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नक्षत्र · Mula

मूल नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और चरण

मूल नक्षत्र धनु राशि में 0° से 13°20′ तक है, स्वामी केतु और देवी निऋति हैं। जानिए इसका अर्थ, चारों चरण, नामाक्षर, गंडांत और गुण मिलान की बातें।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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मूल नक्षत्र — एक नज़र में

विस्तार (निरयण)
धनु 0°–13°20′
राशिचक्र में
240° – 253°20′
स्वामी ग्रह
केतु (7 वर्ष की महादशा)
देवता
निऋति, विघटन की देवी
प्रतीक
बँधी हुई जड़ों का गुच्छा
गण
राक्षस
योनि
श्वान (पुरुष)
नाड़ी
आदि (वात)
नाम अक्षर
ये, यो, भा, भी
क्रम
27 में 19वाँ

चारों चरण

चरणराशि में अंशनवांश राशिअक्षर
1धनु 0°–3°20′मेषये
2धनु 3°20′–6°40′वृषभयो
3धनु 6°40′–10°मिथुनभा
4धनु 10°–13°20′कर्कभी

यह नक्षत्र जल और अग्नि राशि की संधि पर है, इसलिए इसका एक छोर गण्डान्त कहलाता है। यह परंपरा का एक विचार-बिंदु है, भय का कारण नहीं।

इस पृष्ठ पर

मूल उन्नीसवाँ नक्षत्र है, जो निरयण धनु राशि में 0°00′ से 13°20′ तक फैला है; इसका स्वामी केतु है और अधिष्ठात्री देवी निऋति, जो विघटन की देवी हैं। "मूल" का अर्थ है जड़, और इसका प्रतीक बँधी हुई जड़ों का गुच्छा है: पौधे का वह भाग जो दिखता नहीं, पर सब कुछ थामे रहता है, और जहाँ तक आप पूरी गहराई तक खोदकर ही पहुँचते हैं।

मूल से राशिचक्र का अंतिम तिहाई भाग शुरू होता है, और साथ ही अग्नि तत्व की धनु राशि। आकाश में इसे प्रायः वृश्चिक तारामंडल की मुड़ी हुई पूँछ और डंक वाले तारों से पहचाना जाता है, जो हमारी आकाशगंगा के चमकीले केंद्र की दिशा में है। बहुत से लोग मूल के बारे में इसलिए खोजते हैं कि उन्होंने इसके बारे में डराने वाली बातें सुनी हैं; यह पृष्ठ शांति से बताता है कि परंपरा वास्तव में क्या कहती है।

निऋति और मिटाने का काम

निऋति एक प्राचीन और अनोखी वैदिक देवी हैं। अधिकांश देवता वृद्धि, व्यवस्था और लाभ के स्वामी हैं, पर निऋति उसकी अधिष्ठात्री हैं जो बिखरता है: क्षय, विघटन, रूपों का अंत। वैदिक कर्मकांड उनका आह्वान उन्हें विदा करने के लिए करता है, और मूल को लेकर बहुत-सी चिंता इसी छवि से आती है।

ध्यान से देखें तो निऋति आवश्यक हैं। जहाँ पुराना हटाया न गया हो, वहाँ नया नहीं उगता, और जड़ें उसी से पोषण पाती हैं जो टूटकर मिट्टी बना। मूल जड़ तक पहुँचने का नक्षत्र है: शोध, जाँच, दर्शन, विरासत में मिली मान्यताओं पर प्रश्न, और किसी चीज़ को उखाड़कर फिर से शुरू करने का साहस। बाद की कुछ परंपराएँ मूल को माँ काली के रक्षक रूप से जोड़ती हैं, और भारत के कुछ भागों में नवरात्रि की सरस्वती पूजा चंद्रमा के मूल नक्षत्र में आने से तय होती है, जो याद दिलाता है कि परंपरा इस नक्षत्र को विद्या से भी जोड़ती है।

गुरु की राशि में केतु

नक्षत्र स्वामी केतु वैराग्य, पूर्वजन्म के कौशल, आध्यात्मिक खोज और भ्रम को काटने वाला ग्रह है। राशि स्वामी गुरु हैं, जिनका मूलत्रिकोण धनु के पहले 10° में है, इसलिए मूल का अधिकांश भाग गुरु के सबसे बली क्षेत्र में है। यह मेल उन लोगों को भाता है जो सुविधा से ज़्यादा सत्य चाहते हैं: साधक, शोधकर्ता, शिक्षक, वकील, धरती और वनस्पतियों से जुड़े लोग, और हर वह व्यक्ति जिसे मूल सिद्धांतों से शुरू करना हो।

केतु की उच्च राशि पर मतभेद है। अनेक ग्रंथ इसे वृश्चिक मानते हैं; कुछ धनु, जिससे मूल केतु के लिए और भी सहज हो जाता है। यह विवादित बिंदु है, और मूल का फल इस पर टिका नहीं होना चाहिए।

स्वभाव और सीखने की दिशा

सामान्य ख़ूबियाँ: ईमानदारी, स्वतंत्रता, लगन, गहरी खोज, जो काम न आए उसे छोड़ देने की तैयारी, और उथल-पुथल के बाद फिर खड़े होने का बल। बहुत से मूल वाले इतने स्पष्टवादी होते हैं कि बात रूखी लगे, और वे शिष्टाचार से ऊपर सच्चाई को रखते हैं।

सीखने की दिशा, प्रवृत्तियों के रूप में: धीमी प्रक्रियाओं से अधीरता, विकल्प तैयार होने से पहले ही पुराना ढहा देने की आदत, बेचैनी, और कभी-कभी जड़ से उखड़ जाने का भाव। परिपक्व मूल यह सीखता है कि खरपतवार उखाड़ना और पूरा बाग़ उखाड़ देना अलग-अलग काम हैं।

याद रखें, कोई एक कारक कुंडली का फ़ैसला नहीं करता। लग्न, ग्रह, भाव और चल रही दशा सब साथ पढ़े जाते हैं।

गण, योनि और नाड़ी

  • गण: राक्षस, जो मिलान में तीव्र और स्व-निर्देशित स्वभाव बताता है; राक्षस-राक्षस मेल सहज माना जाता है।
  • योनि: श्वान (पुरुष)। स्त्री श्वान योनि आर्द्रा है। श्वान का पारंपरिक वैर मृग योनि (अनुराधा और ज्येष्ठा) से है, इसलिए मिलान में मूल और उसके पड़ोसी ज्येष्ठा को योनि कूट में कम अंक मिलते हैं।
  • नाड़ी: आदि (वात)।

ये गुण मिलान के आठ कूटों में से तीन हैं, और आठों कुंडली मिलान में दिखते हैं।

मुहूर्त में मूल

मूल चार तीक्ष्ण नक्षत्रों में से एक है; बाक़ी हैं आर्द्रा, आश्लेषा और ज्येष्ठा। मुहूर्त चिंतामणि इन्हें निर्णायक कामों के लिए रखता है: समाप्त करना, अलग होना, उखाड़ना, बाधाओं का सामना और कठोर साधना। विवाह जैसी कोमल शुरुआतों के लिए प्रायः दूसरे नक्षत्र चुने जाते हैं।

मूल के चार चरण

प्रथम चरण: धनु 0°00′ से 3°20′ (मेष नवांश)

मंगल का नवांश सबसे साहसी, सबसे अगुआ मूल देता है, जो तुरंत कदम उठाता है और फिर से शुरू करने से नहीं डरता। यही गंडांत चरण है। नामाक्षर: ये।

द्वितीय चरण: धनु 3°20′ से 6°40′ (वृषभ नवांश)

शुक्र का नवांश मूल को स्थिर करता है और उसकी खोज को व्यावहारिक, भौतिक चीज़ों की ओर मोड़ता है: साधन, भूमि, शिल्प और सुख-सुविधा। नामाक्षर: यो।

तृतीय चरण: धनु 6°40′ से 10°00′ (मिथुन नवांश)

