त्योहार · 2026
गुरु पूर्णिमा 2026 — बुधवार, 29 जुलाई 2026
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ की पूर्णिमा है, जो महर्षि वेदव्यास और जीवन को दिशा देने वाले हर गुरु के सम्मान का दिन है।
2026 में
बुधवार, 29 जुलाई 2026
- तिथि
- पूर्णिमा: 28 जुलाई, 18:19 – 29 जुलाई, 20:05
- चांद्र मास
- आषाढ़
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:40 / 19:14
नियम: सूर्योदय के समय आषाढ़ पूर्णिमा।
2027 में
रविवार, 18 जुलाई 2027
- तिथि
- पूर्णिमा: 17 जुलाई, 18:48 – 18 जुलाई, 21:14
- चांद्र मास
- आषाढ़
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:34 / 19:19
नियम: सूर्योदय के समय आषाढ़ पूर्णिमा।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
गुरु पूर्णिमा क्या है
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा है, यानी अपने गुरुओं के सम्मान का दिन, चाहे वे आध्यात्मिक गुरु हों, विद्यालय के शिक्षक हों या जीवन में राह दिखाने वाले। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि वेदों का विभाजन करने वाले और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास का जन्म इसी दिन हुआ था। वर्षा ऋतु की शुरुआत में पड़ने वाले इस दिन से कई संन्यासी परंपराओं में चातुर्मास आरंभ होता है।
गुरु शब्द की व्याख्या अक्सर अंधकार दूर करने वाले के रूप में की जाती है। बौद्ध इस पूर्णिमा को उस दिन के रूप में मनाते हैं जब भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में पहला उपदेश दिया, और जैन इसे वह दिन मानते हैं जब महावीर स्वामी ने अपने पहले शिष्य को अपनाया। कुछ योग परंपराओं में यह वह दिन है जब आदियोगी शिव ने सप्तर्षियों को पहली बार ज्ञान दिया। इन सब धाराओं में साझा भाव ज्ञान देने वालों के प्रति कृतज्ञता है।
विद्यार्थियों, शिष्यों और आम परिवारों के लिए गुरु पूर्णिमा कर्मकांड से ज़्यादा कृतज्ञता जताने का दिन है। लोग अपने शिक्षकों से मिलने जाते हैं, बड़ों के चरण छूते हैं और गुरु से मिले ग्रंथ या साधना के साथ समय बिताते हैं। आश्रमों में दिनभर सत्संग होता है, और कई लोग इस दिन अध्ययन या साधना का संकल्प नए सिरे से लेते हैं। यह शांत, चिंतनशील पर्व है, जिसका अर्थ किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं।
कैसे मनाया जाता है
- अपने गुरु, शिक्षक या बड़ों से मिलकर फूल, फल या गुरु दक्षिणा के साथ सम्मान प्रकट करना।
- महर्षि वेदव्यास या अपनी गुरु परंपरा की पूजा।
- गीता, गुरु गीता या अपनी परंपरा के किसी ग्रंथ का पाठ।
- आश्रमों और मंदिरों में सत्संग, भजन और प्रवचन में शामिल होना।
- कुछ घरों में हल्का व्रत या सादा भोजन।
- किसी अध्ययन, संगीत शिक्षा या साधना की शुरुआत, या उसे फिर से आरंभ करना।
- कुछ परंपराओं में साधु-साध्वियों द्वारा वर्षा ऋतु के चातुर्मास की शुरुआत।
तिथि कैसे तय होती है
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ पूर्णिमा है, यानी आषाढ़ मास की पूर्णिमा। हमारा पंचांग वह दिन लेता है जिसमें सूर्योदय के समय पूर्णिमा चल रही हो, इस सामान्य नियम के अनुसार कि सूर्योदय के समय की तिथि ही उस दिन की तिथि होती है। आषाढ़ पूर्णिमा का नाम पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में एक ही है, इसलिए महीने को लेकर क्षेत्रों में कोई अंतर नहीं है।
क्षेत्रीय अंतर
हिंदू घरों और आश्रमों में यह दिन व्यास जी और अपने गुरुओं को समर्पित होता है, जबकि भारत, नेपाल और श्रीलंका के बौद्ध इसे आसाढ़ा या एसला पोया के रूप में, पहले उपदेश की स्मृति में मनाते हैं। नेपाल में विद्यालयों में इसे शिक्षक दिवस की तरह भी मनाया जाता है। पूरे भारत में हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत की गुरु-शिष्य परंपराएँ इस दिन ऐसे आयोजन करती हैं जिनमें शिष्य अपने गुरुओं का सम्मान करते हैं।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा क्यों कहते हैं?
मान्यता है कि वेदों का विभाजन करने वाले और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। उनका सम्मान परंपरा के आदि गुरु का सम्मान है।
गुरु पूर्णिमा पर लोग क्या करते हैं?
लोग अपने शिक्षकों और बड़ों से मिलकर उनका आभार जताते हैं, आश्रमों में सत्संग में जाते हैं और गुरु की दी हुई शिक्षा या साधना का अभ्यास करते हैं। कुछ लोग हल्का व्रत भी रखते हैं।
क्या गुरु पूर्णिमा केवल आध्यात्मिक गुरुओं के लिए है?
नहीं। बहुत-से लोग इस दिन विद्यालय के शिक्षकों, संगीत गुरुओं, माता-पिता और मार्गदर्शकों का भी आभार जताते हैं। बौद्ध और जैन भी इस पूर्णिमा को अपने गुरुओं की स्मृति में मनाते हैं।