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नक्षत्र · Punarvasu

पुनर्वसु नक्षत्र: स्वामी गुरु, देवता अदिति, चरण

पुनर्वसु नक्षत्र मिथुन 20° से कर्क 3°20′ तक है, स्वामी बृहस्पति और देवता अदिति। जानिए इसका अर्थ, चर स्वभाव, चारों चरण, गण, योनि, नाड़ी और नामाक्षर।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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पुनर्वसु नक्षत्र — एक नज़र में

विस्तार (निरयण)
मिथुन 20°–30° और कर्क 0°–3°20′
राशिचक्र में
80° – 93°20′
स्वामी ग्रह
गुरु (16 वर्ष की महादशा)
देवता
अदिति, देवताओं की माता
प्रतीक
बाणों से भरा तरकश
गण
देव
योनि
मार्जार (स्त्री)
नाड़ी
आदि (वात)
नाम अक्षर
के, को, हा, ही
क्रम
27 में 7वाँ

चारों चरण

चरणराशि में अंशनवांश राशिअक्षर
1मिथुन 20°–23°20′मेषके
2मिथुन 23°20′–26°40′वृषभको
3मिथुन 26°40′–30°मिथुनहा
4कर्क 0°–3°20′कर्कही
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पुनर्वसु सातवाँ नक्षत्र है, जो निरयण राशिचक्र में मिथुन के 20° से कर्क के 3°20′ तक फैला है और इसका स्वामी बृहस्पति है। इसकी देवता असीम देवमाता अदिति हैं और प्रतीक बाणों से भरा तरकश, इसलिए पुनर्वसु नवीनीकरण, घर लौटने और आशा के साथ फिर से शुरू करने का नक्षत्र है।

नाम ही सब कह देता है: "पुनः" यानी फिर, "वसु" यानी शुभ, धन या प्रकाश। तूफ़ानी आर्द्रा के ठीक बाद आने वाला पुनर्वसु बारिश के बाद खुलता आसमान है। इसके दो चमकीले तारे वही हैं जिन्हें पश्चिम में जुड़वाँ तारे (कैस्टर और पोलक्स) कहा जाता है।

दो राशियों में गुरु

पुनर्वसु के तीन चरण बुध की मिथुन राशि में हैं और अंतिम चरण चंद्रमा की कर्क राशि में। नक्षत्र स्वामी बृहस्पति है, ज्ञान, आस्था और शिक्षा का महान शुभ ग्रह। मिथुन में गुरु का ज्ञान शब्दों, पढ़ाई और विचारों से प्रकट होता है; कर्क में वह पालने और बचाने वाला बन जाता है। गुरु कर्क में उच्च का होता है। उसका परम उच्च अंश 5° कर्क अगले नक्षत्र पुष्य में है, और पुनर्वसु का अंतिम चरण सीधा वहीं ले जाता है।

गुरु के तीन नक्षत्र हैं: पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद। तीनों के तीन चरण एक राशि में और अंतिम चरण अगली राशि में है। तीनों आदर्शवादी और लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले हैं; पुनर्वसु का रूप सबसे कोमल और क्षमाशील है।

अदिति, असीम माता

अदिति का अर्थ है "जो बँधी न हो", सीमाहीन। वे आदित्यों (सूर्य देवताओं) की माता हैं, और वामन रूप में विष्णु की भी। वे विस्तार, उदारता और ऐसी क्षमा की प्रतीक हैं जो हर किसी के लिए जगह बना दे। जहाँ आर्द्रा में रुद्र चीज़ें तोड़ते हैं, वहाँ अदिति अपनी संतानों को फिर से समेट लेती हैं।

पुनर्वसु से एक प्रसिद्ध जन्म भी जुड़ा है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का जन्म तब हुआ जब चंद्रमा अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु में था। यह कथा नक्षत्र के मूल भाव से मेल खाती है: संसार में धर्म का लौटना, वनवास के बाद घर वापसी।

प्रतीक: तरकश

तरकश में ऐसे बाण होते हैं जिन्हें बार-बार निकालकर चलाया जा सके। यह कभी ख़त्म न होने वाले साधन, दूसरे अवसर, और चूकने के बाद फिर निशाना साधने की क्षमता का प्रतीक है। कुछ ग्रंथ इसका प्रतीक घर भी बताते हैं, जिसमें सुरक्षित घर लौटने का वही भाव है। दोनों में स्थिर, फिर-फिर भरने वाली पूर्ति का चित्र है।

गण, योनि और नाड़ी

पुनर्वसु देव गण का है: स्नेही, संतोषी और उदार। इसकी योनि मार्जार (मादा) है, जिसकी जोड़ी आश्लेषा (नर मार्जार) से बनती है। इसकी नाड़ी आदि (वात) है, ठीक पहले वाली आर्द्रा जैसी।

गुण मिलान में इनके 6, 4 और 8 गुण गिने जाते हैं। दोनों चंद्रमा आदि नाड़ी में हों, जैसे पुनर्वसु के साथ अश्विनी, आर्द्रा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा या पूर्वा भाद्रपद, तो अपवाद न लगने पर नाड़ी में शून्य मिलता है। कोई एक बात कुंडली का फ़ैसला नहीं करती; समझदारी का मिलान दोनों पूरी कुंडलियाँ देखता है।

मुहूर्त में स्वभाव: चर

मुहूर्त चिंतामणि पुनर्वसु को स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा के साथ चर (चल) नक्षत्रों में रखता है। ये गति और बदलाव वाले कामों के लिए अनुकूल हैं: यात्रा पर निकलना, वाहन ख़रीदना या पहली बार चलाना, तीर्थ जाना, बाग़वानी और बढ़ने वाले काम। चंद्रमा कब पुनर्वसु में है, यह पंचांग में रोज़ का नक्षत्र देखकर जाना जा सकता है।

स्वभाव

चंद्रमा पुनर्वसु में हो तो मन प्रायः आशावादी, दयालु, लचीला और थोड़े में संतुष्ट होता है। ख़ूबियाँ हैं: क्षमाशीलता, असफलता के बाद फिर खड़े होना, सिखाने और समझाने का गुण, ईमानदारी, और घर-परिवार के लिए गहरा स्नेह। कई पुनर्वसु जातक शिक्षा, परामर्श, लेखन, यात्रा और सेवा के कामों की ओर जाते हैं।

विकास की दिशाएँ सहज संतोष का दूसरा पहलू हैं: ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा, आराम मिलते ही काम अधूरा छोड़ देना, मिथुन वाले चरणों में बेचैनी, और जो है उसे सुधारने की बजाय फिर से शुरू कर देने की आदत। पुनर्वसु तब बढ़ता है जब अपनी आशा में लगन भी जोड़ता है।

पुनर्वसु के चारों चरण

पुनर्वसु के चरण नवांश चक्र की शुरुआत पर लौटते हैं: मेष, वृषभ, मिथुन और कर्क। इनमें दो वर्गोत्तम हैं।

पहला चरण: मिथुन 20° से 23°20′ (मेष नवांश)

मंगल का नवांश पुनर्वसु को ऊर्जा, साहस और खिलाड़ी जैसा, साहसिक मन देता है। सबसे मुखर चरण, जो गिरकर तुरंत फिर उठ खड़ा होता है।

दूसरा चरण: मिथुन 23°20′ से 26°40′ (वृषभ नवांश)

शुक्र का पृथ्वी नवांश इसे व्यावहारिक और सुख-प्रेमी बनाता है: धन की अच्छी समझ, और घर, सौंदर्य व अच्छे भोजन से प्रेम।

तीसरा चरण: मिथुन 26°40′ से 30° (मिथुन नवांश)

राशि और नवांश दोनों मिथुन, इसलिए यह चरण वर्गोत्तम है। बौद्धिक, संवादकुशल और बहुमुखी; लेखन, अध्यापन, अध्ययन और बातचीत के लिए उपयुक्त।

चौथा चरण: कर्क 0° से 3°20′ (कर्क नवांश)

राशि और नवांश दोनों कर्क, यह भी वर्गोत्तम है। सबसे भावुक और समर्पित चरण, परिवार, पोषण और आस्था पर केंद्रित, और गुरु की उच्च राशि में।

नामाक्षर

पुनर्वसु के नामाक्षर हैं के, को, हा और ही।

चंद्रमा, लग्न या ग्रह पुनर्वसु में

  • चंद्रमा पुनर्वसु में: जीवन गुरु की महादशा से शुरू होता है, जो पूरी 16 वर्ष की है; शेष भाग चंद्रमा के अंश से तय होता है।
  • लग्न पुनर्वसु में: सुखद, खुला चेहरा, धैर्यवान व्यवहार और सद्भाव भरा व्यक्तित्व।
  • ग्रह पुनर्वसु में: यहाँ बैठे ग्रह गुरु की उदारता ले लेते हैं, और प्रायः पहली रुकावट के बाद लौटकर या सुधरकर फल देते हैं।

मुफ़्त कुंडली आपका जन्म नक्षत्र और चरण बताती है। पास के पन्ने: पहले आर्द्रा, आगे पुष्य, या नक्षत्रों का परिचय।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुनर्वसु नक्षत्र किस राशि में आता है?

पहले तीन चरण मिथुन (20° से 30°) में हैं और चौथा चरण कर्क (0° से 3°20′) में। इसलिए ज़्यादातर पुनर्वसु जातकों की चंद्र राशि मिथुन होती है, और चौथे चरण वालों की कर्क।

पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी कौन है?

बृहस्पति (गुरु)। इसकी देवता देवमाता अदिति हैं और प्रतीक बाणों से भरा तरकश।

पुनर्वसु नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

के, को, हा और ही — पहले से चौथे चरण तक।

पुनर्वसु का अर्थ क्या है?

पुनः यानी फिर और वसु यानी शुभ, धन या प्रकाश। पुनर्वसु का अर्थ है अच्छे का लौट आना: खोने के बाद फिर पाना, तूफ़ान के बाद फिर उजाला।

गुरु के अन्य नक्षत्र

हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है, एक-एक राशिचक्र के हर तिहाई में। इन तीनों में जन्मे लोगों की विंशोत्तरी दशा गुरु की महादशा से शुरू होती है।

देव गण के अन्य नक्षत्र

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स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • वाल्मीकि रामायण, बालकांड (श्रीराम का जन्म नक्षत्र)

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति