गुरु, जिसे बृहस्पति भी कहते हैं, वैदिक ज्योतिष का सबसे बड़ा नैसर्गिक शुभ ग्रह है और ज्ञान, गुरुजन, संतान, धर्म तथा भाग्य का कारक है। यह धनु और मीन राशि का स्वामी है, कर्क में उच्च और मकर में नीच होता है, अपने से 5वें, 7वें और 9वें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है और इसकी महादशा 16 वर्ष की होती है।
पुराणों में बृहस्पति देवताओं के आचार्य हैं, जो कठिन समय में देवों को सही सलाह देते हैं। ज्योतिष में भी गुरु को इसी रूप में पढ़ा जाता है: यह बल या आवेग का ग्रह नहीं, विवेक और समझ का ग्रह है, जो पढ़ाई, अनुभव और उम्र के साथ गहरी होती है। इसका वार गुरुवार है और तत्व आकाश, यानी विस्तार का तत्व। जो ग्रह दृष्टि को बड़ा करे, उसके लिए यह तत्व स्वाभाविक लगता है।
गुरु किन बातों का कारक है
शास्त्रों में गुरु के कारकत्व की सूची लंबी है, पर सबके बीच एक सूत्र है: जो भी व्यक्ति को भीतर से बड़ा करे, जीवन को अर्थ दे।
- ज्ञान और विद्या, विशेषकर शास्त्र, दर्शन, न्याय और अध्यापन।
- गुरु, बड़े-बुज़ुर्ग, सलाहकार और मार्गदर्शक।
- संतान। गुरु पंचम भाव का नैसर्गिक कारक है, इसलिए संतान का विचार करते समय पंचम भाव के साथ गुरु की स्थिति भी देखी जाती है।
- धर्म और भाग्य। यह नवम भाव का भी कारक है, जो आस्था, उच्च शिक्षा और भाग्य का भाव है।
- धन, क्योंकि यह द्वितीय और एकादश भाव का भी कारक माना गया है।
- स्त्री की कुंडली में शास्त्र गुरु को पति का कारक बताते हैं। आज के ज्योतिषी इसे जीवनसाथी के व्यापक अर्थ में भी पढ़ते हैं।
कालपुरुष के शरीर-विभाजन में गुरु का संबंध मेद (चर्बी) और शरीर की वृद्धि से जोड़ा गया है। यह शास्त्रीय प्रतीक है, किसी रोग या इलाज की बात नहीं।
स्वराशि, उच्च और नीच
गुरु की दोनों राशियाँ अर्थ और आस्था से जुड़ी हैं: धनु, धर्म और तीर्थ की अग्नि राशि, और मीन, भक्ति और समर्पण की जल राशि। धनु के 0 से 10 अंश इसकी मूलत्रिकोण राशि हैं, जहाँ गुरु सबसे सहज रूप से अपना काम करता है।
गुरु कर्क में उच्च का होता है, 5 अंश पर सबसे अधिक। चंद्रमा की इस राशि में ज्ञान करुणा और संरक्षण का रूप ले लेता है, इसलिए उच्च गुरु को उदार और सिद्धांतवान प्रभाव माना जाता है। मकर में 5 अंश पर यह नीच का होता है। मकर व्यावहारिक और ज़मीनी राशि है, जहाँ आदर्शों को नतीजों की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। नीच गुरु कोई फ़ैसला नहीं है: शास्त्र नीचभंग की कई स्थितियाँ बताते हैं, और बहुत से योग्य लोगों की कुंडली में नीच गुरु मिलता है।
मित्र, शत्रु और सम ग्रह
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र की नैसर्गिक मैत्री के अनुसार सूर्य, चंद्र और मंगल गुरु के मित्र हैं, बुध और शुक्र शत्रु, और शनि सम। शुक्र से शत्रुता की एक पौराणिक छाया भी है: शुक्राचार्य असुरों के गुरु हैं और बृहस्पति देवों के, यानी दो आचार्य, दो अलग पाठ्यक्रम। व्यवहार में यह तालिका अकेले काफ़ी नहीं; कुंडली में ग्रहों की आपसी स्थिति से बनने वाली तात्कालिक मैत्री भी देखी जाती है।
दृष्टि और दिग्बल
