मघा में जन्मे व्यक्ति का गुण मिलान मुख्य रूप से उन चार बातों पर टिका है जो नक्षत्र ख़ुद तय करता है (राक्षस गण, मूषक योनि, अन्त्य नाड़ी और तारा की गिनती), और बाक़ी चार कूट सिंह राशि तय करती है। ऊपर की तालिका में 27 नक्षत्रों के साथ मघा के कुल अंक वर के रूप में 4 से 31 तक और वधू के रूप में 3 से 32 तक जाते हैं।
यह फैलाव काफ़ी चौड़ा है, और मघा की बहुत-सी जोड़ियाँ निचले वर्ग में आती हैं। इसका कारण किसी व्यक्ति का स्वभाव नहीं, बल्कि गणना की बनावट है, और किसी भी खाने को शुभ या अशुभ मानने से पहले इसे समझ लेना ठीक है।
मघा मिलान में क्या लेकर आता है
मघा सिंह राशि का पहला नक्षत्र है। इसका स्वामी केतु है और देवता पितर। मिलान के लिए इसके कुछ ही गुण काम आते हैं:
- गण: राक्षस। इससे 6 अंकों का गण कूट तय होता है।
- योनि: मूषक (नर)। इससे 4 अंकों का योनि कूट तय होता है। इसी योनि की मादा पूर्वा फाल्गुनी है।
- नाड़ी: अन्त्य। इससे 8 अंकों का नाड़ी कूट तय होता है।
- राशि: पूरे चारों चरण सिंह में। वर्ण, वश्य, ग्रह मैत्री (राशि स्वामी सूर्य के ज़रिए) और भकूट यहीं से आते हैं।
मघा कभी सिंह से बाहर नहीं जाता, इसलिए इसकी अपनी ओर से कोई खाना सीमा (रेंज) नहीं बनता। मघा की पंक्ति में जहाँ सीमा दिखे, वह दूसरे नक्षत्र की ओर से आती है, जैसे चित्रा (वर मघा के साथ सामान्य 25.5, सीमा 22.5–25.5) या धनिष्ठा (25.5, सीमा 19.5–25.5)।
तालिका मघा के बारे में क्या कहती है
मघा वर हो तो सामान्य अंकों में 12 जोड़ियाँ 18 से नीचे, 9 जोड़ियाँ 18 से 24.5 के बीच, 6 जोड़ियाँ 25 से 32 के बीच और कोई भी 32 से ऊपर नहीं। वधू के रूप में यह गिनती 10, 13, 4 और 0 हो जाती है। सबसे ऊँचे सामान्य अंक ज्येष्ठा (वर में 31, वधू में 32), पूर्वा फाल्गुनी (दोनों ओर 30) और दूसरे मघा (28) के साथ हैं।
मघा वर के साथ सबसे कम सामान्य अंक उत्तराषाढ़ा (4), श्रवण (6.5) और रोहिणी (11) के हैं। इन तीनों में एक साथ कई कूट शून्य हो जाते हैं: गण का बेमेल, एक ही नाड़ी, या राशियों का कठिन संबंध।
इतने खाने कम क्यों हैं, इसकी सबसे बड़ी वजह गण है। राक्षस और मनुष्य गण मिलें तो गण कूट 6 में से 0 देता है, चाहे वर कोई भी हो। मनुष्य गण के नौ नक्षत्र हैं: भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद। देव गण के साथ मघा को 6 में से केवल 1 मिलता है। पूरे 6 अंक सिर्फ़ दूसरे राक्षस गण वाले नक्षत्र से आते हैं।
फिर भी तालिका दिखाती है कि एक कूट कितना कम तय करता है। पूर्वा फाल्गुनी मनुष्य गण है, यानी गण से कुछ नहीं मिलता, फिर भी जोड़ी का सामान्य अंक 30 है। दोनों की योनि एक है, राशि एक है और नाड़ी अलग, और यही अंक घाटा पूरा कर देते हैं।
बिल्ली, चूहा और तारा
योनि-व्यवस्था में मूषक का जन्मजात शत्रु मार्जार (बिल्ली) है, और बिल्ली योनि के नक्षत्र पुनर्वसु और आश्लेषा हैं। इनके साथ योनि 4 में से 0 देती है। मघा से तारा गिनें तो प्रतिकूल स्थान इन पर पड़ते हैं: कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा (विपत), मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा (प्रत्यरि), तथा पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद (वध)। तारा दोनों दिशाओं से गिना जाता है, हर ओर 1.5 अंक, इसलिए एक ओर की प्रतिकूल गिनती आधे अंक काटती है, सारे नहीं। कुछ परंपराएँ तारा केवल वधू के नक्षत्र से गिनती हैं, जिससे यह कूट बदल सकता है।
नाड़ी: अन्त्य समूह
मघा की अन्त्य नाड़ी में कृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण और रेवती भी हैं। इनमें से किसी के साथ परंपरा इसे नाड़ी दोष कहती है और नाड़ी 8 में से 0 होती है। ग्रंथ अपवाद गिनाते हैं, पर इन आठों के साथ हमारा इंजन जिन तीन अपवादों को देखता है, उनमें से कोई लागू नहीं हो सकता: नक्षत्र अलग हैं और इनमें से कोई भी सिंह राशि में मघा के साथ नहीं है।
अपवाद की गुंजाइश केवल मघा-मघा जोड़ी में है, जहाँ एक नक्षत्र पर भिन्न चरण को मान्य अपवाद माना जाता है। हमारा इंजन इसे दिखाता है पर अंक नहीं बदलता, क्योंकि यह अपवाद दोष को कितना कम करता है, इस पर ज्योतिषियों की राय अलग-अलग है। कुछ क्षेत्रीय परंपराएँ कुछ नक्षत्रों के लिए नाड़ी को कम महत्व भी देती हैं, इसलिए आपके पारिवारिक ज्योतिषी की रीति हमसे भिन्न हो सकती है।
अंकों से आगे
20 या 30 का कुल केवल चंद्रमा की ओर की कहानी है। पूरे कुंडली मिलान में मांगलिक स्थिति, सातवाँ भाव और उसका स्वामी, नवांश और दोनों की चल रही दशा भी देखी जाती है। मघा का सिंह-चंद्रमा सम्मान और परिवार की प्रतिष्ठा को महत्व देता है; ऐसा साथी जो इसे समझे और जिससे खुलकर बात हो सके, तालिका की किसी भी पंक्ति से ज़्यादा मायने रखता है। बाक़ी 26 नक्षत्रों के पन्ने नक्षत्र मिलान तालिका में हैं, और हर कूट का विस्तार 36 गुण वाले लेख में है।