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व्रत कथा · जया एकादशी

जया एकादशी व्रत कथा: माल्यवान और पुष्पवती

जया एकादशी व्रत कथा सरल शब्दों में: इंद्र की सभा में शाप पाए माल्यवान और पुष्पवती, हिमालय की ठिठुरती रात, और अनजाने में हुआ व्रत जिसने उन्हें छुड़ाया।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

जया एकादशी माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, वसंत पंचमी के कुछ दिन बाद, जब ठंड धीरे-धीरे नरम पड़ने लगती है। इसकी कथा इंद्र की सभा के दो कलाकारों की है, गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती की, जिन्हें मंच पर हुई एक चूक के लिए शाप मिला और जो एक ऐसे व्रत से छूटे जो उन्होंने जान-बूझकर रखा ही नहीं था।

यह एकादशी अगली बार कब है, और अगली सुबह आपके शहर में व्रत कब खोला जा सकता है, यह एकादशी व्रत की तिथियाँ सूची में मिलेगा, जहाँ हर एकादशी का अपना पृष्ठ और पारण का समय है। आगे कथा है, हमारे शब्दों में।

जया एकादशी की कथा

युधिष्ठिर बोले, "हे कृष्ण, माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी की बात आपने बताई। अब शुक्ल पक्ष वाली एकादशी का नाम और उसकी कथा सुनाइए।"

श्रीकृष्ण ने कहा, "उसका नाम जया है। वह इतनी पवित्र है कि भटकती प्रेत-योनि से भी छुड़ा देती है। सुनो, उसने कैसे इंद्र के अपने ही दो गायकों को छुड़ाया।"

नंदन वन का उत्सव

स्वर्ग में इंद्र नंदन वन में उत्सव मना रहे थे। पेड़ फूलों से लदे थे, हवा में सुगंध थी, और गंधर्व-अप्सराएँ उनके सामने गाने-नाचने बुलाए गए थे। गंधर्वों में माल्यवान था, और अप्सराओं में पुष्पवती। उस दिन दोनों को साथ में प्रस्तुति देनी थी।

दोनों ने एक-दूसरे को पहले भी देखा था, पर उस दिन कुछ और ही हुआ। पुष्पवती ने नाचना शुरू किया तो उसकी आँखें बार-बार माल्यवान पर जा टिकतीं, और माल्यवान की नज़र भी उसी पर रहती। दोनों को और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। गीत बेसुरा हो गया, नृत्य बेताल। पैर देर से पड़ते, सुर पहले निकल जाते, और गीत के बोल उलझ गए।

इंद्र ने तुरंत भाँप लिया। वे समझ गए कि दोनों स्वभाव से लापरवाह नहीं हैं, बस एक-दूसरे में खो गए हैं, पर उनकी सभा में यह कोई बहाना नहीं था। उन्होंने कहा, "तुमने इस सभा का और अपनी कला का अपमान किया है। धरती पर जाओ और पिशाच बनकर रहो, जो तुमने चुना है उसके साथ जियो।"

हिमालय की वह रात

दोनों स्वर्ग से गिरे और हिमालय की ढलानों पर ऐसे शरीरों में आ पड़े जो उन्हें ख़ुद भी अजीब और डरावने लगते थे। न ठीक से नींद आती, न खाने में स्वाद, न सोचने की शक्ति बचती। बर्फ़ और हवा शरीर को चीर देतीं। हर दिन ठंडा होता, और हर रात उससे भी ठंडी।

एक दिन दुख इतना बढ़ गया कि उन्होंने कुछ खाया ही नहीं। न मन था, न कुछ मिला। न किसी जीव को मारा, न पानी पिया, बस अपने कष्ट में साथ बैठे रहे। सूरज ढला तो वे एक पीपल के पेड़ के नीचे जा बैठे, ठंड से बचने के लिए एक-दूसरे से सटे हुए, इतने ठिठुरे और उदास कि नींद पास भी न आई। पुष्पवती ने कहा, "हमने ऐसा क्या किया था कि यह दिन देखना पड़ा?" माल्यवान बोला, "अब कभी ऐसा कुछ न करें जो हमें फिर ऐसी जगह ले आए।" दोनों काँपते हुए जागते रहे, जब तक आसमान में उजाला नहीं हो गया।

उस दिन जया एकादशी थी, और दोनों में से किसी को पता नहीं था। बिना इरादे के उनका उपवास हो गया था, और बिना इरादे के रात भर का जागरण भी।

द्वादशी की सुबह होते ही भगवान विष्णु की कृपा से शाप उतर गया। उनका पुराना उजला, सुंदर रूप लौट आया, और उन्हें घर ले जाने के लिए आकाश से विमान उतरा।

फिर इंद्र की सभा में

दोनों सीधे इंद्र के पास पहुँचे और प्रणाम किया। इंद्र चकित रह गए। "मेरे शाप से तुम इतनी जल्दी कैसे छूट गए? किस देवता ने तुम्हें छुड़ाया?"

