श्रवण सत्ताईस नक्षत्रों में बाईसवाँ है और निरयन राशिचक्र में 280° से 293°20′ तक, यानी मकर राशि के 10° से 23°20′ तक फैला है। इसका स्वामी चंद्रमा है, देवता भगवान विष्णु हैं, और इसका नाम संस्कृत धातु "श्रु" (सुनना) से बना है — यह सुनने और ग्रहण करने का नक्षत्र है।
यह पूरी तरह मकर राशि में है, जिसका स्वामी शनि है। इस तरह एक धैर्यवान, व्यवस्थित राशि और एक संवेदनशील, भावुक ग्रह यहाँ मिलते हैं। परंपरागत वर्णन में श्रवण का जातक ध्यान से सीखता है और फिर उस सीख को धीरे-धीरे, टिकाऊ ढंग से काम में लाता है।
कथा: वामन के तीन पग
श्रवण के देवता विष्णु हैं, और इसका एक प्रतीक — तीन असमान पदचिह्न — वामन अवतार की याद दिलाता है। विष्णु ने बौने ब्राह्मण बालक का रूप लेकर दानी राजा बलि से केवल तीन पग भूमि माँगी, और फिर विराट रूप धरकर धरती, आकाश और स्वर्ग तीनों नाप लिए। कथा का सार है — छोटा-सा निवेदन, बड़ी दृष्टि, और बिना शोर के व्यवस्था का लौटना।
दूसरा प्रतीक कान है। लिखने की परंपरा से पहले भारत में ज्ञान "श्रुति" के रूप में, सुनकर आगे बढ़ता था। श्रवण इसी परंपरा का नक्षत्र है: सुनना, याद रखना, पाठ करना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना। श्रावण मास का नाम भी इसी नक्षत्र से जुड़ा है, क्योंकि उस मास की पूर्णिमा प्रायः श्रवण के आसपास पड़ती है। केरल में ओणम का पर्व चिंगम मास के "तिरुवोणम" यानी श्रवण नक्षत्र के दिन मनाया जाता है।
श्रवण से ठीक पहले अभिजित आता है — वह "अट्ठाईसवाँ नक्षत्र" जिसे कुछ मुहूर्त-पद्धतियाँ उत्तराषाढ़ा के अंतिम भाग और श्रवण के आरंभ के बीच गिनती हैं। विंशोत्तरी दशा में इसका उपयोग नहीं होता, पर मुहूर्त-विचार में श्रवण के आरंभ का विशेष महत्व इसी कारण है।
गण, योनि और नाड़ी
श्रवण देव गण, वानर योनि (स्त्री) और अन्त्य (कफ) नाड़ी का नक्षत्र है। गुण मिलान में ये तीनों काम आते हैं:
- गण स्वभाव बताता है। दो देव गण नक्षत्र सहज मेल खाते हैं; देव और राक्षस गण के मेल में इस कूट के अंक सबसे कम आते हैं।
- योनि सहज प्रवृत्ति और दैहिक अनुकूलता का संकेत है। वानर का परंपरागत बैर मेढ़े (मेष योनि) से माना गया है, इसलिए ऐसे जोड़े में यह एक अंक कम आता है।
- नाड़ी का भार सबसे अधिक है — 36 में से 8 अंक। दोनों की नाड़ी एक ही (अन्त्य) हो तो परंपरा ये अंक नहीं देती, हालाँकि शास्त्र इसके अपवाद भी बताते हैं।
इनमें से कोई एक बात विवाह का फ़ैसला नहीं करती; दोनों कुंडलियाँ पूरी पढ़ी जाती हैं। कुंडली मिलान में हर कूट अलग-अलग दिखता है।
मुहूर्त में श्रवण
मुहूर्त चिंतामणि श्रवण को चर (चल) नक्षत्रों में रखता है — स्वाति, पुनर्वसु, धनिष्ठा और शतभिषा के साथ। चर नक्षत्र उन कामों के लिए अच्छे माने गए हैं जिनमें गति या बदलाव हो: यात्रा आरंभ करना, वाहन लेना, घर बदलना, बाग़ लगाना या नई पढ़ाई शुरू करना। विष्णु से संबंध के कारण कथा-श्रवण, पाठ, प्रवचन और विद्यारंभ के लिए भी इसे प्रिय माना जाता है।
स्वभाव
श्रवण के जातक प्रायः ध्यान से सुनने वाले, शिष्ट और जानकारी जल्दी ग्रहण करने वाले बताए जाते हैं। चंद्रमा स्मृति और संवेदना देता है, मकर अनुशासन और कर्तव्य-बोध। दोनों मिलकर ऐसा विद्यार्थी बनाते हैं जो ध्यान से नोट्स लेता है और आगे चलकर ऐसा शिक्षक बनता है जिसे हर शिष्य का नाम याद रहता है।
परंपरा, पुराने तौर-तरीक़ों और समाज को जोड़े रखने में इनकी रुचि दिखती है। लोग इनके सामने खुलकर बात करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई सचमुच सुन रहा है।
विकास का क्षेत्र इसी गुण का दूसरा पहलू है। दूसरों की राय को बहुत गहराई से ले लेना, प्रतिष्ठा की चिंता करना, या अपनी बात तब तक न कहना जब तक वह पूरी तरह पक्की न लगे — ये प्रवृत्तियाँ दिख सकती हैं। सुनने के साथ बोलना सीखना, और हर आलोचना को फ़ैसला न मानना, इस नक्षत्र की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति लाता है।
चारों चरण
हर चरण 3°20′ का है और उसकी अपनी नवांश राशि होती है। श्रवण के चरणों की नवांश राशियाँ मेष से कर्क तक हैं।
पहला चरण — मकर 10° से 13°20′ (मेष नवांश)
मंगल का नवांश पहले चरण को पहल और उत्साह देता है। यह सबसे कर्मठ श्रवण है — सीखी बात पर तुरंत अमल, महत्वाकांक्षा, और धीमी प्रक्रियाओं से कभी-कभी अधीरता। मकर में मंगल उच्च का होता है, इसलिए यह चरण व्यावहारिक और ऊर्जावान माना जाता है।
दूसरा चरण — मकर 13°20′ से 16°40′ (वृषभ नवांश)
शुक्र का नवांश स्थिरता, सुख-सुविधा की चाह और संगीत व मधुर वाणी का प्रेम लाता है। यह चरण धीरज से, धीरे-धीरे भौतिक सुरक्षा बनाने से जुड़ा है।
तीसरा चरण — मकर 16°40′ से 20° (मिथुन नवांश)
बुध का नवांश श्रवण के संवाद-पक्ष को तेज़ करता है। लेखन, अध्यापन, भाषाएँ, शोध और व्यापार यहाँ सहज बैठते हैं; मन जिज्ञासु है और विचारों को जोड़ने में फुर्तीला।
चौथा चरण — मकर 20° से 23°20′ (कर्क नवांश)
कर्क चंद्रमा की अपनी राशि है, इसलिए नक्षत्र-स्वामी का स्वभाव यहाँ सबसे प्रबल है। यह चरण सबसे भावुक और संरक्षक है — परिवार, घर और देखभाल की भूमिकाओं की ओर झुका हुआ, वातावरण के प्रति संवेदनशील।
नामाक्षर
इस साइट पर अपनाई गई नामाक्षर परंपरा में श्रवण के चारों चरणों के अक्षर हैं — खी, खू, खे, खो। जैसे, चंद्रमा श्रवण के दूसरे चरण में हो तो परंपरा से नाम "खू" से आरंभ होगा। क्षेत्रीय सूचियाँ थोड़ी भिन्न होती हैं, इसलिए कई परिवार अपनी कुल-परंपरा मानते हैं।
चंद्र, लग्न और ग्रह श्रवण में
जन्म-चंद्र श्रवण में हो तो यही जन्म नक्षत्र है, और पहली महादशा चंद्रमा की चलती है। चंद्रमा यहाँ शनि की राशि मकर में है, इसलिए भावनाएँ दिखावटी कम, स्थिर अधिक होती हैं।
लग्न श्रवण में हो तो चंद्रमा शरीर और व्यक्तित्व का अहम सूचक बन जाता है, और मकर का व्यवस्थित ढंग व्यक्ति के बाहरी व्यवहार में झलकता है।
श्रवण में बैठे ग्रह इसका सुनने-सीखने वाला रंग ले लेते हैं। बुध यहाँ अध्ययन और वाणी को बल देता है; गुरु मकर में नीच का है, पर नीचभंग की शर्तें देखना ज़रूरी है, और प्रायः ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग का संकेत मिलता है; मकर में उच्च का मंगल अनुशासित परिश्रम देता है।
आपका चंद्रमा और लग्न किस नक्षत्र में है, यह देखने के लिए मुफ़्त कुंडली बनाइए। आगे पढ़ने के लिए श्रवण के बाद आने वाला धनिष्ठा नक्षत्र और सभी 27 नक्षत्रों का परिचय देखें।