष्ण बोले, "यह इंदिरा एकादशी की महिमा है। जो इसे सुनता या पढ़ता है, उसके दोष मिटते हैं, और उसके कुल के दिवंगतों को विश्राम मिलता है।"
कथा को सहज मन से पढ़ें
यह दिवंगत माता-पिता की कथा है, और हो सकता है किसी का ताज़ा दुख छू जाए। पुराण यमलोक और रुके हुए पिता की बात करता है, पर इसके बीच का भाव बहुत कोमल है: एक पिता का बेटे की ओर हाथ बढ़ाना, और बेटे का जवाब देना। कोई विधि न हो पाने से किसी के माता-पिता का मान कम नहीं होता; कथा तो बस शोक में डूबे लोगों को अपने प्रेम को कुछ करने का रास्ता देती है।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
परिवार इंदिरा एकादशी माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे दिवंगत परिजनों की याद में रखते हैं, और भगवान को समर्पित एक दिन का पुण्य उन्हें अर्पित करते हैं। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत पितरों को ऊँचे लोक तक ले जाता है और व्रती के पुराने दोष मिटाता है; लोग इसे कथा की दी हुई तसल्ली मानते हैं, कोई हिसाब-किताब नहीं।
यह एकादशी कैसे रखी जाती है
पितृ पक्ष में होने के कारण बहुत-से घर व्रत के साथ श्राद्ध या तर्पण भी करते हैं: पितरों को तिल मिला जल, और पकाया हुआ भोजन अर्पित करके दूसरों को खिलाना। इस पखवाड़े की रीत के अनुसार एक हिस्सा गाय, कौए या कुत्ते के लिए अलग रखा जाता है। व्रत रखने वाला उस दिन अन्न नहीं खाता, इसलिए पितरों और मेहमानों के लिए बना भोजन दूसरों को परोसा जाता है और व्रती पारण के बाद ही खाता है। व्रत का क्रम एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आगे-पीछे की एकादशियाँ
इंदिरा से पहले परिवर्तिनी एकादशी आती है, जब भगवान नींद में करवट लेते हैं, और इसके बाद दशहरे के अगले दिन की पापांकुशा एकादशी। अपने शहर की तिथि किसी भी दिन पंचांग में देखें।