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नक्षत्र · Swati

स्वाति नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और चरण

स्वाति नक्षत्र तुला राशि में 6°40′ से 20° तक फैला है, स्वामी राहु और देवता वायु हैं। जानिए इसका स्वभाव, चारों चरण, नामाक्षर और गुण मिलान में इसकी भूमिका।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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स्वाति नक्षत्र — एक नज़र में

विस्तार (निरयण)
तुला 6°40′–20°
राशिचक्र में
186°40′ – 200°
स्वामी ग्रह
राहु (18 वर्ष की महादशा)
देवता
वायु देव
प्रतीक
हवा में लहराता अंकुर
गण
देव
योनि
महिष (पुरुष)
नाड़ी
अन्त्य (कफ)
नाम अक्षर
रू, रे, रो, ता
क्रम
27 में 15वाँ

चारों चरण

चरणराशि में अंशनवांश राशिअक्षर
1तुला 6°40′–10°धनुरू
2तुला 10°–13°20′मकररे
3तुला 13°20′–16°40′कुंभरो
4तुला 16°40′–20°मीनता
इस पृष्ठ पर

स्वाति 27 नक्षत्रों में पंद्रहवाँ नक्षत्र है, जो निरयण तुला राशि में 6°40′ से 20°00′ तक फैला है; इसका स्वामी राहु और देवता वायु हैं। इसका प्रतीक है हवा में लहराता कोमल अंकुर, और इस नक्षत्र का पूरा स्वभाव इसी चित्र में छिपा है: लचीला, स्वतंत्र, हवा के साथ झुकने वाला, पर जड़ से उखड़ने वाला नहीं।

आकाश में स्वाति को प्रायः स्वाति तारे (पश्चिमी नाम आर्कटुरस) से पहचाना जाता है, जो भारत से दिखने वाले सबसे चमकीले तारों में से एक है। जब कोई कहता है "मेरा नक्षत्र स्वाति है", तो उसका अर्थ प्रायः जन्म नक्षत्र से होता है, यानी जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था। अपना जन्म नक्षत्र मुफ़्त कुंडली से देख सकते हैं।

वायु, राहु और शुक्र का मेल

वायु प्राण हैं, वह श्वास जो हर चीज़ में बहती है। वेदों में वायु को तेज़, पवित्र करने वाला और कभी एक जगह न टिकने वाला देवता कहा गया है। स्वाति वाले लोगों में भी यही बात दिखती है: उन्हें खुली जगह चाहिए, बंधन अच्छा नहीं लगता, और वे बाहर निकलकर, ख़ुद करके सीखते हैं।

नक्षत्र का स्वामी राहु है, जो नई चीज़ों की चाह, जिज्ञासा और परिचित दायरे से बाहर की दुनिया का ग्रह है। राशि स्वामी शुक्र हैं, जो तुला राशि के स्वामी हैं, और तुला व्यापार, संतुलन और न्यायपूर्ण लेन-देन की राशि है। दोनों को मिलाकर तस्वीर बनती है एक ऐसे व्यक्ति की, जो बाहर की दुनिया से जुड़ना चाहता है, पर शालीनता और न्याय की भावना के साथ। पारंपरिक ग्रंथ स्वाति को व्यापार, कूटनीति और मीठी पर असरदार वाणी से जोड़ते हैं।

लोक परंपरा में एक सुंदर मान्यता भी है: स्वाति नक्षत्र में बरसी बूँद सीप में गिरे तो मोती बन जाती है। यह शास्त्र का नियम नहीं, कविता है, पर इस नक्षत्र का भाव इसमें ठीक पकड़ में आता है: धैर्य से साधारण चीज़ का अनमोल बन जाना।

स्वभाव और सीखने की दिशा

स्वाति के सामान्य गुणों में ढल जाने की क्षमता, व्यवहार-कुशलता, व्यापारिक समझ, सीखने का शौक़ और अपनी स्वतंत्रता की गहरी चाह गिनी जाती है। ऐसे लोग अक्सर माहौल को जल्दी भाँप लेते हैं और उसी के अनुसार बात करते हैं, जो बातचीत, बिक्री, अध्यापन और सीमाओं के पार काम करने में बहुत काम आता है।

सीखने की दिशा भी इसी हवा से निकलती है। स्वाति की ऊर्जा कई दिशाओं में बिखर सकती है, जब तक सारे विकल्प खुले दिखें तब तक किसी एक पर टिकना कठिन लग सकता है, या दूसरों की बात मानते-मानते अपनी राय पीछे छूट सकती है। प्रतीक का अंकुर लहराता है, पर उसकी जड़ें होती हैं। परंपरा का संकेत यही है कि कुछ स्थिर प्रतिबद्धताएँ बनाए रखें, ताकि लचीलापन भटकाव न बनकर ताक़त बने।

ये केवल चंद्र नक्षत्र की प्रवृत्तियाँ हैं। कोई एक कारक पूरी कुंडली का फ़ैसला नहीं करता; लग्न, चंद्र राशि, ग्रहों की स्थिति और चल रही दशा सब साथ पढ़े जाते हैं।

गण, योनि और नाड़ी: गुण मिलान में महत्व

गुण मिलान के आठ कूटों में से तीन सीधे नक्षत्र से आते हैं:

  • गण: देव। स्वाति सौम्य नक्षत्रों में गिना जाता है। देव का देव या मनुष्य गण से मेल सहज माना जाता है; देव और राक्षस का मेल कम अंक देता है।
  • योनि: महिष (भैंसा, पुरुष)। इसकी स्त्री योनि हस्त नक्षत्र है। महिष का पारंपरिक वैर अश्व योनि से है (अश्विनी और शतभिषा)।
  • नाड़ी: अन्त्य (कफ)। वर-वधू की नाड़ी एक हो तो इस कूट में शून्य अंक मिलते हैं, हालाँकि ग्रंथ इसके अपवाद भी बताते हैं।

ये अंक बातचीत की शुरुआत हैं, अंतिम निर्णय नहीं। कुंडली मिलान में आठों कूट एक साथ देखे जा सकते हैं।

मुहूर्त में स्वाति

मुहूर्त चिंतामणि स्वाति को चर (चल) नक्षत्रों में रखता है, जिनमें पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा भी हैं। चर नक्षत्र यात्रा आरंभ करने, वाहन ख़रीदने या पहली बार चलाने, घर बदलने, बाग़वानी और ऐसे कामों के लिए अच्छे माने जाते हैं जिनमें गति ही मूल बात हो। नींव रखने जैसे लंबे समय तक स्थिर रहने वाले कामों के लिए इन्हें कम उपयुक्त माना जाता है।

स्वाति के चार चरण

हर चरण 3°20′ का होता है और अलग नवांश राशि में पड़ता है, जो नक्षत्र के फल को अपना रंग देती है।

प्रथम चरण: तुला 6°40′ से 10°00′ (धनु नवांश)

गुरु का नवांश आशावाद, दार्शनिक रुचि और यात्रा व अध्ययन का प्रेम जोड़ता है। इसे स्वाति का सबसे आदर्शवादी भाग कहा जाता है, जो सिद्धांतों और बड़ी तस्वीर पर ध्यान देता है। नामाक्षर: रू।

द्वितीय चरण: तुला 10°00′ से 13°20′ (मकर नवांश)

शनि का नवांश स्वाति को व्यावहारिक और धैर्यवान बनाता है। महत्वाकांक्षा यहाँ स्थिर रहती है; व्यवस्थित काम, व्यापार और लंबी परियोजनाएँ इस चरण को भाती हैं। नामाक्षर: रे।

तृतीय चरण: तुला 13°20′ से 16°40′ (कुंभ नवांश)

यह भी शनि का नवांश है, पर वायु तत्व का, इसलिए यहाँ स्वाति का विचार-प्रेम और स्वतंत्रता सबसे प्रबल होती है। समूह, संपर्क, शोध और लीक से हटकर रास्तों में रुचि आम है। नामाक्षर: रो।

चतुर्थ चरण: तुला 16°40′ से 20°00′ (मीन नवांश)

गुरु का जल तत्व वाला नवांश हवा को कोमल कर देता है। संवेदनशीलता, कल्पना और भक्ति या कला की ओर झुकाव सामने आता है। नामाक्षर: ता।

नवांश राशियाँ गणना से निकली हैं, पर चरणों के स्वभाव-वर्णन पारंपरिक सार हैं; अलग-अलग लेखक इन्हें थोड़ा अलग ढंग से कहते हैं।

स्वाति में ग्रह

स्वाति में दो महत्वपूर्ण बिंदु आते हैं। सूर्य का परम नीच अंश, तुला 10°, इसी नक्षत्र में है। इसलिए यहाँ सूर्य को प्रायः ऐसे व्यक्ति का संकेत माना जाता है जिसका आत्मविश्वास आदेश देने से नहीं, सहयोग से बढ़ता है, ख़ासकर जब नीचभंग की शर्तें पूरी हों। शनि का परम उच्च अंश तुला 20° है, ठीक वहाँ जहाँ स्वाति समाप्त होकर विशाखा शुरू होता है। राशि स्वामी शुक्र का मूलत्रिकोण तुला के पहले 15° में है, इसलिए शुक्र भी यहाँ सहज रहता है।

स्वाति लग्न वाले व्यक्ति प्रायः विनम्र और बात करने में आसान लगते हैं, साथ में घूमने-फिरने की चाह भी दिखती है। स्वाति का चंद्रमा ऐसा मन देता है जिसे विविधता और खुली साँस चाहिए।

जन्म नक्षत्र और दशा

राहु स्वाति का स्वामी है, इसलिए यहाँ चंद्रमा होने पर विंशोत्तरी दशा राहु महादशा से शुरू होती है, फिर गुरु, शनि और आगे का क्रम चलता है। स्वाति से पहले चित्रा और बाद में विशाखा आता है; सभी 27 नक्षत्रों की सूची नक्षत्र परिचय में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वाति नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन है?

विंशोत्तरी पद्धति में स्वाति का स्वामी राहु है। जिसका चंद्रमा स्वाति में हो, उसकी पहली महादशा प्रायः राहु की होती है, जो पूरी 18 वर्ष की है; जन्म के समय कितनी बची है, यह चंद्रमा की नक्षत्र में स्थिति से तय होता है।

स्वाति नक्षत्र किस राशि में आता है?

स्वाति पूरी तरह तुला राशि में है, 6°40′ से 20°00′ तक। इसलिए इसके चारों चरण तुला में ही हैं, जिसके स्वामी शुक्र हैं।

स्वाति नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

उत्तर भारतीय परंपरा में चारों चरणों के अक्षर रू, रे, रो और ता हैं। जिस चरण में चंद्रमा हो, उसी अक्षर से नाम रखने की परंपरा है।

क्या स्वाति नक्षत्र यात्रा के लिए शुभ है?

मुहूर्त ग्रंथ स्वाति को चर नक्षत्रों में गिनते हैं, जो यात्रा आरंभ करने और गति से जुड़े कामों के लिए अनुकूल माने जाते हैं। फिर भी सही मुहूर्त में तिथि, वार, लग्न और पूरा पंचांग देखा जाता है।

राहु के अन्य नक्षत्र

हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है, एक-एक राशिचक्र के हर तिहाई में। इन तीनों में जन्मे लोगों की विंशोत्तरी दशा राहु की महादशा से शुरू होती है।

देव गण के अन्य नक्षत्र

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • तैत्तिरीय ब्राह्मण (नक्षत्र देवता)

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति