हस्त का मिलान देव गण, मादा महिष (भैंस) योनि, आदि नाड़ी और चारों चरणों में कन्या राशि में रहने वाले चंद्रमा पर टिका है। ऊपर की तालिका में हस्त वर हो तो पूरे अंक 9 से 33 तक और वधू हो तो 8.5 से 32 तक हैं, और हस्त वर हो तो इसके सामान्य अंकों में सबसे ज़्यादा जोड़ियाँ अच्छे वर्ग में आती हैं।
इस कारण काग़ज़ पर हस्त का मिलान अपेक्षाकृत सहज है। कमज़ोर जगहें कम हैं, पर तीखी हैं, और वे एक योनि-वैर से आती हैं जो नाड़ी के साथ मेल खा जाता है।
आठ कूटों में हस्त का हिस्सा
हस्त का स्वामी चंद्रमा है, देवता सविता (जीवन देने वाले सूर्य) और प्रतीक खुली हथेली। मिलान में इनका उपयोग यों होता है:
- देव गण। हस्त के लिए गण कभी शून्य नहीं होता। दूसरे देव नक्षत्र के साथ 6; मनुष्य नक्षत्र के साथ हस्त वर हो तो 6 और वधू हो तो 5; राक्षस नक्षत्र के साथ दोनों ओर 1।
- महिष योनि (मादा), जिसका नर स्वाति है।
- आदि नाड़ी।
- कन्या राशि का चंद्रमा, सभी चरण, जिसका स्वामी बुध है; इससे वर्ण, वश्य, ग्रह मैत्री और भकूट तय होते हैं।
हस्त एक ही राशि में रहता है, इसलिए इसकी अपनी ओर से कोई खाना नहीं बँटता। इसकी पंक्ति में जो सीमाएँ हैं, वे दो राशियों में फैले साथियों से आती हैं, जैसे मृगशिरा (हस्त वर के साथ सामान्य 33, सीमा 25–33) और चित्रा (सामान्य 28, सीमा 21–28)।
पंक्ति की बनावट
वर के रूप में हस्त के सामान्य अंकों में 6 जोड़ियाँ 18 से नीचे, 9 जोड़ियाँ 18 से 24.5 तक, 11 जोड़ियाँ 25 से 32 तक और 1 जोड़ी 32 से ऊपर है। वधू के रूप में यह 6, 11, 10 और 0 है। अकेला उत्कृष्ट खाना मृगशिरा का है जब हस्त वर हो; वधू के रूप में यही जोड़ी 32 पर है, अच्छे वर्ग के भीतर।
ऊपर का बाक़ी समूह पास-पास है। वर के रूप में: हस्त-हस्त 28, चित्रा 28, स्वाति 27.5, पुष्य 27। वधू के रूप में: पुष्य 28, हस्त 28, चित्रा 28 और रेवती 27.5।
घोड़े वाली अड़चन
योनि-व्यवस्था में महिष और अश्व जन्मजात शत्रु हैं, और अश्व योनि के नक्षत्र अश्विनी और शतभिषा हैं। इन दोनों में से किसी के साथ योनि 4 में से 0 देती है। दोनों की नाड़ी भी हस्त जैसी आदि है, इसलिए नाड़ी भी 8 में से 0। यही कारण है कि हस्त वर के साथ सबसे कम सामान्य अंक अश्विनी (9) और शतभिषा (9.5) के हैं, और फिर ज्येष्ठा (13), जिसकी नाड़ी भी यही है।
ये तीनों हस्त की पंक्ति में कूटों के एक के ऊपर एक जुड़ने का सबसे साफ़ उदाहरण हैं। फिर भी यह चंद्रमा की स्थिति पर एक कसौटी का निर्णय है; दोनों व्यक्तियों के चरित्र के बारे में यह कुछ नहीं कहता।
हस्त से तारा
हस्त से गिनें तो विपत आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा पर पड़ता है, प्रत्यरि पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद पर, और वध अश्विनी, मघा और मूल पर। स्वाति और पुष्य फिर भी हस्त की तालिका में ऊपर हैं, क्योंकि तारा के 3 अंक दो दिशाओं में बँटे हैं और एक प्रतिकूल गिनती केवल 1.5 घटाती है। कुछ परंपराएँ तारा केवल वधू से गिनती हैं, और दक्षिण भारत की पोरुथम पद्धतियाँ नक्षत्रों के संबंध को अपने ढंग से तौलती हैं।
नाड़ी: आदि समूह में कौन
आदि समूह में अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा और पूर्वा भाद्रपद हैं। हर एक के साथ नाड़ी कूट 0 है, जिसे ग्रंथ नाड़ी दोष कहते हैं। इनमें से सात साथियों के लिए हमारे इंजन का कोई अपवाद लागू नहीं हो सकता।
दो के लिए हो सकता है। उत्तरा फाल्गुनी के तीन चरण कन्या में हैं, और चंद्रमा वहाँ हो तो हस्त और उत्तरा फाल्गुनी एक राशि में, अलग नक्षत्रों में होते हैं — यह मान्य अपवाद है। और हस्त के दो चंद्रमा अलग चरणों में हों तो एक-नक्षत्र वाला नियम लागू होता है। इंजन दोनों को दर्ज करता है और किसी का अंक नहीं बदलता। कोई भी अपवाद इस बिंदु को कितना संतुलित करता है, इस पर राय अलग है, और कुछ क्षेत्रीय रीतियाँ कुछ नक्षत्रों के लिए नाड़ी को ढीले ढंग से लागू करती हैं।
कुल अंक क्या नहीं बता सकता
हस्त कौशल और हुनर का नक्षत्र है, और मन करता है कि अंक भी सुघड़ हों। पर वे अनुकूलता का केवल चंद्रमा वाला हिस्सा हैं। कुंडली मिलान में मांगलिक स्थिति, सातवाँ भाव और उसका स्वामी, नवांश और आने वाली दशाएँ भी जाँची जाती हैं। बाक़ी हर पंक्ति नक्षत्र मिलान तालिका पर देखें।