रोहिणी चौथा नक्षत्र है, जो निरयण वृषभ राशि के 10° से 23°20′ तक फैला है और इसका स्वामी चंद्रमा है। इसके देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा (प्रजापति) हैं और प्रतीक बैलगाड़ी या रथ, इसलिए रोहिणी वृद्धि, उर्वरता, सौंदर्य और अच्छी तरह सींची गई धरती की भरपूरी का नक्षत्र है।
नाम का अर्थ है "लाल वाली" या "जो उगती और बढ़ती है"। आकाश में इसकी पहचान वृषभ तारामंडल के मुख पर चमकने वाला लालिमा लिए तारा है। 27 नक्षत्रों में परंपरा आकर्षण और समृद्धि को सबसे अधिक रोहिणी से ही जोड़ती है।
अपने घर में चंद्रमा
रोहिणी पूरी तरह वृषभ राशि में है, जो शुक्र की स्थिर, पृथ्वी तत्व वाली राशि है। चंद्रमा वृषभ में उच्च का होता है और उसका मूलत्रिकोण वृषभ के 3° से 30° तक है, यानी पूरी रोहिणी उसके भीतर है। चंद्रमा के लिए इतनी सहज स्थितियाँ कम हैं: नक्षत्र उसका अपना, राशि उसकी उच्च की, और राशि स्वामी शुक्र सुख और सौंदर्य का प्रेमी।
रोहिणी की ख्याति इसी मेल से समझ आती है। चंद्रमा और शुक्र मिलकर भावनात्मक गर्मजोशी, रसिकता, सौंदर्य-प्रेम और लोगों को सहज महसूस कराने का गुण देते हैं। वृषभ की स्थिर धरती इसमें धैर्य और सुरक्षा की गहरी चाह जोड़ती है।
चंद्रमा हस्त और श्रवण का भी स्वामी है। तीनों में रोहिणी सबसे रसिक है, हस्त हाथ के हुनर में सबसे आगे, और श्रवण सबसे ध्यान से सुनने वाला।
कथा: चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी
पुराणों में दक्ष प्रजापति अपनी 27 पुत्रियों, यानी नक्षत्रों, का विवाह चंद्रमा से करते हैं। चंद्रमा सबसे अधिक रोहिणी को चाहते हैं और उन्हीं के पास रहते हैं। बाक़ी बहनें पिता से शिकायत करती हैं और दक्ष चंद्रमा को क्षय का शाप देते हैं। शाप कम तो होता है पर मिटता नहीं, इसलिए चंद्रमा हर महीने घटते-बढ़ते हैं और बारी-बारी से हर पत्नी के पास जाते हैं।
ज्योतिषी इसमें दो बातें पढ़ते हैं। पहली, रोहिणी का सहज आकर्षण, जो लोगों और ध्यान को अपने आप खींच लेता है। दूसरी, मोह और अधिकार-भाव के प्रति सावधानी, क्योंकि पूरी कथा पक्षपात और ईर्ष्या से चलती है। एक भक्ति का संबंध भी है: परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, जिसे जन्माष्टमी पर कई परिवार याद करते हैं।
देवता ब्रह्मा सृजन का भाव जोड़ते हैं। रोहिणी हर अर्थ में उर्वर है: संतान, फ़सल, कला, धन और विचार, सब यहाँ फलते हैं।
प्रतीक: बैलगाड़ी
बैलगाड़ी धीरे चलती है पर बहुत कुछ ढोती है, जैसे मंडी जाती फ़सल या सफ़र पर निकला परिवार। यह व्यापार, खेती, स्थिर प्रगति और यात्रा के आराम का प्रतीक है, और वृषभ से पूरी तरह मेल खाता है: कुछ भी जल्दबाज़ी में नहीं, सब कुछ उपजाऊ।
गण, योनि और नाड़ी
रोहिणी मनुष्य गण का है, स्वभाव से मानवीय और सांसारिक। इसकी योनि सर्प (नर) है, जिसकी जोड़ी अगले नक्षत्र मृगशिरा की मादा सर्प योनि से बनती है। इसकी नाड़ी अन्त्य (कफ) है, पड़ोसी कृत्तिका जैसी।
गुण मिलान में योनि सहज और शारीरिक अनुकूलता मापती है (4 गुण), गण स्वभाव (6) और नाड़ी सबसे भारी कूट है (8)। दोनों की नाड़ी अन्त्य हो तो अपवाद न लगने पर नाड़ी में शून्य मिलता है। प्रचलित अपवाद हैं: नक्षत्र एक पर राशि अलग, या राशि एक पर नक्षत्र अलग। फिर भी कोई एक बात कुंडली का फ़ैसला नहीं करती; अच्छा मिलान दोनों की पूरी कुंडली से पढ़ा जाता है।
मुहूर्त में स्वभाव: ध्रुव (स्थिर)
रोहिणी उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा और उत्तरा भाद्रपद के साथ चार ध्रुव नक्षत्रों में है। मुहूर्त चिंतामणि इन्हें उन कामों के लिए अच्छा मानता है जो टिकें और लंबे चलें: नींव रखना, भवन निर्माण, गृह प्रवेश, पेड़ लगाना और बीज बोना, देव-प्रतिष्ठा, और लंबे समझौते। गृह प्रवेश का मुहूर्त प्रायः इन्हीं में से किसी पर पड़ता है।
स्वभाव
चंद्रमा रोहिणी में हो तो मन प्रायः स्नेही, स्थिर, कद्रदान और सृजनशील होता है। आम ख़ूबियाँ हैं: आकर्षण, कलात्मक रुचि, वफ़ादारी, धैर्य, चीज़ों को पनपाने का हुनर (बाग़, व्यापार, परिवार), और भोजन, संगीत, सज्जा या आतिथ्य में सच्ची कुशलता।
विकास की दिशाएँ सुख की छाया से आती हैं: अधिकार-भाव, ईर्ष्या, बदलाव का विरोध, अति-भोग और बार-बार भरोसा पाने की ज़रूरत। रोहिणी तब सबसे अच्छा करती है जब उसकी सुरक्षा की चाह दूसरों की आज़ादी के लिए भी जगह छोड़े।
रोहिणी के चारों चरण
अश्विनी की तरह रोहिणी के चार चरण भी मेष से कर्क तक के नवांश दोहराते हैं।
पहला चरण: वृषभ 10° से 13°20′ (मेष नवांश)
मंगल का नवांश रोहिणी को जोश और पहल देता है। यह चरण बाक़ियों से अधिक मुखर और प्रतिस्पर्धी है, अपने आकर्षण को लक्ष्य पाने में लगाता है।
दूसरा चरण: वृषभ 13°20′ से 16°40′ (वृषभ नवांश)
राशि और नवांश दोनों वृषभ, इसलिए यह चरण वर्गोत्तम है, रोहिणी का असली केंद्र। रसिक, धैर्यवान, भौतिक रूप से सक्षम, और सुख-सौंदर्य से गहरा जुड़ाव।
तीसरा चरण: वृषभ 16°40′ से 20° (मिथुन नवांश)
बुध का नवांश हाज़िरजवाबी, बातचीत और बहुमुखी प्रतिभा जोड़ता है। व्यापार, लेखन, मीडिया और शब्दों वाली कलाओं के लिए अनुकूल; हल्का और मिलनसार।
चौथा चरण: वृषभ 20° से 23°20′ (कर्क नवांश)
चंद्रमा का अपना नवांश इसे सबसे भावुक और पालन करने वाला चरण बनाता है: परिवार-केंद्रित, अंतर्ज्ञानी, स्नेही, और भावनाओं की गहरी याद रखने वाला।
नामाक्षर
रोहिणी के नामाक्षर हैं ओ, वा, वी और वू।
चंद्रमा, लग्न या ग्रह रोहिणी में
- चंद्रमा रोहिणी में: जीवन चंद्रमा की 10 वर्ष की महादशा से खुलता है, शेष भाग चंद्रमा के अंश पर निर्भर। मन प्रायः शांत और ग्रहणशील।
- लग्न रोहिणी में: आकर्षक, सुखद उपस्थिति; अक्सर मधुर आवाज़ या याद रह जाने वाली आँखें।
- ग्रह रोहिणी में: यहाँ बैठे ग्रह रोहिणी की उर्वरता और रुचि ले लेते हैं, और अपनी दशा में ठोस, टिकाऊ फल देने की ओर झुकते हैं।
अपना जन्म नक्षत्र मुफ़्त कुंडली से देखिए। पास के पन्ने: पहले कृत्तिका, आगे मृगशिरा, या नक्षत्रों का परिचय।