सफला एकादशी पौष के कृष्ण पक्ष (अमांत में मार्गशीर्ष) की एकादशी है, जो कड़ाके की सर्दी में आती है, और इसकी कथा लुंपक नाम के एक राजकुमार की है जिसे उसके बुरे कामों के कारण घर से निकाल दिया गया था। एक पुराने पीपल के नीचे ठंड से जागते और भूखे रहते हुए उसने अनजाने में यह एकादशी रख ली, और उसी व्रत ने उसका जीवन सफल कर दिया; सफला का अर्थ भी यही है।
अगली सफला एकादशी और उसके स्मार्त व वैष्णव दिन एकादशी की तिथियाँ पृष्ठ पर देखें; वहाँ हर दिन के पन्ने पर आपके शहर का पारण समय दिया है। अब कथा।
व्रत कथा
युधिष्ठिर बोले, "हे कृष्ण, पौष के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, और उस दिन किस देवता की पूजा होती है?"
श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम्हारे स्नेह के कारण बताता हूँ। उसका नाम सफला है। जैसे नागों में शेषनाग और पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ हैं, वैसे ही व्रतों में एकादशी। सफला के दिन नारायण की फलों से पूजा करनी चाहिए। इसकी कहानी सुनो।"
चंपावती नगरी में राजा महिष्मत राज करते थे। उनके चार बेटे थे, और सबसे बड़ा, लुंपक, उनके लिए भारी सिरदर्द था। वह जुआ खेलता, शराब पीता, पराई स्त्रियों के पीछे भागता और बाप का धन पानी की तरह बहाता। देवताओं की हँसी उड़ाता और साधु-संतों का अपमान करता। रोज़ कोई न कोई नई शिकायत लेकर महल पहुँच जाता।
आख़िर राजा का धीरज टूट गया। उन्होंने बेटे को दरबार में बुलाकर कहा, "तूने इस घर को बहुत लजाया। मेरे राज्य से निकल जा।" नाते-रिश्तेदार और सेवक भी राजा से सहमत थे, और लुंपक ख़ाली हाथ बाहर कर दिया गया।
वह पास के जंगल में चला गया। दिन में शिकार करता और जो मारता वही खाता; रात को चुपके से पिता के नगर में घुसकर चोरी करता। लोग उसे पहचानते थे, पर राजा के आदर में उसे कुछ नहीं कहते थे।
उस जंगल में एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ था, जिसे आसपास के लोग देवस्थान मानकर पूजते थे। लुंपक ने उसी की जड़ में अपना ठिकाना बना लिया, भक्ति से नहीं, बस इसलिए कि वहाँ जगह सूखी और खुली थी।
पौष का महीना था, और कृष्ण पक्ष की दशमी की रात कड़ाके की ठंड पड़ी। लुंपक के पास न कंबल था, न ढंग के कपड़े। वह रात भर काँपता रहा, नींद नहीं आई, दाँत किटकिटाते रहे, और आख़िर अधमरा-सा पड़ा रह गया, हिल भी न सका।
एकादशी का सूरज उगा, पर वह तब तक नहीं हिला जब तक धूप अच्छी तरह चढ़ नहीं गई। दोपहर तक वह उठकर बैठ सका, पर शिकार करने की ताक़त नहीं थी। लड़खड़ाते हुए उसने पेड़ों के नीचे घूमकर ज़मीन पर गिरे फल बटोरे। पीपल तक लौटते-लौटते सूरज ढलने लगा।
वह इतना थका था कि खा भी न सका। फल पेड़ की जड़ में रखकर उसके मुँह से अपने-आप निकला, "इन फलों से भगवान विष्णु प्रसन्न हों।" फिर ठंड लौट आई, और वह दूसरी रात भी जागता ही बैठा रहा।
इस तरह, बिना जाने, लुंपक ने एकादशी का उपवास किया, भगवान को फल चढ़ाए और रात भर जागरण किया। भगवान ने सब स्वीकार कर लिया।
सुबह आकाशवाणी हुई: "राजकुमार, सफला एकादशी के पुण्य से तुम्हारे दोष मिट गए। अपने पिता के पास लौट जाओ। राज्य तुम्हारा होगा।" उसी पल उसका मन बदल गया। उसे अपने बीते जीवन पर लाज आई और मन कृतज्ञता से भर गया। वह पैदल घर लौटा, पिता के चरणों में गिरकर माफ़ी माँगी, और राजा ने सामने एक बदला हुआ आदमी देखकर उसे गले लगा लिया और समय आने पर राज्य सौंप दिया।
लुंपक ने सावधानी से राज किया, विष्णु की पूजा की और हर एकादशी रखी। उसके मनोज्ञ नाम का बेटा हुआ, और बेटे के बड़े होने पर उसने उसे गद्दी सौंपकर अपने अंतिम बरस भक्ति में बिताए।
श्रीकृष्ण बोले, "जो सफला एकादशी श्रद्धा से रखता है, उसे बड़े यज्ञों से भी अधिक पुण्य मिलता है। जो इसकी कथा सुनता है, उसे भी इसका आशीर्वाद मिलता है।"
कथा को सहज मन से पढ़ें
लुंपक को उसका अपना पिता घर से निकालता है, और वह ठंड से मरते-मरते बचता है। इनमें से कुछ भी अपनाने लायक़ बताकर नहीं कहा गया। यह उस आदमी की कहानी है जिससे सबने उम्मीद छोड़ दी थी, और इसकी कि सबसे छोटा-सा मोड़, मुट्ठी भर फल और दो शब्द, भगवान के उससे मिलने के लिए काफ़ी थे।
यह दिन किस भाव से रखा जाता है
सफला इस भाव से रखी जाती है कि मेहनत फल लाए: उस काम के लिए जिसका नतीजा अभी नहीं आया, राह से भटके किसी बच्चे के लिए, या अपनी नई शुरुआत के लिए। माहात्म्य कहता है कि यह व्रत यहाँ सफलता और आगे मुक्ति देता है; परिवार इसे कथा के भाव से, हिसाब से नहीं, आस से रखते हैं।
यह एकादशी कैसे रखी जाती है
इस दिन का केंद्र फल है: भगवान को मौसमी फल चढ़ाए जाते हैं, और बहुत-से घरों में व्रत भी फलाहार का ही होता है। घी का दीया जलाया जाता है, और कुछ लोग लुंपक को याद करते हुए शाम को पीपल के नीचे दीपक रखते हैं। कुछ घरों में किसी ज़रूरतमंद को कंबल या गर्म कपड़े देने की रीत है, क्योंकि कथा एक ठिठुरती रात पर टिकी है। पूरा क्रम एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आगे-पीछे की एकादशियाँ
इससे पहले गीता जयंती वाली मोक्षदा एकादशी आती है, और इसके बाद संतान के लिए रखी जाने वाली पौष पुत्रदा एकादशी। किसी भी दिन अपने शहर की तिथि पंचांग में देखें।