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त्योहार · 2027

लोहड़ी 2027 — गुरुवार, 14 जनवरी 2027

लोहड़ी पंजाब का सर्दियों का अलाव वाला त्योहार है, जो मकर संक्रांति से पहले की शाम गीतों, तिल, गुड़ और परिवार-पड़ोस की गर्मजोशी के साथ मनाया जाता है।

2026 में

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

सूर्योदय / सूर्यास्त
07:15 / 17:44
सूर्यास्त
17:44

नियम: मकर संक्रांति की पूर्व संध्या: हमारे पंचांग के मकर संक्रांति दिन से एक दिन पहले। अलाव सूर्यास्त के बाद जलता है।

2027 में

गुरुवार, 14 जनवरी 2027

सूर्योदय / सूर्यास्त
07:15 / 17:45
सूर्यास्त
17:45

नियम: मकर संक्रांति की पूर्व संध्या: हमारे पंचांग के मकर संक्रांति दिन से एक दिन पहले। अलाव सूर्यास्त के बाद जलता है।

समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर

लोहड़ी क्या है

लोहड़ी उस आख़िरी शाम को मनाई जाती है जिसके बाद सूर्य निरयन मकर राशि में प्रवेश करते हैं। पंजाबी सौर पंचांग में यह पोह महीने की विदाई है, जो सर्दी का सबसे ठंडा समय होता है, और अगली सुबह माघी यानी माघ का पहला दिन होता है। अंधेरा होते ही परिवार और पड़ोसी आँगन, गली या खुले मैदान में अलाव के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, उसमें तिल, गुड़ की मिठाइयाँ, मूँगफली और मक्के की खीलें डालते हैं, और देर रात तक गाते-नाचते हैं।

लोहड़ी पर सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली कथा दुल्ला भट्टी की है। लोकगीतों के अनुसार वे मुग़ल काल के पंजाब के एक लोकनायक थे, जो अमीरों से छीनकर ग़रीबों की मदद करते थे और जबरन ले जाई जा रही लड़कियों को छुड़ाकर पिता की तरह उनका ब्याह कराते थे। बच्चे घर-घर जाकर जो सुंदर मुंदरिए गीत गाते हैं, उसमें उन्हीं का नाम आता है और बदले में रेवड़ी और लकड़ियाँ माँगी जाती हैं। ये शास्त्र नहीं, लोकगाथाएँ हैं, और इनकी मिठास उस उदारता और साहस में है जिसका ये गुणगान करती हैं।

लोहड़ी किसानों का त्योहार भी है। इस समय पंजाब के खेतों में गेहूँ और सरसों की रबी फ़सल हरी-भरी होती है, गन्ना कट रहा होता है और ताज़ा गुड़ बन रहा होता है। अलाव आने वाली फ़सल के लिए धन्यवाद है और मिलकर ठंड का सामना करने का ढंग भी। बहुत-से परिवार रेवड़ी, गजक और मूँगफली का पहला हिस्सा अग्नि को अर्पित करके ही बाकी खाते हैं, जो आभार का एक सीधा-सादा भाव है।

किसी घर के लिए सबसे ख़ुशी की लोहड़ी वह होती है जो शादी के बाद या बच्चे के जन्म के बाद पहली बार आती है। रिश्तेदार बुलाए जाते हैं, उपहार और मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं, और नई बहू या नन्हा शिशु उत्सव के केंद्र में होता है। पिछले कुछ दशकों में बहुत-से परिवारों ने बेटी की पहली लोहड़ी भी उतने ही उत्साह से मनाने की पहल की है, और अब इसे त्योहार की भावना का हिस्सा माना जाता है।

