कृत्तिका तीसरा नक्षत्र है, जो निरयण राशिचक्र में मेष के 26°40′ से वृषभ के 10° तक फैला है और इसका स्वामी सूर्य है। इसके देवता अग्नि हैं और प्रतीक उस्तरा या अग्नि-शिखा। यह काटने, पकाने और शुद्ध करने का नक्षत्र है, यानी कच्ची चीज़ को काम लायक़ बनाने का।
आकाश में कृत्तिका वही छोटा, चमकीला तारा-समूह है जिसे अंग्रेज़ी में प्लीएडीज़ कहते हैं। पुरानी वैदिक सूचियों में नक्षत्रों की गिनती अश्विनी से नहीं, कृत्तिका से शुरू होती थी। कार्तिक मास का नाम भी इसी से है, क्योंकि उस महीने की पूर्णिमा कृत्तिका के पास पड़ती है।
दो राशियों में बँटा नक्षत्र
कृत्तिका उन नक्षत्रों में है जो राशि की सीमा पार करते हैं। पहला चरण अग्नि तत्व की मेष राशि में है, दूसरा, तीसरा और चौथा पृथ्वी तत्व की वृषभ राशि में। व्यवहार में यह अंतर बड़ा है। पहले चरण में चंद्रमा हो तो चंद्र राशि मेष होगी (मंगल की, तेज़ और सीधी)। दूसरे से चौथे चरण में चंद्र राशि वृषभ होगी (शुक्र की, स्थिर और रसिक)। कृत्तिका का मूल स्वभाव वही रहता है, पर राशि उसके प्रकट होने का ढंग बदल देती है।
नक्षत्र स्वामी सूर्य कृत्तिका को गरिमा, आत्मसम्मान और चमकने की चाह देता है। सूर्य उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा का भी स्वामी है, और तीनों में सिद्धांतप्रियता और कुछ अधिकार भरा स्वर मिलता है।
एक शास्त्रीय बात: चंद्रमा का परम उच्च अंश 3° वृषभ है, जो कृत्तिका के दूसरे चरण में पड़ता है। वहाँ चंद्रमा बलवान और सुस्थित माना जाता है, फिर भी उसे राशि स्वामी शुक्र और बाक़ी कुंडली के साथ ही पढ़ा जाता है।
अग्नि और छह माताएँ
अग्नि यज्ञ की आग हैं, जो आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं। आग पकाती है, पचाती है, शुद्ध करती है, प्रकाश देती है, और जलाती भी है। कृत्तिका में ये सारे अर्थ हैं। इसके जातकों को प्रायः तीखा, ईमानदार और सच-झूठ को जल्दी अलग कर लेने वाला बताया जाता है।
सबसे प्रसिद्ध कथा कार्तिकेय (स्कंद) की है। शिशु कार्तिकेय को छह कृत्तिका बहनों ने पाला, और उन्हीं के नाम पर वे कार्तिकेय कहलाए। इसलिए कृत्तिका में एक पालने-बचाने वाला, दृढ़ माँ जैसा पक्ष भी है। शतपथ ब्राह्मण एक और परंपरा बताता है जिसमें कृत्तिकाएँ सप्तर्षियों की पत्नियों से जुड़ी हैं। अलग ग्रंथ कथा अलग ढंग से कहते हैं, और दोनों रूप साहित्य में मिलते हैं।
प्रतीक: उस्तरा या अग्नि-शिखा
उस्तरा साफ़ काटता है: छाँटता है, आकार देता है, फ़ालतू हटाता है। लौ अशुद्धि को जला देती है। दोनों विवेक, स्पष्टता और परखने की क्षमता की ओर इशारा करते हैं। कृत्तिका वालों की नज़र भी तेज़ होती है और ज़बान भी। सही उपयोग हो तो यह ईमानदार राय, बारीकी और ऊँचे मानक बनती है; लापरवाही में यह चुभते शब्द बन जाती है।
गण, योनि और नाड़ी
कृत्तिका राक्षस गण का नक्षत्र है। मिलान की भाषा में इसका अर्थ है स्वतंत्र, दृढ़ और अपनी रक्षा ख़ुद करने वाला स्वभाव। इसकी योनि मेष यानी मेढ़ा (मादा) है, जिसकी जोड़ी पुष्य (नर) से बनती है, और नाड़ी अन्त्य (कफ) है।
अष्टकूट गुण मिलान में गण के 6 गुण हैं, और राक्षस का देव या मनुष्य से मेल कुछ स्थितियों में कम अंक देता है। नाड़ी के 8 गुण हैं। दूसरे अन्त्य नाड़ी नक्षत्र हैं: रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण और रेवती। कोई एक बात कुंडली का फ़ैसला नहीं करती; मिलान दोनों की पूरी कुंडली से पढ़ा जाता है। हर कूट और उसके अपवाद कुंडली मिलान में देखिए।
मुहूर्त में स्वभाव: मिश्र
मुहूर्त चिंतामणि कृत्तिका को विशाखा के साथ मिश्र (कुछ ग्रंथों में साधारण) वर्ग में रखता है। परंपरा इन्हें रोज़मर्रा के सामान्य कामों और अग्नि, ताप व धातु से जुड़े कामों के लिए लेती है, जैसे रसोई, धातु का काम, अग्निहोत्र आरंभ। ये न विशेष कोमल हैं, न विशेष कठोर।
स्वभाव
चंद्रमा कृत्तिका में हो तो मन प्रायः स्वाभिमानी, सिद्धांतवादी और दृढ़ होता है। ख़ूबियाँ हैं: साहस, मेहनत, ईमानदारी, परिवार के लिए रक्षा का भाव, और किसी भी चीज़ को निखारने का हुनर, चाहे भोजन हो, शब्द हों या कोई शिल्प। मानक और परख माँगने वाली भूमिकाओं में कृत्तिका वाले प्रायः अच्छा करते हैं।
विकास की दिशाएँ हैं: जल्दी ग़ुस्सा, कड़वी वाणी, ऐसा अहं जिसे माफ़ी माँगना कठिन लगे, और रिश्ता सुधारने की बजाय काट देने की आदत। जो आग शुद्ध करती है वह झुलसा भी सकती है; इसलिए गर्मजोशी ही यहाँ का पाठ है।
कृत्तिका के चारों चरण
कृत्तिका के नवांश धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं, यानी नवांश के पहले चक्र की अंतिम चार राशियाँ।
पहला चरण: मेष 26°40′ से 30° (धनु नवांश)
राशि मेष और नवांश गुरु की धनु। यह चरण आदर्शवादी, साहसी और उदार है, जिसमें सिखाने या किसी उद्देश्य के लिए लड़ने की प्रवृत्ति है। चारों में सबसे अग्निमय।
दूसरा चरण: वृषभ 0° से 3°20′ (मकर नवांश)
शनि का पृथ्वी तत्व वाला नवांश कृत्तिका को अनुशासित, महत्वाकांक्षी और व्यावहारिक बनाता है। मेहनत से, धीरे-धीरे निर्माण। चंद्रमा का उच्च अंश इसी चरण में है।
तीसरा चरण: वृषभ 3°20′ से 6°40′ (कुंभ नवांश)
यह भी शनि का नवांश है, पर वायु तत्व का। अधिक सामाजिक और विचार-प्रधान, समूह, न्याय और सुधार की चिंता करने वाला। कभी अलग-थलग या लीक से हटकर।
चौथा चरण: वृषभ 6°40′ से 10° (मीन नवांश)
गुरु का जलीय नवांश उस्तरे की धार नरम कर देता है। यह चरण अधिक करुणामय, कल्पनाशील और भक्तिभाव वाला है; इसकी आग सेवा और आस्था की ओर मुड़ती है।
नामाक्षर
कृत्तिका के नामाक्षर हैं अ, ई, उ और ए, हर चरण का एक।
चंद्रमा, लग्न या ग्रह कृत्तिका में
- चंद्रमा कृत्तिका में: जीवन सूर्य की 6 वर्ष की महादशा से शुरू होता है; शेष भाग चंद्रमा के ठीक अंश पर निर्भर है।
- लग्न कृत्तिका में: गरिमामय, सीधा व्यक्तित्व। लग्न मेष है या वृषभ, इससे रंग काफ़ी बदल जाता है।
- ग्रह कृत्तिका में: यहाँ बैठे ग्रह एकाग्रता और ताप पाते हैं और अपनी दशा में सूर्य जैसा रंग दिखाते हैं।
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