हर ग्रह अपने से सातवें भाव को देखता है। गुरु की दो विशेष पूर्ण दृष्टियाँ और हैं, पाँचवीं और नौवीं। ये दोनों त्रिकोण भाव हैं, और परंपरा में गुरु की दृष्टि को रक्षा करने वाली माना गया है। जिस भाव या ग्रह पर गुरु की दृष्टि हो, वहाँ कठिनाई के बीच भी कोई सहारा मिलने की बात कही जाती है।
गुरु को दिग्बल प्रथम भाव यानी लग्न में, पूर्व दिशा में मिलता है। लग्न में गुरु अच्छी समझ, नैतिकता और समाज में सम्मान देने वाला माना गया है।
गुरु की महादशा: 16 वर्ष
विंशोत्तरी दशा में गुरु की महादशा 16 वर्ष की होती है और राहु की दशा के बाद आती है। जिनका जन्म पुनर्वसु, विशाखा या पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में हुआ है, उनका जीवन गुरु की दशा से शुरू होता है; कितनी दशा बाकी है, यह जन्म के समय चंद्रमा के अंश से तय होता है।
गुरु की दशा में आमतौर पर पढ़ाई, अध्यापन, परिवार का बढ़ना, विवाह या संतान, आस्था और बढ़ती ज़िम्मेदारियों जैसे विषय उभरते हैं। पर यह केवल सामान्य रंग है। असली फल इस पर टिका है कि आपकी कुंडली में गुरु किन भावों का स्वामी है, कहाँ बैठा है, कितना बली है और उस पर किसकी दृष्टि है। कुछ लग्नों के लिए गुरु एक शुभ भाव के साथ किसी दुःस्थान का भी स्वामी होता है, तब उसकी दशा में दोनों तरह के अनुभव मिलते हैं। भीतर चलने वाली अंतर्दशाएँ हर हिस्से को अलग रंग देती हैं।
गुरु का गोचर
गुरु एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है और करीब 12 वर्ष में राशिचक्र पूरा करता है। इसी कारण लोग गुरु के गोचर को "साल का असर" कहकर जानते हैं। परंपरा में जन्म के चंद्रमा से 2, 5, 7, 9 और 11वीं राशि में गुरु का गोचर अनुकूल माना जाता है, बाकी स्थानों में कम सहायक। गोचर हमेशा जन्म कुंडली और चल रही दशा के साथ पढ़ा जाता है; कठिन दशा में अच्छा गोचर कम दे पाता है, और उल्टा भी सच है।
हर साल गुरु करीब चार महीने वक्री भी रहता है। शास्त्रीय दृष्टि में वक्री गुरु कमज़ोर नहीं; कुछ ग्रंथ इसे बली मानते हैं, और अनेक ज्योतिषी इसे भीतर की ओर मुड़ा हुआ ज्ञान पढ़ते हैं, जो पुरानी बातों को दोबारा परखता है।
गुरु से बनने वाले योग
गुरु कई प्रसिद्ध योगों में आता है। चंद्रमा से केंद्र में गुरु हो तो गजकेसरी योग बनता है, जो सबसे अधिक चर्चित है। लग्न से केंद्र में गुरु अपनी या उच्च राशि में हो तो पंच महापुरुष योगों में से हंस योग बनता है। हर योग की तरह इनका पूरा फल तभी मिलता है जब संबंधित ग्रह ठीक-ठाक बली हों। और याद रखें, कोई एक योग या एक ग्रह पूरी कुंडली का फ़ैसला नहीं करता; पूरी कुंडली साथ पढ़ी जाती है।
भावों में गुरु, संक्षेप में
- केंद्र (1, 4, 7, 10) में गुरु सबसे अधिक दिखाई देता है और संरक्षण तथा अच्छी सलाह देता है।
- त्रिकोण (5, 9) में यह अपने ही स्वाभाविक भावों में होता है, जिसे परंपरा सुखद स्थिति मानती है।
- 6, 8 या 12वें भाव में यह चुपचाप काम करता है: सेवा, शोध या आध्यात्मिक जीवन के ज़रिए।
- तीसरे और ग्यारहवें भाव में यह क्रमशः प्रयास और लाभ को सहारा देता है, हालाँकि कुछ ग्रंथ कहते हैं कि इसकी सौम्यता संघर्ष वाले तीसरे भाव के लिए कम उपयुक्त है।
आपका गुरु किस भाव और राशि में है, यह देखने के लिए अपनी मुफ़्त कुंडली बनाइए। बाकी ग्रह ग्रह पृष्ठ पर हैं, और शुभ ग्रहों में गुरु के साथी शुक्र के बारे में आगे पढ़ सकते हैं।