मिथुन राशि निरयन राशि चक्र की तीसरी राशि है (60° से 90°), जिसका स्वामी बुध है, तत्व वायु और स्वभाव द्विस्वभाव। यह बातचीत, व्यापार और जुड़ाव की राशि है; जिनकी जन्म राशि मिथुन है उनका मन बोलकर, पढ़कर और तुलना करके सोचता है।
कौन-सी मिथुन?
भारतीय ज्योतिष में राशि का अर्थ जन्म के समय चंद्रमा की राशि है। लग्न वह राशि है जो उसी क्षण पूर्व में उदय हो रही थी, और सूर्य राशि तीसरी चीज़ है, जिसे पश्चिमी ज्योतिष सायन गणना से देखता है। वैदिक राशियाँ निरयन राशि चक्र पर नापी जाती हैं, जो लाहिड़ी अयनांश से आज लगभग 24° पीछे है; इसलिए सूर्य निरयन मिथुन में मोटे तौर पर जून के मध्य से जुलाई के मध्य तक रहता है, मई के अंत से जून के अंत तक नहीं। यह अंतर वैदिक और पश्चिमी राशि वाले लेख में विस्तार से है, और मुफ़्त कुंडली से आपकी राशि, नक्षत्र और लग्न एक मिनट में मिल जाते हैं।
वायु, द्विस्वभाव और बुध
वायु तत्व गति, संपर्क और विचार है। द्विस्वभाव राशियों में चर और स्थिर दोनों का अंश है; वे जोड़ती हैं, ढलती हैं और एक साथ दो बातें थाम सकती हैं। बुध बुद्धि, वाणी, लेखन, व्यापार और मित्रों का ग्रह है। इनका मेल मिथुन को उसकी पहचान देता है: एक बेचैन, मिलनसार बुद्धि जो सब कुछ समझना और किसी को समझाना चाहती है।
इसका प्रतीक स्त्री-पुरुष का जोड़ा है; वराहमिहिर इन्हें गदा और वीणा लिए बताते हैं, यानी बल और कला साथ-साथ। कालपुरुष में मिथुन भुजाएँ और कंधे हैं, वे अंग जो आगे बढ़कर लिखते और लेन-देन करते हैं। इसकी दिशा पश्चिम है और यह शीर्षोदय राशि है; परंपरा कहती है कि शीर्षोदय राशि में बैठा ग्रह अपनी दशा के आरंभ में ही फल दिखाने लगता है।
मृगशिरा, आर्द्रा और पुनर्वसु
मिथुन की शुरुआत मृगशिरा के तीसरे-चौथे चरण (0° से 6°40′) से होती है, फिर पूरा आर्द्रा (6°40′ से 20°) और अंत में पुनर्वसु के पहले तीन चरण (20° से 30°)। तीनों का मिज़ाज बिल्कुल अलग है।
मृगशिरा का स्वामी मंगल और देवता सोम हैं; यह खोजता हुआ हिरण है। यहाँ का मिथुन जिज्ञासु है, थोड़ा बेचैन, और हमेशा एक सुराग और आगे बढ़ना चाहता है।
आर्द्रा का स्वामी राहु है और देवता रुद्र, शिव का प्रचंड रूप; प्रतीक आँसू की बूँद। यह वह मिथुन है जो उथल-पुथल से सीखता है: तीखा, सवाल करने वाला, कभी-कभी तूफ़ानी, और शोध, विश्लेषण व तकनीक में अक्सर बहुत कुशल। मुहूर्त ग्रंथ आर्द्रा को तीक्ष्ण नक्षत्र मानते हैं, जो कोमल शुरुआतों के बजाय निर्णायक कामों के लिए है।
पुनर्वसु का स्वामी गुरु और देवता देवमाता अदिति हैं। नाम का अर्थ है "फिर से शुभ", यानी तूफ़ान के बाद लौटता प्रकाश। यहाँ मिथुन अधिक उदार, आशावान और दार्शनिक हो जाता है; ऐसा वक्ता जो सिखाता भी है।
स्वभाव और खूबियाँ
मिथुन का चंद्रमा विविधता पसंद करता है। ऐसे लोग प्रायः हाज़िरजवाब होते हैं, जल्दी सीखते हैं, भाषा और अंकों में अच्छे होते हैं, और हर तरह के लोगों के साथ सहज रहते हैं। ये स्वाभाविक रूप से लोगों को जोड़ते हैं, विचारों का लेन-देन करते हैं और वे संबंध देख लेते हैं जो दूसरों से छूट जाते हैं। द्विस्वभाव होने से ये जल्दी ढल जाते हैं और बिना असुरक्षा के दो दृष्टिकोण साथ रख सकते हैं, इसलिए अच्छे मध्यस्थ और जीवंत शिक्षक बनते हैं। व्यवहार में एक तरह की जवानी, उम्र चाहे जो हो, इनकी पुरानी पहचान है।
किन बातों पर काम करें
जिस मन को विकल्प प्रिय हों, उसे एक चुनना कठिन लगता है। ऊर्जा का बिखरना, एक साथ कई काम शुरू करना, अपने फ़ैसलों पर बार-बार शंका करना, और किसी भावना को महसूस करने के बजाय उस पर बात करते रहना, ये इस राशि के सामान्य सबक हैं। कभी-कभी जानकारी को ही ज्ञान समझ लिया जाता है। गहराई तब आती है जब कोई एक विधा इतने समय तक पकड़ी जाए कि वह फल देने लगे। स्थिर शनि या गुरु, या स्थिर लग्न, अक्सर यह लंगर देते हैं। और हर राशि की तरह यहाँ भी, कोई एक बात कुंडली का फ़ैसला नहीं करती; पूरी कुंडली साथ पढ़ी जाती है।
संबंध और भकूट
मिथुन के लिए मित्रता भी उतनी ही ज़रूरी है जितना प्रेम। आदर्श साथी वह है जिससे दशकों तक बात की जा सके, जो जगह दे और व्यस्त मन से परेशान न हो।
मिथुन से गिनें तो मिथुन स्वयं, सिंह और मेष (3/11), कन्या और मीन (4/10), तथा धनु (1/7) भकूट में पूरे सात अंक पाते हैं। कर्क और वृषभ (2/12), तुला और कुंभ (5/9), वृश्चिक और मकर (6/8) पर शून्य मिलता है, जब तक कोई अपवाद लागू न हो। शुक्र बुध का नैसर्गिक मित्र है, इसलिए कई ज्योतिषी मित्र-स्वामी वाले अपवाद से मिथुन का वृषभ और तुला से मेल स्वीकार कर लेते हैं। वास्तविक अनुकूलता दोनों पूरी कुंडलियों से पढ़ी जाती है, और 36 में से अधिकांश अंक नक्षत्र-आधारित कूटों से आते हैं; विस्तार गुण मिलान लेख में है।
कार्यक्षेत्र की प्रवृत्तियाँ
ये प्रवृत्तियाँ हैं, वादे नहीं: लेखन, पत्रकारिता, अध्यापन, बिक्री और विपणन, वाणिज्य, लेखा, सॉफ़्टवेयर, अनुवाद, यात्रा, और संवाद या मध्यस्थता वाला कोई भी काम बुध की इस वायु राशि को भाता है। आपकी अपनी कुंडली का दशम भाव, उसका स्वामी और चल रही दशा चंद्र राशि से अधिक निर्णायक हैं।
मिथुन लग्न और मिथुन राशि
मिथुन लग्न में बुध पहले और चौथे भाव का स्वामी है, यानी स्वयं और घर एक ही ग्रह के पास। शुक्र पाँचवें और बारहवें का स्वामी होकर प्रायः इस लग्न के लिए मित्रवत रहता है। शनि आठवें और नौवें का स्वामी है। गुरु सातवें और दसवें, यानी दो केंद्रों का स्वामी बनता है; शास्त्र कहते हैं कि नैसर्गिक शुभ ग्रह जब दो केंद्रों का स्वामी हो (केंद्राधिपति दोष) तो उसका सीधा शुभत्व कुछ घट सकता है, इसलिए मिथुन लग्न में गुरु के फल सावधानी से पढ़े जाते हैं। मंगल छठे और ग्यारहवें का स्वामी है।
मिथुन लग्न शरीर और हाव-भाव में दिखता है: बोलते हाथ, फुर्तीला ढंग, बातूनी उपस्थिति। मिथुन राशि भीतर रहती है: व्यस्त मन, नई बातों की भूख, और नई जानकारी के साथ बदलता मूड।
उच्च, नीच और राहु का प्रश्न
सात ग्रहों में से कोई मिथुन में उच्च या नीच नहीं होता, और किसी की मूलत्रिकोण राशि भी यहाँ नहीं है। बुध यहाँ बस स्वगृही है। खुला प्रश्न राहु का है: कुछ ग्रंथ उसकी उच्च राशि वृषभ के बजाय मिथुन मानते हैं। स्रोत सचमुच अलग-अलग हैं, इसलिए सावधान विवेचन किसी एक मत पर ज़ोर नहीं देता।
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चंद्र राशि का फल मिथुन राशिफल पर है। पिछली राशि वृषभ स्थिर और रसिक है; अगली राशि कर्क में वायु जल बनती है और मन घर की ओर मुड़ता है।