कैसे मनाया जाता है

  • आँगन या खुले मैदान में लकड़ी और उपलों का अलाव सजाना और सूर्यास्त के बाद उसे जलाना।
  • अग्नि की परिक्रमा करना और उसमें तिल, रेवड़ी, गजक, मूँगफली और खीलें अर्पित करना।
  • बच्चों का घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाना और रेवड़ी या लकड़ियाँ इकट्ठी करना।
  • अलाव के चारों ओर लोकगीत, भांगड़ा और गिद्धा।
  • नवविवाहित जोड़े या नवजात शिशु की पहली लोहड़ी रिश्तेदारों और उपहारों के साथ मनाना।
  • सरसों का साग और मक्की की रोटी, और कुछ घरों में गन्ने के रस में पकी खीर बनाना।
  • अगली सुबह माघी पर स्नान और बहुत-से सिख परिवारों का गुरुद्वारे जाना।

तिथि कैसे तय होती है

लोहड़ी किसी तिथि से तय नहीं होती। यह मकर संक्रांति से पहले की शाम है, इसलिए हमारा पंचांग पहले मकर संक्रांति का दिन निकालता है, यानी वह दिन जब सूर्य निरयन मकर राशि में प्रवेश करते हैं (प्रवेश सूर्यास्त से पहले हो तो वही दिन, अन्यथा अगला दिन), और उससे एक दिन पहले लोहड़ी होती है। अलाव उसी शाम सूर्यास्त के बाद जलाया जाता है। ऊपर दी गई तारीख़ और सूर्यास्त का समय आपके स्थान के लिए इसी तरह निकाले गए हैं।

क्षेत्रीय अंतर

लोहड़ी का सबसे बड़ा रूप पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और जम्मू में, और दुनिया भर के पंजाबी परिवारों में दिखता है। जम्मू में इस दिन बच्चे सजे हुए काग़ज़ी मोर लेकर छज्जा नाच भी करते हैं। अगला दिन पंजाब में माघी, उत्तर भारत के ज़्यादातर हिस्सों में मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू के रूप में मनाया जाता है, जहाँ भोगाली का अलाव लोहड़ी से बहुत मिलता-जुलता है। लोहड़ी सूर्य से तय होती है, इसलिए इसमें अमांत-पूर्णिमांत का कोई भेद नहीं है, पर जिन वर्षों में संक्रांति सूर्यास्त के बहुत पास पड़ती है, उनमें दूसरा अयनांश या सूर्यास्त का अलग नियम मानने वाले पंचांग एक दिन बाद की तारीख़ दिखा सकते हैं।

तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या लोहड़ी हमेशा मकर संक्रांति से एक दिन पहले होती है?

हाँ। लोहड़ी मकर संक्रांति के दिन से पहले की शाम है। जब सूर्य सूर्यास्त के बाद मकर में प्रवेश करते हैं, तो संक्रांति अगले दिन मानी जाती है और लोहड़ी भी एक दिन आगे खिसक जाती है, इसीलिए इसकी तारीख़ कभी-कभी बदलती है।

लोहड़ी का अलाव कब जलाया जाता है?

सूर्यास्त के बाद, अंधेरा होने पर। परंपरा में इसका कोई कड़ा मुहूर्त नहीं है; परिवार शाम होते ही आग जलाते हैं और देर रात तक उसके पास बैठते हैं। आपके स्थान का सूर्यास्त का समय ऊपर दिया गया है।

दुल्ला भट्टी कौन थे?

पंजाब के एक लोकनायक, जिन्हें लोहड़ी के गीतों में याद किया जाता है। लोकगाथाओं के अनुसार वे ग़रीबों की मदद करते थे और अगवा की जा रही लड़कियों को छुड़ाकर ख़ुद उनका ब्याह कराते थे। ये गीत लिखित इतिहास से ज़्यादा लोक-स्मृति हैं और अपनी दयालुता के भाव के लिए गाए जाते हैं।

नई बहू या शिशु की पहली लोहड़ी ख़ास क्यों होती है?

लोहड़ी गर्मजोशी और समृद्धि का पारिवारिक त्योहार है, इसलिए घर के नए सदस्य का स्वागत अलाव के पास रिश्तेदारों, गीतों और उपहारों के साथ किया जाता है। अब बहुत-से परिवार बेटी की पहली लोहड़ी भी बेटे जितनी धूमधाम से मनाते हैं।