मुख्य सामग्री पर जाएँ
सतमार्ग ज्योतिषSatmarg Astro

ग्रह · Rahu

राहु ग्रह ज्योतिष में: छाया ग्रह, महादशा और मतभेद

राहु ग्रह ज्योतिष में उत्तरी चंद्र पात है। इसका कारकत्व, 18 वर्ष की महादशा, गोचर, और उच्च राशि व दृष्टि पर ग्रंथों के मतभेद, सीधी भाषा में।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
  • अद्यतन
  • 6 मिनट में पढ़ें

राहु — एक नज़र में

अन्य नाम
उत्तरी चंद्र पात
प्रकृति
नैसर्गिक पाप; शनि जैसा फल
लिंग
—
स्वराशि
कोई नहीं (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र)
दृष्टि
7वीं; 5वीं और 9वीं पर मतभेद
महादशा
18 वर्ष (विंशोत्तरी)
एक राशि में
लगभग 18 माह, सदा उल्टी चाल
पूरा चक्र
लगभग 18.6 वर्ष

कारकत्व: आसक्ति, विदेशी और अपरिचित, अचानक परिवर्तन, तकनीक, दादा

राहु-केतु की नैसर्गिक मित्रता बृहत् पाराशर होरा शास्त्र की सात ग्रहों वाली तालिका में नहीं है; बाद के ग्रंथ भिन्न सूचियाँ देते हैं।

राहु का कोई शरीर नहीं और बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में यह किसी राशि का स्वामी नहीं। अनेक ग्रंथ इसकी उच्च राशि वृषभ, कुछ मिथुन बताते हैं; कुछ आधुनिक लेखक इसे कुंभ का सह-स्वामी मानते हैं। 5वीं और 9वीं दृष्टि पर भी परंपराएँ एकमत नहीं।

इस पृष्ठ पर

राहु उत्तरी चंद्र पात है, वैदिक ज्योतिष के दो छाया ग्रहों में से एक, और आसक्ति, महत्वाकांक्षा, विदेश और अपरिचित, अचानक परिवर्तन तथा तकनीक का कारक माना जाता है। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में इसका न कोई शरीर है, न कोई राशि; यह सदा उल्टी चाल चलता है, एक राशि में लगभग 18 माह रहता है और इसकी महादशा 18 वर्ष की होती है।

खगोल की दृष्टि से राहु केवल एक बिंदु है: जहाँ चंद्रमा की कक्षा क्रांतिवृत्त को उत्तर की ओर जाते हुए काटती है। उल्टी ओर का कटान केतु है। ग्रहण तभी होते हैं जब सूर्य और चंद्रमा इन बिंदुओं के पास हों। इसीलिए प्राचीन खगोलविदों ने पातों को इतना महत्व दिया और ज्योतिष ने इन्हें नवग्रहों में गिना।

स्वर्भानु की कथा

पुराण बताते हैं कि समुद्र मंथन के बाद अमृत बँटते समय असुर स्वर्भानु वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया, पर वह अमृत पी चुका था। सिर राहु बना, धड़ केतु, और सिर आज भी सूर्य-चंद्र का पीछा करता है, ग्रहण में कुछ समय के लिए उन्हें निगल लेता है।

यह कथा ज्योतिष में राहु को पढ़ने की कुंजी है: सिर है, पेट नहीं; भूख है, तृप्ति नहीं। राहु चाहता है, पहुँचता है और हर चीज़ को बड़ा करके दिखाता है। जिस भाव में यह बैठे, वह जीवन का ऐसा क्षेत्र बन जाता है जहाँ गहरी, कभी-कभी बेचैन, लगन रहती है।

राहु किन बातों का कारक है

  • इच्छा, महत्वाकांक्षा और आसक्ति: अपने भाव के विषयों को और, और पाने की चाह।
  • विदेश और अपरिचित: दूसरे देश, दूसरी संस्कृतियाँ, बाहरी लोग, लीक से हटकर रास्ते।
  • अचानक बदलाव, उथल-पुथल और परंपरा से अलग कदम।
  • तकनीक, नया मीडिया, जो कुछ आधुनिक या बड़े पैमाने का हो।
  • भ्रम और उलझन, और साथ ही व्यवस्थाओं के बीच से रास्ता निकालने की चतुराई।
  • परिवार में प्रचलित कारक-सूचियाँ राहु को दादा (पितामह) का कारक बताती हैं।

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र कहता है कि राहु शनि जैसा और केतु मंगल जैसा फल देता है। व्यवहार में अनेक ज्योतिषी यह भी जोड़ते हैं कि राहु जिस राशि में बैठा है उसके स्वामी का और साथ बैठे या दृष्टि डालने वाले ग्रहों का फल देता है। इसलिए राहु को पढ़ना उसके राशि-स्वामी से शुरू होता है।

जहाँ परंपराएँ एकमत नहीं

नवग्रहों में सबसे अधिक मतभेद राहु को लेकर है, और इसे सीधे कहना ही ईमानदारी है।

प्रश्नग्रंथ क्या कहते हैं
उच्च राशिअनेक ग्रंथ वृषभ, कुछ मिथुन।
नीच राशिप्रायः जो उच्च राशि मानी गई उसके सामने वाली, यानी वृश्चिक या धनु।
स्वामित्वबृहत् पाराशर होरा शास्त्र में कोई राशि नहीं। कुछ आधुनिक लेखक इसे कुंभ का सह-स्वामी मानते हैं।
दृष्टिकुछ ग्रंथ गुरु की तरह 5, 7 और 9वीं दृष्टि देते हैं, कुछ केवल सातवीं; कुछ ज्योतिषी राहु की दृष्टि लेते ही नहीं।
मैत्रीकोई एक तालिका सर्वमान्य नहीं। प्रायः बुध, शुक्र और शनि से मित्रता और सूर्य-चंद्र से विरोध माना जाता है।
पात की गणनाकुछ सॉफ़्टवेयर मध्यम पात लेते हैं, कुछ स्पष्ट (सत्य) पात। अंतर आमतौर पर छोटा है, पर अंश या नक्षत्र बदल सकता है।

इनमें से कोई भी मत "ग़लत" नहीं; ये अलग-अलग परंपराओं की देन हैं। सावधान फलादेश बताता है कि वह कौन-सी परिपाटी अपना रहा है।

राहु की महादशा: 18 वर्ष

विंशोत्तरी दशा में राहु की महादशा 18 वर्ष की है, मंगल के सात वर्ष के बाद और गुरु के सोलह वर्ष से पहले। जिनका जन्म नक्षत्र आर्द्रा, स्वाति या शतभिषा है (राहु के तीन नक्षत्र), उनका जीवन राहु की दशा से शुरू होता है।

राहु की दशा अक्सर महत्वाकांक्षा, असामान्य अवसर, यात्रा या विदेश से जुड़े काम, अचानक उन्नति और अचानक दिशा-परिवर्तन लाती है। लोग इसे "और चाहने और तेज़ चलने" का समय बताते हैं। यह कैसे फलित होगा, यह राहु के भाव, राशि, राशि-स्वामी और साथ बैठे ग्रहों पर निर्भर है। उपचय भावों (3, 6, 11) में राहु को व्यापक रूप से अच्छा माना जाता है, क्योंकि वहाँ बेचैन ऊर्जा प्रयास और लाभ में बदल जाती है। भीतर की हर अंतर्दशा इस दशा को अलग रंग देती है।

राहु का गोचर

राहु और केतु राशिचक्र में उल्टी दिशा में चलते हैं, हर राशि में लगभग 18 माह, और पूरा चक्र करीब 18.6 वर्ष में। दोनों सदा एक-दूसरे के ठीक सामने रहते हैं। जब सूर्य या चंद्रमा इनके पास आते हैं तो ग्रहण संभव होता है; इसीलिए ग्रहण का मौसम लगभग हर छह महीने में आता है।

जन्म के चंद्रमा या लग्न जैसे संवेदनशील बिंदुओं पर राहु का गोचर प्रायः बढ़ी हुई इच्छा या उलझन के दौर के रूप में महसूस होता है। पारंपरिक नियमों में चंद्रमा से 3, 6 और 11वीं राशि में राहु का गोचर अनुकूल गिना जाता है। हर गोचर की तरह यह भी जन्म कुंडली और चल रही दशा के भीतर ही काम करता है।

राहु, काल सर्प और राहु काल

जब सातों ग्रह राहु और केतु के बीच एक ओर आ जाएँ, तो अनेक ज्योतिषी इसे काल सर्प योग कहते हैं। यह बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में नहीं मिलता और इसके भंग की कई स्थितियाँ हैं; हमारा काल सर्प लेख इसे बिना डर के समझाता है। पंचांग में दिखने वाला रोज़ का राहु काल नाम में समान है, पर कुंडली के राहु से उसका कोई संबंध नहीं।

भावों में राहु, संक्षेप में

  • प्रथम: ख़ुद को नए रूप में गढ़ने की तीव्र चाह, लीक से हटकर छवि।
  • चतुर्थ: घर को लेकर बेचैनी; बार-बार स्थान बदलना या विदेश में घर।
  • सप्तम: अलग पृष्ठभूमि वाले साथी की ओर आकर्षण।
  • दशम: सार्वजनिक जीवन में महत्वाकांक्षा, अक्सर नए या बड़े क्षेत्रों में।
  • तृतीय, षष्ठ, एकादश: जैसा ऊपर कहा, सामान्यतः फलदायी।
  • द्वादश: विदेश, आध्यात्मिक खोज, निजी ख़र्च।

राहु कभी अकेला काम नहीं करता। इसे इसके राशि-स्वामी, सामने बैठे केतु और बाकी कुंडली के साथ पढ़ा जाता है; कोई एक कारक पूरी कुंडली तय नहीं करता। अपना राहु कहाँ है, यह मुफ़्त कुंडली में देखें, और उस शनि से तुलना करें जिसके फल राहु दोहराता माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या राहु कोई असली ग्रह है?

नहीं। राहु उत्तरी चंद्र पात है, वह बिंदु जहाँ चंद्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को उत्तर की ओर जाते हुए काटता है। इसका कोई शरीर नहीं, पर ग्रहण और कुंडली पर प्रभाव के कारण ज्योतिष इसे ग्रह गिनता है।

राहु किस राशि में उच्च होता है?

इस पर ग्रंथ एकमत नहीं। अनेक ग्रंथ वृषभ बताते हैं, कुछ मिथुन। कुछ आधुनिक लेखक राहु को कुंभ का सह-स्वामी भी मानते हैं, जबकि बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में कुंभ केवल शनि की राशि है।

राहु की महादशा कितने वर्ष की होती है?

विंशोत्तरी दशा में 18 वर्ष। यह मंगल की दशा के बाद और गुरु की दशा से पहले आती है।

क्या राहु काल का संबंध मेरी कुंडली के राहु से है?

नहीं। राहु काल सूर्योदय और सूर्यास्त से निकलने वाला रोज़ का एक समय-खंड है। किसी स्थान पर यह सबके लिए एक जैसा होता है और आपकी कुंडली में राहु कहाँ है, इससे इसका कोई लेना-देना नहीं।

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • फलदीपिका

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति