एकादशी · 2027
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी 2027 — बुधवार, 10 नवंबर 2027
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी बुधवार, 10 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। पारण 11 नवंबर को 06:40 – 08:50 के बीच।
नई दिल्ली के लिए गणना
बुधवार, 10 नवंबर 2027
- तिथि
- शुक्ल एकादशी: 9 नवंबर, 07:35 – 10 नवंबर, 09:11
- चांद्र मास
- कार्तिक
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:39 / 17:30
- अरुणोदय (सूर्योदय से 96 मिनट पहले)
- 05:03
| पारण (व्रत खोलने का समय) | 11 नवंबर, 06:40 – 11 नवंबर, 08:50 |
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नियम: स्मार्त नियम: सूर्योदय के समय एकादशी वाला दिन, अगली सुबह पारण के लिए द्वादशी रहे।
स्मार्त और वैष्णव
इस बार दोनों परंपराएँ एक ही दिन व्रत रखती हैं: अरुणोदय (05:03) तक एकादशी शुरू हो चुकी है, इसलिए दिन दशमी-विद्धा नहीं है।
वैष्णव दिन केवल अरुणोदय वाले सरल नियम से है; इस्कॉन अपना कैलेंडर अपने स्थान के लिए बनाता है, इसलिए अपने मंदिर से मिला लें।
पारण कैसे तय हुआ
व्रत अगले दिन द्वादशी में खोला जाता है — हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) के बाद, हो सके तो प्रातः काल में, और मध्याह्न से बचते हुए। द्वादशी रहते पारण न हो तो उसका पुण्य कम माना जाता है।
सभी समय हमारे अपने इंजन से, नई दिल्ली के सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय पर। दूसरे शहर में समय कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी दिन भी। अपने शहर का पंचांग
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी का महत्व
देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक के शुक्ल पक्ष में आती है; माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा से जागते हैं। चातुर्मास समाप्त होता है, विवाह और गृह प्रवेश का मौसम फिर खुलता है, और बहुत से घरों में उसी शाम या अगले दिन तुलसी विवाह — तुलसी और शालिग्राम का विवाह — होता है।
अन्य नाम: प्रबोधिनी एकादशी, देवउठनी एकादशी
व्रत कथा
इस दिन की कोई एक कथा नहीं; जागरण ही उत्सव है। घरों में चावल के घोल से भगवान के चरण बनाए जाते हैं, गन्ना, सिंघाड़ा और मौसमी फल ढककर रखे जाते हैं, और संध्या को घंटी बजाकर “उठो देव” कहते हुए भगवान को जगाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला पाँच दिन का भीष्म पंचक भी इसी दिन शुरू होता है।
कथा का सार, पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के एकादशी माहात्म्य से।
एकादशी कैसे रखें
- व्रत एकादशी के सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक चलता है। बहुत से लोग दशमी की शाम, व्रत शुरू होने से पहले, एक बार सादा और सात्विक भोजन करते हैं।
- परंपरा में अन्न और दालें, खासकर चावल, नहीं खाए जाते। फल, दूध, दही, मेवे और फलाहार — साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू — आम तौर पर लिए जाते हैं; हर परिवार का रिवाज थोड़ा अलग होता है।
- व्रत के कई स्तर हैं: निर्जला (बिना पानी), फलाहार (फल और दूध), या बिना अन्न का एक समय भोजन। जो आपके शरीर के अनुकूल हो, वही चुनें; सबके लिए एक ही नियम ज़रूरी नहीं है।
- दिन भगवान विष्णु की पूजा में बीतता है: तुलसी, दीपक, विष्णु सहस्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय जैसा मंत्र, और उस एकादशी की कथा। तुलसी के पत्ते प्रायः एक दिन पहले तोड़ लिए जाते हैं, क्योंकि बहुत से लोग एकादशी पर तुलसी नहीं तोड़ते।
- कुछ लोग रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करते हैं, और बहुत से लोग अन्न या भोजन का दान करते हैं।
- पारण द्वादशी को सूची में दिए समय के भीतर होता है: हरि वासर के बाद, हो सके तो सुबह के समय, और द्वादशी समाप्त होने से पहले। व्रत प्रायः किसी हल्की चीज़ से, अक्सर थोड़ा तुलसी-जल लेकर खोला जाता है।
- गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, मधुमेह के रोगी, नियमित दवा लेने वाले या अस्वस्थ लोग हल्का व्रत रख सकते हैं — फल और दूध, या एक समय भोजन — या केवल पूजा-पाठ से दिन मना सकते हैं। कोई बीमारी हो तो व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी 2027 कब है?
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी बुधवार, 10 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। शुक्ल एकादशी तिथि 9 नवंबर, 07:35 – 10 नवंबर, 09:11 तक रहती है।
देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी का पारण कब है?
पारण गुरुवार, 11 नवंबर 2027 को 06:40 – 08:50 के बीच, हरि वासर के बाद और द्वादशी रहते।
क्या वैष्णव देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी अलग दिन है?
नहीं। अरुणोदय के समय एकादशी शुरू हो चुकी है, इसलिए स्मार्त और वैष्णव दोनों 10 नवंबर 2027 को व्रत रखते हैं।