माल्यवान ने कहा, "देवराज, भगवान विष्णु ने, जया एकादशी के द्वारा। हमने दुख के मारे अनजाने में यह व्रत रख लिया था, और वही काफ़ी हो गया।"

इंद्र का क्रोध कब का उतर चुका था। वे बोले, "तब तुम विष्णु के प्रिय हो, और जो उन्हें प्रिय है उसका मैं भी आदर करता हूँ। यहीं रहो, सुखी रहो।" और दोनों फिर से स्वर्ग में साथ रहने लगे।

कथा के अंत में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो श्रद्धा से जया एकादशी रखता है, या इसकी कथा सुनता-पढ़ता है, वह बड़े से बड़े संकट से छूट जाता है।

कथा को सहज मन से पढ़ें

कई एकादशी कथाओं की तरह यह कथा भी एक शाप पर टिकी है, और नाच-गाने की एक चूक के लिए इंद्र का दंड बहुत भारी लगता है। परंपरा इसे बड़े रंगों में कही गई कहानी की तरह सुनती है: ध्यान ज़रूरी है, और कला पूरा मन माँगती है। शाप इस कथा का केंद्र नहीं है। केंद्र है पीपल के नीचे की वह रात, एक-दूसरे को थामे दो जीव, और वह कृपा जो उनके माँगने से पहले ही उन तक पहुँच गई।

यह दिन किस भाव से रखा जाता है

जया का अर्थ है विजय, और माहात्म्य इस एकादशी को भारी से भारी दोष मिटाने वाली और प्रेत-योनि से छुड़ाने वाली बताता है। ये ग्रंथ के कथन हैं, दिन की प्रशंसा में कहे गए, और घर-परिवार इन्हें इसी तरह सुनते हैं।

घरों में यह दिन अक्सर कुछ पीछे छोड़ने के भाव से रखा जाता है: कोई आदत, कोई मनमुटाव, कोई बुरा दौर, या बस सर्दी की जकड़न। कथा का असली सहारा उस अनजाने व्रत में है। अगर भटकते हुए दो जीव बिना जाने रखे व्रत से उबर सकते हैं, तो जो जानकर रखता है, चाहे अधूरा ही सही, वह बिना डर के रख सकता है।

कैसे रखी जाती है

जया एकादशी सामान्य एकादशी की तरह ही रखी जाती है: विष्णु पूजा, तुलसी, फलाहार और अगली सुबह पारण। माल्यवान और पुष्पवती के रात भर जागने की याद में कुछ परिवार भजन करते हुए रात जागते हैं, और बहुत-से लोग शाम का दीया पीपल या तुलसी के पास जलाते हैं। मौसम बदल रहा होता है, इसलिए इस दिन पूजा में अक्सर वसंत के पहले ताज़े फूल चढ़ते हैं। पूरी विधि एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है; बुज़ुर्ग, गर्भवती या बीमार लोग पानी और फल के साथ व्रत रख सकते हैं।

आस-पास की एकादशियाँ

इससे पहले माघ के कृष्ण पक्ष में तिल वाली षटतिला एकादशी आती है। इसके बाद फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में विजया एकादशी आती है, समुद्र के किनारे खड़े श्रीराम की कथा वाली। अपने शहर की तिथि जानने के लिए आज का पंचांग खोलें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जया एकादशी की कथा क्या है?

इंद्र की सभा में गाते-नाचते हुए गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती एक-दूसरे में खोकर सुर-ताल भूल गए। इंद्र ने उन्हें पिशाच बनाकर हिमालय भेज दिया। जया एकादशी के दिन ठंड और दुख में उन्होंने कुछ नहीं खाया और रात भर सो न सके; उसी अनजाने व्रत और जागरण से वे मुक्त हुए।

कथा में अनजाने में हुआ व्रत भी क्यों गिना गया?

माहात्म्य इस कथा से दिखाना चाहता है कि यह दिन कितना उदार है: बिना जाने रखा गया व्रत भी मुक्ति दे गया। घरों में इसे लापरवाही का बहाना नहीं, बल्कि उस कृपा का संकेत माना जाता है जो इंसान जहाँ है, वहीं उससे मिलती है।

भैमी या भीष्म एकादशी क्या है?

ओडिशा और दक्षिण के कुछ हिस्सों में माघ शुक्ल की यही एकादशी भीष्म पितामह की याद में भीष्म या भैमी एकादशी कहलाती है। यह भीष्म अष्टमी के आस-पास पड़ती है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • पद्म पुराण, उत्तर खंड, एकादशी माहात्म्य (जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है)
  • उत्तर भारत की एकादशी व्रत कथा पुस्तकें, यहाँ अपने शब्दों में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति