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नक्षत्र · Pushya

पुष्य नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और चरण

पुष्य नक्षत्र कर्क राशि में 3°20′ से 16°40′ तक है, स्वामी शनि और देवता बृहस्पति। जानिए इसका स्वभाव, चारों चरण, नाम अक्षर और मुहूर्त में उपयोग।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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पुष्य नक्षत्र — एक नज़र में

विस्तार (निरयण)
कर्क 3°20′–16°40′
राशिचक्र में
93°20′ – 106°40′
स्वामी ग्रह
शनि (19 वर्ष की महादशा)
देवता
बृहस्पति, देवगुरु
प्रतीक
गाय का थन, या पुष्प
गण
देव
योनि
मेष (मेढ़ा) (पुरुष)
नाड़ी
मध्य (पित्त)
मुहूर्त वर्ग
क्षिप्र (लघु)
नाम अक्षर
हू, हे, हो, डा
क्रम
27 में 8वाँ

चारों चरण

चरणराशि में अंशनवांश राशिअक्षर
1कर्क 3°20′–6°40′सिंहहू
2कर्क 6°40′–10°कन्याहे
3कर्क 10°–13°20′तुलाहो
4कर्क 13°20′–16°40′वृश्चिकडा
इस पृष्ठ पर

पुष्य 27 नक्षत्रों में आठवाँ है। यह निरयन कर्क राशि में 3°20′ से 16°40′ तक फैला है, इसका स्वामी शनि है और देवता देवगुरु बृहस्पति। "पुष्य" का अर्थ है पोषण करने वाला, और इसी कारण ज्योतिष परंपरा में इसे सबसे शुभ और सहायक नक्षत्र माना जाता है।

पुराने ग्रंथों में इसे तिष्य और सिध्य नाम से भी जाना गया है। सिध्य का भाव है सिद्धि देने वाला। तीनों नाम एक ही बात कहते हैं कि पुष्य वह स्थान है जहाँ चीज़ें पलती-बढ़ती हैं और सुरक्षित रहती हैं।

राशि में स्थान

पूरा पुष्य नक्षत्र कर्क राशि में है, जो चंद्रमा की अपनी राशि है। इससे पहले पुनर्वसु और बाद में आश्लेषा आता है। कर्क हृदय, घर और ममता की राशि है; पुष्य इन गुणों को अनुशासन और टिकाऊपन देता है।

यहाँ एक ख़ास बात है। गुरु कर्क के 5° पर परम उच्च होता है, और यह बिंदु पुष्य के पहले चरण में पड़ता है। मंगल का नीच बिंदु कर्क 28° अगले नक्षत्र आश्लेषा में है, पुष्य में नहीं। यानी राशिचक्र में गुरु का सबसे उदार बिंदु पुष्य में है, जबकि विंशोत्तरी में इस नक्षत्र का स्वामी शनि है।

स्वामी शनि, देवता बृहस्पति

शनि और बृहस्पति की जोड़ी पहली नज़र में अनोखी लगती है। शनि धीमा, कर्तव्यनिष्ठ और गंभीर है; बृहस्पति देवताओं के आचार्य, पुरोहित और सलाहकार। पुष्य में दोनों साथ काम करते हैं। बृहस्पति ज्ञान और आशीर्वाद देता है, शनि धैर्य और रोज़ निभाने की आदत। नतीजा ऐसी देखभाल है जो लंबी चले — जैसे रोज़ पढ़ाने आने वाला शिक्षक, घर का नियम सँभालने वाले माता-पिता, या पीढ़ियों तक सेवा करने वाली संस्था।

कथाओं में देवता मार्गदर्शन, विधिपूर्वक यज्ञ या कठिन निर्णय के समय बृहस्पति के पास जाते हैं। पुष्य नक्षत्र वाले लोग भी परिवार और कार्यस्थल में अक्सर यही भूमिका निभाते हैं — सबसे ऊँची आवाज़ नहीं, सबसे भरोसेमंद सलाहकार।

प्रतीक, गण, योनि और नाड़ी

पुष्य का प्रतीक गाय का थन है; कुछ ग्रंथ पुष्प या वृत्त भी बताते हैं। थन का अर्थ साफ़ है — निरंतर दूध जो दूसरों का पेट भरे। यह उस नक्षत्र पर ठीक बैठता है जिसका स्वभाव ही देना है।

पुष्य देव गण का नक्षत्र है — कोमल, सिद्धांतप्रिय और दयालु स्वभाव। इसकी योनि मेष (मेढ़ा), पुरुष है, और नाड़ी मध्य (पित्त)।

ये तीनों गुण मिलान में गिने जाते हैं। गण मैत्री के 6 अंक होते हैं; देव गण का मेल देव और मनुष्य दोनों से सहज माना जाता है। योनि के 4 अंक हैं, और मेढ़े की पारंपरिक शत्रु योनि वानर है (पूर्वाषाढ़ा और श्रवण)। नाड़ी के 8 अंक हैं; दोनों की नाड़ी एक हो तो यहाँ शून्य मिलता है, जब तक कोई शास्त्रीय अपवाद लागू न हो। इनमें से कोई भी अकेले विवाह का फ़ैसला नहीं करता — दोनों की पूरी कुंडली देखी जाती है।

मुहूर्त में पुष्य: क्षिप्र नक्षत्र

मुहूर्त चिंतामणि पुष्य को अश्विनी और हस्त के साथ क्षिप्र या लघु नक्षत्रों में रखती है। ऐसे नक्षत्र उन कामों के लिए अच्छे माने जाते हैं जिन्हें आसानी से शुरू करके आगे बढ़ाना हो — विद्यारंभ, दुकान खोलना, व्यापार, यात्रा, कोई कला सीखना, उपचार आरंभ करना, आभूषण या उपयोगी वस्तुएँ ख़रीदना।

गुरुवार को पुष्य हो तो गुरु-पुष्य और रविवार को हो तो रवि-पुष्य योग कहलाता है; दोनों ख़रीदारी और नए काम के लिए लोकप्रिय हैं। विवाह इसका जाना-माना अपवाद है — बहुत-सी परंपराएँ पुष्य को विवाह नक्षत्रों में नहीं रखतीं, और परिवार अपनी क्षेत्रीय रीति मानते हैं। सही तिथि के लिए तिथि, वार और योग सब साथ देखे जाते हैं; मुहूर्त पेज यही करता है।

स्वभाव

चंद्रमा पुष्य में हो तो व्यक्ति प्रायः रक्षक, ज़िम्मेदार और किसी न किसी रूप में धार्मिक या सिद्धांतवादी होता है। परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य की गहरी भावना रहती है, परंपरा, पूजा-पाठ और व्यवस्था अच्छी लगती है। ऐसे लोग केवल संकट में नहीं, लंबे समय तक दूसरों का ध्यान रख पाते हैं।

बढ़ने की दिशाएँ भी इन्हीं गुणों से निकलती हैं। देखभाल कभी चिंता या नियंत्रण बन जाती है। शनि का प्रभाव सावधानी देता है, जो कभी निर्णय टाल देती है, और कर्क का चंद्रमा पुरानी चोट को देर तक सँभाले रखता है। पुष्य वालों के लिए सहारा लेना भी उतना ही सीखना अच्छा है जितना देना, और दूसरों को अपनी ग़लतियों से सीखने देना भी।

पुष्य के चार चरण

हर चरण 3°20′ का होता है और एक नवांश राशि में पड़ता है। पुष्य के चरण सिंह से वृश्चिक नवांश तक जाते हैं।

पहला चरण: कर्क 3°20′ से 6°40′, सिंह नवांश

सिंह नवांश गर्माहट, गरिमा और अपनी सेवा के लिए पहचान पाने की चाह जोड़ता है। गुरु का परम उच्च बिंदु इसी चरण में है, इसलिए इसे उदार, आत्मविश्वासी और सेवा-क्षेत्र में नेतृत्व के योग्य माना जाता है। नाम अक्षर: हू।

दूसरा चरण: कर्क 6°40′ से 10°, कन्या नवांश

कन्या नवांश व्यवस्था और बारीकी लाता है। पोषण का भाव व्यावहारिक रूप लेता है — हिसाब-किताब, दिनचर्या, सेवा का ऐसा काम जिससे घर या दफ़्तर सुचारु चले। नाम अक्षर: हे।

तीसरा चरण: कर्क 10° से 13°20′, तुला नवांश

तुला स्वर को कोमल बनाती है और साझेदारी, न्याय और सुंदर वातावरण की ओर ले जाती है। यह चरण मिलनसार और लोगों को जोड़ने वाला माना जाता है। नाम अक्षर: हो।

चौथा चरण: कर्क 13°20′ से 16°40′, वृश्चिक नवांश

वृश्चिक गहराई, निजता और तीव्रता देता है। भावनाएँ गहरी होती हैं; शोध, आत्मचिंतन या गूढ़ विद्या आकर्षित कर सकती है। चारों में यह सबसे अंतर्मुखी चरण है। नाम अक्षर: डा।

नाम अक्षर

उत्तर भारतीय परंपरा में पुष्य में जन्मे बच्चे के नाम के अक्षर चरण के क्रम से हू, हे, हो और डा हैं। दक्षिण भारतीय सूचियों में कहीं-कहीं थोड़ा अंतर मिलता है, इसलिए परिवार अपनी परंपरा से मिलान कर लेते हैं। नाम का पहला अक्षर कैसे चुना जाता है, यह नाम अक्षर में देखें।

चंद्रमा, लग्न और ग्रह पुष्य में

पुष्य का सबसे बड़ा असर तब है जब चंद्रमा यहाँ हो, क्योंकि जन्म नक्षत्र से ही विंशोत्तरी महादशा शुरू होती है। पुष्य के चंद्रमा से पहली दशा शनि की होती है, और उसके 19 वर्षों में से जन्म के समय कितना बचा है, यह इस पर निर्भर है कि चंद्रमा नक्षत्र में कितना आगे बढ़ चुका था।

लग्न पुष्य में हो तो कर्क लग्न के साथ यही गुण शरीर और जीवन-दृष्टि में दिखते हैं। यहाँ बैठे ग्रह इसके संरक्षक, सँजोने वाले स्वभाव को अपनाते हैं। गुरु यहाँ राशि से बलवान और उच्च बिंदु के पास है; शनि नक्षत्र का स्वामी होने से यहाँ अपेक्षा से अधिक सहज फल देता है। फिर भी एक नक्षत्र कभी पूरी कुंडली तय नहीं करता — स्वामी, भाव और दशाएँ सब साथ पढ़ी जाती हैं।

आपका चंद्रमा और लग्न किस नक्षत्र में हैं, यह जानने के लिए मुफ़्त कुंडली बनाइए। पड़ोसी नक्षत्रों पुनर्वसु और आश्लेषा के पेज दिखाते हैं कि कर्क का यही हिस्सा एक नक्षत्र से दूसरे में कैसे रंग बदलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुष्य नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन है?

विंशोत्तरी क्रम में पुष्य का स्वामी शनि है, इसलिए चंद्रमा यहाँ हो तो जन्म शनि की 19 वर्ष की महादशा से शुरू होता है। इसके देवता देवगुरु बृहस्पति हैं और पूरा नक्षत्र कर्क राशि में आता है।

पुष्य को नक्षत्रों का राजा क्यों कहते हैं?

परंपरा पुष्य को सबसे पोषक नक्षत्र मानती है। यह क्षिप्र (लघु) वर्ग का नक्षत्र है, इसलिए विद्या आरंभ, व्यापार और ख़रीदारी जैसे शुभारंभ के लिए प्रिय है। गुरुवार के दिन पड़े तो गुरु-पुष्य योग बनता है। फिर भी मुहूर्त पूरे पंचांग से तय होता है।

क्या पुष्य नक्षत्र में विवाह होता है?

अधिकतर मुहूर्त परंपराएँ पुष्य को विवाह के नक्षत्रों में नहीं गिनतीं, भले ही बाक़ी कामों के लिए यह बहुत शुभ माना जाता है। क्षेत्रीय परंपराएँ अलग हो सकती हैं।

पुष्य नक्षत्र के नाम अक्षर कौन से हैं?

उत्तर भारतीय परंपरा में चारों चरणों के अक्षर क्रम से हू, हे, हो और डा हैं।

शनि के अन्य नक्षत्र

हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है, एक-एक राशिचक्र के हर तिहाई में। इन तीनों में जन्मे लोगों की विंशोत्तरी दशा शनि की महादशा से शुरू होती है।

देव गण के अन्य नक्षत्र

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • बृहत् संहिता (वराहमिहिर)

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति