एकादशी · 2026
उत्पन्ना एकादशी 2026 — शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026
उत्पन्ना एकादशी शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। पारण 5 दिसंबर को 06:59 – 09:04 के बीच।
नई दिल्ली के लिए गणना
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026
- तिथि
- कृष्ण एकादशी: 3 दिसंबर, 23:03 – 4 दिसंबर, 23:45
- चांद्र मास
- मार्गशीर्ष (पूर्णिमांत) / कार्तिक (अमांत)
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:58 / 17:23
- अरुणोदय (सूर्योदय से 96 मिनट पहले)
- 05:22
| पारण (व्रत खोलने का समय) | 5 दिसंबर, 06:59 – 5 दिसंबर, 09:04 |
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नियम: स्मार्त नियम: सूर्योदय के समय एकादशी वाला दिन, अगली सुबह पारण के लिए द्वादशी रहे।
स्मार्त और वैष्णव
इस बार दोनों परंपराएँ एक ही दिन व्रत रखती हैं: अरुणोदय (05:22) तक एकादशी शुरू हो चुकी है, इसलिए दिन दशमी-विद्धा नहीं है।
वैष्णव दिन केवल अरुणोदय वाले सरल नियम से है; इस्कॉन अपना कैलेंडर अपने स्थान के लिए बनाता है, इसलिए अपने मंदिर से मिला लें।
पारण कैसे तय हुआ
व्रत अगले दिन द्वादशी में खोला जाता है — हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) के बाद, हो सके तो प्रातः काल में, और मध्याह्न से बचते हुए। द्वादशी रहते पारण न हो तो उसका पुण्य कम माना जाता है।
सभी समय हमारे अपने इंजन से, नई दिल्ली के सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय पर। दूसरे शहर में समय कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी दिन भी। अपने शहर का पंचांग
उत्पन्ना एकादशी का महत्व
उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष (अमांत में कार्तिक) में आती है। उत्पन्ना का अर्थ है “प्रकट हुई”: माना जाता है कि इसी दिन एकादशी देवी प्रकट हुई थीं, इसलिए बहुत से लोग हर एकादशी के व्रत का संकल्प इसी से शुरू करते हैं।
व्रत कथा
मुर दैत्य ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। भगवान विष्णु बहुत समय तक उससे लड़े, फिर बदरिकाश्रम की एक गुफा में विश्राम करने लगे। जैसे ही मुर सोते हुए विष्णु पर वार करने आया, उनके शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर का वध कर दिया। जागने पर विष्णु ने उन्हें एकादशी नाम दिया, क्योंकि वे ग्यारहवीं तिथि को प्रकट हुई थीं, और उनके दिन व्रत रखने वालों को आशीर्वाद दिया।
कथा का सार, पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के एकादशी माहात्म्य से।
एकादशी कैसे रखें
- व्रत एकादशी के सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक चलता है। बहुत से लोग दशमी की शाम, व्रत शुरू होने से पहले, एक बार सादा और सात्विक भोजन करते हैं।
- परंपरा में अन्न और दालें, खासकर चावल, नहीं खाए जाते। फल, दूध, दही, मेवे और फलाहार — साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू — आम तौर पर लिए जाते हैं; हर परिवार का रिवाज थोड़ा अलग होता है।
- व्रत के कई स्तर हैं: निर्जला (बिना पानी), फलाहार (फल और दूध), या बिना अन्न का एक समय भोजन। जो आपके शरीर के अनुकूल हो, वही चुनें; सबके लिए एक ही नियम ज़रूरी नहीं है।
- दिन भगवान विष्णु की पूजा में बीतता है: तुलसी, दीपक, विष्णु सहस्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय जैसा मंत्र, और उस एकादशी की कथा। तुलसी के पत्ते प्रायः एक दिन पहले तोड़ लिए जाते हैं, क्योंकि बहुत से लोग एकादशी पर तुलसी नहीं तोड़ते।
- कुछ लोग रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करते हैं, और बहुत से लोग अन्न या भोजन का दान करते हैं।
- पारण द्वादशी को सूची में दिए समय के भीतर होता है: हरि वासर के बाद, हो सके तो सुबह के समय, और द्वादशी समाप्त होने से पहले। व्रत प्रायः किसी हल्की चीज़ से, अक्सर थोड़ा तुलसी-जल लेकर खोला जाता है।
- गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, मधुमेह के रोगी, नियमित दवा लेने वाले या अस्वस्थ लोग हल्का व्रत रख सकते हैं — फल और दूध, या एक समय भोजन — या केवल पूजा-पाठ से दिन मना सकते हैं। कोई बीमारी हो तो व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उत्पन्ना एकादशी 2026 कब है?
उत्पन्ना एकादशी शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। कृष्ण एकादशी तिथि 3 दिसंबर, 23:03 – 4 दिसंबर, 23:45 तक रहती है।
उत्पन्ना एकादशी का पारण कब है?
पारण शनिवार, 5 दिसंबर 2026 को 06:59 – 09:04 के बीच, हरि वासर के बाद और द्वादशी रहते।
क्या वैष्णव उत्पन्ना एकादशी अलग दिन है?
नहीं। अरुणोदय के समय एकादशी शुरू हो चुकी है, इसलिए स्मार्त और वैष्णव दोनों 4 दिसंबर 2026 को व्रत रखते हैं।