बुध का नवांश इसे सबसे बौद्धिक चरण बनाता है: जिज्ञासु, बातूनी, पढ़ाई और तर्क का प्रेमी, एक साथ कई रुचियों वाला। नामाक्षर: भा।

चतुर्थ चरण: धनु 10°00′ से 13°20′ (कर्क नवांश)

चंद्रमा का नवांश मूल में भावना, रक्षा का भाव और घर-परिवार से गहरा लगाव जोड़ता है, जो कभी-कभी उखाड़ने की प्रवृत्ति से खिंचाव पैदा करता है। नामाक्षर: भी।

नवांश राशियाँ गणना से निकली हैं; चरणों के वर्णन पारंपरिक सार हैं और लेखकों के बीच भिन्न हैं।

गंडांत और "मूल में जन्म"

मूल का पहला चरण और ज्येष्ठा का अंतिम चरण मिलकर वृश्चिक-धनु गंडांत बनाते हैं, वह संधि जहाँ जल राशि अग्नि राशि को जगह देती है। भारत के कुछ भागों में लोक परंपरा मूल के कुछ चरणों में जन्मे बच्चे को लेकर, प्रायः परिवार के संबंध में, चिंताएँ भी जोड़ती है। ये मान्यताएँ क्षेत्रीय हैं और जगह-जगह बहुत भिन्न हैं, और जो ज्योतिषी इन्हें मानते हैं वे भी चरण, जन्म का समय और बाक़ी कुंडली जैसे कारक साथ में तौलते हैं। कुछ परिवार पारंपरिक शांति की रीति निभाते हैं; यह सांस्कृतिक चुनाव है, कुंडली की अनिवार्यता नहीं, और मूल में जन्म डरने का कारण नहीं है।

मूल में ग्रह

गुरु मूल के पहले तीन चरणों में अपने मूलत्रिकोण क्षेत्र में है और प्रायः बली माना जाता है। केतु अपने ही नक्षत्र में केंद्रित और भेदक माना जाता है। मूल में सूर्य अपने मित्र की अग्नि राशि में है। मूल लग्न प्रायः सीधा, खोजी स्वभाव देता है।

जन्म नक्षत्र और दशा

मूल का चंद्रमा विंशोत्तरी दशा को केतु से शुरू करता है, फिर शुक्र, सूर्य और आगे। इसके पड़ोसी ज्येष्ठा और पूर्वाषाढ़ा हैं। अपना नक्षत्र और चरण मुफ़्त कुंडली में देखें, या पूरा नक्षत्र परिचय पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मूल नक्षत्र का स्वामी कौन है?

केतु। मूल में चंद्रमा हो तो जीवन केतु महादशा से शुरू होता है, जो पूरी केवल 7 वर्ष की है (इससे छोटी केवल सूर्य की 6 वर्ष की दशा है), इसलिए अगली शुक्र महादशा अक्सर बचपन में ही आ जाती है।

क्या मूल नक्षत्र अशुभ है?

कोई नक्षत्र अपने आप में अशुभ नहीं होता। मूल जड़, सत्य और नई शुरुआत का तीक्ष्ण नक्षत्र है, और इसका पहला चरण गंडांत संधि है जिसे परंपरा अधिक ध्यान से पढ़ती है। फल पूरी कुंडली से तय होता है।

मूल नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

उत्तर भारतीय परंपरा में चारों चरणों के अक्षर ये, यो, भा और भी हैं।

मूल नक्षत्र किस राशि में है?

धनु राशि में। इसके चारों चरण धनु के 0° से 13°20′ के बीच हैं, जिसके स्वामी गुरु हैं।

केतु के अन्य नक्षत्र

हर ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है, एक-एक राशिचक्र के हर तिहाई में। इन तीनों में जन्मे लोगों की विंशोत्तरी दशा केतु की महादशा से शुरू होती है।

राक्षस गण के अन्य नक्षत्र

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
  • मुहूर्त चिंतामणि
  • तैत्तिरीय ब्राह्मण (नक्षत्र देवता)

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति