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व्रत कथा · परिवर्तिनी एकादशी

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा: वामन भगवान और राजा बलि

परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी व्रत कथा: नींद में करवट बदलते भगवान विष्णु, राजा बलि के यज्ञ में वामन, और तीन पग में नापे गए तीनों लोक।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

परिवर्तिनी एकादशी, जिसे पार्श्व एकादशी भी कहते हैं, भादों के शुक्ल पक्ष की एकादशी है; माना जाता है कि इस दिन क्षीरसागर में सोए भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसकी कथा वामन भगवान की है, उस नन्हे ब्राह्मण बालक की जिसने राजा बलि से तीन पग धरती माँगी और उन्हीं में सारे लोक नाप लिए।

आने वाली एकादशियों की तिथियाँ, स्मार्त और वैष्णव दिन एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर हैं, और वहाँ हर दिन के पन्ने पर आपके शहर का पारण समय मिलेगा। यहाँ कथा पढ़िए।

व्रत कथा

युधिष्ठिर ने पूछा, "हे माधव, भादों के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, और उस दिन किसकी पूजा होती है?"

श्रीकृष्ण बोले, "राजन, उसे पार्श्व भी कहते हैं और परिवर्तिनी भी, क्योंकि उस दिन मैं सोते-सोते करवट लेता हूँ। उसे वामन एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि उस दिन मेरे वामन रूप की पूजा होती है। इसका कारण सुनो।"

त्रेता युग में बलि नाम का एक असुर राजा था, महान भक्त प्रह्लाद का पोता। बलि अपने से पहले के असुरों जैसा नहीं था। वह बेहिसाब दानी था, ब्राह्मणों का आदर करता, वचन का पक्का था और विष्णु की पूजा करता था। बड़े-बड़े यज्ञों और अपनी सेना के बल से उसने पहले धरती जीती, फिर स्वर्ग, और इंद्र समेत सब देवताओं को अपना घर छोड़ना पड़ा।

देवताओं की माता अदिति अपने बेटों के दुख से दुखी थीं। उन्होंने लंबा व्रत रखकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की, और भगवान ने उनकी कोख से जन्म लेने का वचन दिया। वे एक नन्हे बालक के रूप में आए: मृगछाला, कमंडल, छाता और जनेऊ धारण किए एक ब्रह्मचारी ब्राह्मण। उनका नाम पड़ा वामन, यानी बौना।

उन दिनों बलि एक बड़ा यज्ञ कर रहा था; भागवत के अनुसार नर्मदा के किनारे। जो भी ब्राह्मण आता, उसे मुँहमाँगा दान मिलता। वामन यज्ञशाला में पहुँचे तो सारी सभा उस तेजस्वी बालक को देखती रह गई।

बलि ने उनका स्वागत किया, उनके चरण धोए और बोला, "हे ब्राह्मण कुमार, आपके आने से मेरा यज्ञ धन्य हुआ। जो चाहें माँग लीजिए: गायें, सोना, गाँव, महल।"

वामन मुस्कुराए। "मुझे बहुत थोड़ा चाहिए। मेरे तीन पग जितनी धरती दे दो।"

बलि हँस पड़ा। "यह तो बच्चों वाली माँग हुई। कुछ और माँगिए।"

बालक बोला, "जो तीन पग से संतोष न करे, उसे तीन लोक से भी संतोष नहीं होता। मेरे लिए तीन पग बहुत हैं।"

तभी बलि के गुरु शुक्राचार्य उसे एक ओर ले गए। "यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं विष्णु हैं, और तुम्हारा सब कुछ लेने आए हैं। यह दान मत दो।"

बलि ने एक पल सोचा और कहा, "गुरुदेव, अगर स्वयं भगवान मेरे द्वार पर माँगने आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा? मैं हाँ कह चुका हूँ, अपना वचन वापस नहीं लूँगा।" उसने हाथ में जल लेकर दान का संकल्प कर दिया।

फिर वामन बढ़ने लगे। यज्ञशाला से ऊपर, बादलों से ऊपर, सूरज-चाँद से भी ऊपर। एक पग में उन्होंने धरती नाप ली। दूसरे में आकाश और स्वर्ग, और उनका चरण इतना ऊँचा पहुँचा कि, कहते हैं, ब्रह्मा जी ने उसे धोया और वही जल गंगा बनकर बहा। फिर उन्होंने बलि की ओर देखा। "तीसरा पग कहाँ रखूँ?"

बलि ने सिर झुकाकर धरती से लगा दिया। "प्रभु, अब मेरे पास मैं ही बचा हूँ। तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।"

भगवान ने बलि के सिर पर चरण रखा, और राजा धीरे से सुतल लोक में उतर गया, जो पाताल का वह हिस्सा है जो स्वर्ग से भी सुंदर बताया गया है। उसकी विनम्रता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वहाँ का राज्य दिया और वचन दिया कि आने वाले युग में वह इंद्र बनेगा। बलि ने एक बात और माँगी: "आप मेरे पास रहिए।" भगवान उसके द्वार के पहरेदार बनने को राज़ी हो गए।

श्रीकृष्ण बोले, "तभी से मेरा एक रूप बलि के पास रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग पर सोता है। इस एकादशी को मैं नींद में करवट बदलता हूँ। जो इस दिन वामन की पूजा करके व्रत रखता है, वह मानो तीनों लोकों का पूजन कर लेता है।"

कथा को सहज मन से पढ़ें

बलि को कभी-कभी हारे हुए शत्रु की तरह याद किया जाता है, पर यह कथा उसे ऐसे नहीं कहती। वह राज्य खोता है, पर बदले में उससे कहीं बड़ी चीज़ पाता है: भगवान का साथ और पहरा। केरल का ओणम इसी राजा को बड़े प्यार से याद करता है, एक न्यायी राजा के रूप में जो हर बरस अपनी प्रजा से मिलने आता है।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

यह दिन चातुर्मास के बीच आता है, जो देवशयनी एकादशी से शुरू होकर देवउठनी एकादशी पर पूरा होता है। लोग इसे विनम्रता और खुले हाथ से दान के भाव से रखते हैं; माहात्म्य कहता है कि इससे बड़े यज्ञों जितना पुण्य मिलता है और भगवान का धाम मिलता है, और परिवार इसे कथा के वचन की तरह मानते हैं।

यह एकादशी कैसे रखी जाती है

इस दिन भगवान की वामन रूप में पूजा होती है, और बहुत-से घरों में अगले दिन वामन द्वादशी को उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जलझूलनी के रूप में ठाकुर जी को पालकी में जलाशय तक ले जाकर पानी पर झुलाया जाता है और भजन गाते हुए वापस लाया जाता है। कुछ परिवारों में पारण के बाद दही-चावल का दान करने की रीत है। व्रत का सामान्य क्रम एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आगे-पीछे की एकादशियाँ

इससे पहले हरिश्चंद्र की कथा वाली अजा एकादशी आती है, और इसके बाद पितृ पक्ष में पितरों के लिए रखी जाने वाली इंदिरा एकादशी। किसी भी दिन अपने शहर की तिथि पंचांग में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसे परिवर्तिनी एकादशी क्यों कहते हैं?

परिवर्तन का अर्थ है करवट बदलना। देवशयनी एकादशी को सोए भगवान विष्णु अपनी चार महीने की नींद के बीच इस दिन एक करवट से दूसरी करवट लेते हैं, ऐसा माना जाता है। पार्श्व यानी करवट, इसी से इसका दूसरा नाम पार्श्व एकादशी है।

परिवर्तिनी एकादशी पर कौन-सी कथा सुनी जाती है?

वामन अवतार की कथा, जिसमें भगवान ने बौने ब्राह्मण के रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और पूरी सृष्टि नाप ली। व्रत की किताबों में श्रीकृष्ण इसे युधिष्ठिर को अपनी ही कथा के रूप में सुनाते हैं।

जलझूलनी एकादशी क्या है?

राजस्थान, मध्य प्रदेश और आसपास के इलाक़ों में इसी दिन को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। मंदिरों के ठाकुर जी को सजी हुई पालकी में नदी, तालाब या सरोवर तक ले जाकर जल में झुलाया जाता है और फिर गाजे-बाजे से वापस लाया जाता है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • भविष्योत्तर पुराण, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • श्रीमद्भागवत की वामन कथा, जैसी आम तौर पर सुनाई जाती है
  • राजस्थान और मध्य प्रदेश के मंदिरों और घरों की जलझूलनी परंपरा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति