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नक्षत्र · Shatabhisha

शतभिषा नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और चरण

शतभिषा नक्षत्र कुंभ राशि में 6°40′ से 20° तक है, स्वामी राहु और देवता वरुण। जानिए शतभिषा का अर्थ, रिक्त वृत्त प्रतीक, स्वभाव, चारों चरण और नामाक्षर।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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शतभिषा नक्षत्र — एक नज़र में

विस्तार (निरयण)
कुंभ 6°40′–20°
राशिचक्र में
306°40′ – 320°
स्वामी ग्रह
राहु (18 वर्ष की महादशा)
देवता
वरुण, जल और ऋत के देवता
प्रतीक
रिक्त वृत्त
गण
राक्षस
योनि
अश्व (स्त्री)
नाड़ी
आदि (वात)
नाम अक्षर
गो, सा, सी, सू
क्रम
27 में 24वाँ

चारों चरण

चरणराशि में अंशनवांश राशिअक्षर
1कुंभ 6°40′–10°धनुगो
2कुंभ 10°–13°20′मकरसा
3कुंभ 13°20′–16°40′कुंभसी
4कुंभ 16°40′–20°मीनसू
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शतभिषा चौबीसवाँ नक्षत्र है, जो निरयन राशिचक्र में 306°40′ से 320° तक, यानी कुंभ राशि के 6°40′ से 20° तक फैला है। इसका स्वामी राहु है, देवता वरुण हैं — जल और ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के वैदिक देवता — और इसके नाम का प्रचलित अर्थ है "सौ वैद्य"।

राहु के तीन नक्षत्रों (आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा) में केवल शतभिषा ही शनि की राशि में है, और यह पूरा का पूरा कुंभ के उस 0°–20° भाग में है जो शनि का मूलत्रिकोण है। यहाँ राहु की असामान्य की ओर खिंचने वाली प्रवृत्ति शनि की गंभीरता से मिलती है। इसीलिए शतभिषा को सबसे स्वतंत्र और एकांतप्रिय नक्षत्रों में गिना जाता है।

वरुण और रिक्त वृत्त

ऋग्वेद में वरुण सबसे प्राचीन और गंभीर देवताओं में हैं। वे ऋत को धारण करते हैं — वह व्यवस्था जिससे नदियाँ बहती हैं और ऋतुएँ बदलती हैं। वे छिपकर किए गए कामों को भी देखते हैं और मनुष्य को उसके वचन से बाँधे रखते हैं। बाद की कथाओं में वरुण मुख्यतः समुद्र के देवता रह जाते हैं, पर इस नक्षत्र का स्वभाव उसी पुराने रूप से बनता है — सत्य के रक्षक, जिनसे कुछ छिपा नहीं।

प्रतीक है एक रिक्त वृत्त। वृत्त का न आदि है न अंत, और वह एक स्थान को घेरता है। इसके कई अर्थ किए जाते हैं: रक्षा करने वाली सीमा, वह पूर्णता जिसे वैद्य लौटाना चाहता है, या वह ख़ालीपन जिसमें अंतर्दृष्टि के लिए जगह बनती है। ग्रंथ किसी एक अर्थ पर नहीं रुकते, और यह खुलापन शतभिषा के स्वभाव से मेल खाता है।

"सौ वैद्य" नाम इस नक्षत्र को औषधि, जड़ी-बूटी और उपचार की परंपराओं से जोड़ता है। शास्त्रकार इसे किसी विशेष पेशे का नहीं, बल्कि खोजी और समस्या सुलझाने वाले मन का संकेत मानते हैं।

गण, योनि और नाड़ी

शतभिषा राक्षस गण, अश्व योनि (स्त्री) और आदि (वात) नाड़ी का नक्षत्र है।

राक्षस गण यहाँ आत्मनिर्भरता और दृढ़ इच्छाशक्ति का नाम है, चरित्र पर कोई टिप्पणी नहीं। गुण मिलान में इसका मनुष्य या देव गण से मेल बहुत कम अंक देता है, जबकि दो राक्षस गण वालों का मेल पूरे अंक पाता है। अश्व योनि का परंपरागत बैर महिष (भैंसा) योनि से है, और दोनों की आदि नाड़ी हो तो अपवाद न होने पर नाड़ी के 8 अंक नहीं मिलते। ये आठ कूटों में से तीन हैं, और कूट अपने आप में केवल पहला क़दम हैं; दोनों कुंडलियाँ पूरी पढ़ी जाती हैं। कुंडली मिलान में यह सब विस्तार से दिखता है।

मुहूर्त में शतभिषा

मुहूर्त चिंतामणि में शतभिषा चर नक्षत्र है — स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण और धनिष्ठा के साथ। यात्रा, वाहन, गृह-परिवर्तन और गतिशील कामों के लिए इसे उपयुक्त माना गया है। वैद्य-संबंध के कारण कुछ पंचांग इसे नई दिनचर्या या उपचार आरंभ करने के लिए भी बताते हैं — यह केवल समय चुनने की परंपरा है, चिकित्सा सलाह नहीं।

शतभिषा पंचक की अवधि (चंद्रमा का कुंभ और मीन में रहना) में आता है। यह उत्तर भारत की मुहूर्त-परंपरा है, जिसमें कुछ परिवार गिने-चुने काम टालते हैं। इससे इस नक्षत्र में जन्म लेना किसी भी तरह अशुभ नहीं होता।

स्वभाव

शतभिषा के जातक प्रायः विचारशील, मौलिक, सत्यप्रिय और कुछ संकोची बताए जाते हैं। अकेले रहना इन्हें सहज लगता है। शोध, तकनीक, विज्ञान, दर्शन — ऐसा कोई भी क्षेत्र इन्हें खींचता है जहाँ सतह के नीचे जाकर देखना पड़े। न्याय की गहरी समझ होती है और दिखावे से धैर्य कम।

विकास के क्षेत्र इन्हीं गुणों से निकलते हैं। एकांत की पसंद दूरी में बदल सकती है; साफ़ सोच कभी रूखी लग सकती है; और हर समस्या अकेले सुलझाने की आदत दूसरों को मदद करने से रोक सकती है। कुछ लोगों को उस वृत्त के भीतर आने देना — यही वह पाठ है जिस पर यह नक्षत्र जीवन भर काम करता है।

चारों चरण

शतभिषा के चरणों की नवांश राशियाँ धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं।

पहला चरण — कुंभ 6°40′ से 10° (धनु नवांश)

गुरु का नवांश आशावाद, दार्शनिक रुझान और शिक्षा या यात्रा में रुचि लाता है। यह शतभिषा का सबसे खुला और उम्मीद भरा चरण है।

दूसरा चरण — कुंभ 10° से 13°20′ (मकर नवांश)

शनि का नवांश इस चरण को व्यावहारिक, महत्वाकांक्षी और व्यवस्थित बनाता है। संस्थाओं के भीतर लंबा, स्थिर काम और धीरे-धीरे बनती प्रतिष्ठा इससे जुड़ी है।

तीसरा चरण — कुंभ 13°20′ से 16°40′ (कुंभ नवांश)

यहाँ राशि और नवांश एक ही हैं, इसलिए इस चरण में बैठा ग्रह वर्गोत्तम होता है — परंपरा में इसे बल और स्थिरता का चिह्न माना गया है। यह सबसे "कुंभ-स्वभाव" वाला शतभिषा है: आविष्कारी, मानवतावादी और स्वतंत्र।

चौथा चरण — कुंभ 16°40′ से 20° (मीन नवांश)

गुरु का जलीय नवांश करुणा, कल्पना और आध्यात्मिक या चिंतनशील झुकाव देता है। वैद्य वाला भाव यहाँ सबसे कोमल और अंतर्ज्ञानी रूप में दिखता है।

नामाक्षर

शतभिषा के नामाक्षर हैं — गो, सा, सी, सू। जैसे, चंद्रमा तीसरे चरण में हो तो परंपरा से नाम "सी" से आरंभ होगा।

चंद्र, लग्न और ग्रह शतभिषा में

जन्म-चंद्र यहाँ हो तो पहली महादशा राहु की होती है, और चंद्र राशि कुंभ होती है; इसलिए शनि का गोचर, साढ़े साती समेत, कुंभ से गिना जाता है।

लग्न शतभिषा में हो तो राशि-स्वामी शनि और नक्षत्र-स्वामी राहु दोनों व्यक्तित्व पढ़ने में अहम हो जाते हैं। यहाँ बैठे ग्रह प्रायः खोजी, लीक से हटकर सोचने वाला रंग लेते हैं; स्वयं शनि यहाँ अपने मूलत्रिकोण में होता है, जिसे शास्त्र बली स्थिति मानते हैं।

राहु को कितना महत्व दिया जाए, इस पर परंपराएँ अलग हैं। कुछ आधुनिक लेखक राहु को कुंभ का सह-स्वामी मानते हैं, जबकि बृहत् पाराशर होरा शास्त्र यह राशि केवल शनि को देता है। जो भी मत हो, पूरी कुंडली — भाव, दृष्टि और चल रही दशा — किसी एक लेबल से अधिक मायने रखती है।

अपना चंद्रमा कहाँ है, यह जानने के लिए मुफ़्त कुंडली बनाइए। पड़ोसी नक्षत्र हैं — पहले धनिष्ठा और बाद में पूर्वा भाद्रपद; राहु के अन्य नक्षत्र आर्द्रा और स्वाति हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शतभिषा नक्षत्र का स्वामी कौन है?

राहु। जन्म-चंद्र शतभिषा में हो तो विंशोत्तरी क्रम राहु की महादशा से शुरू होता है, जिसकी पूरी अवधि 18 वर्ष है; जन्म के समय शेष भाग चंद्रमा के अंश से निकलता है।

शतभिषा का अर्थ क्या है?

सामान्य अर्थ है "सौ वैद्य" या "सौ उपचारक"। एक और अर्थ "सौ तारे" है, क्योंकि यह नक्षत्र कई धुँधले तारों के समूह से पहचाना जाता है। इसका दूसरा नाम शततारका है।

शतभिषा किस राशि में आता है?

पूरी तरह कुंभ राशि में, 6°40′ से 20° तक। यह पूरा भाग कुंभ में शनि के मूलत्रिकोण क्षेत्र (0° से 20°) के भीतर है।

शतभिषा नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

गो, सा, सी और सू — पहले से चौथे चरण तक।

राहु के अन्य नक्षत्र

हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है, एक-एक राशिचक्र के हर तिहाई में। इन तीनों में जन्मे लोगों की विंशोत्तरी दशा राहु की महादशा से शुरू होती है।

राक्षस गण के अन्य नक्षत्र

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • ऋग्वेद (वरुण सूक्त)

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति