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ग्रह · Jupiter in the 4th house

चतुर्थ भाव में गुरु: घर, माता और मन की शांति

चतुर्थ भाव में गुरु: घर, माता, विद्या और सुख के केंद्र में बृहस्पति, किन लग्नों में हंस योग, अष्टम, दशम और द्वादश पर दृष्टि, और गुरु की दशा।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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चतुर्थ भाव में गुरु — एक नज़र में

भाव का विषय
माता, घर, भूमि, वाहन, मन का सुख, विद्यालयी शिक्षा
ग्रह का कारकत्व
ज्ञान, गुरु, संतान, धर्म, भाग्य, पति (स्त्री की कुंडली में), धन
भाव का वर्ग
केंद्र
दिग्बल
मध्यम
हर लग्न के लिए चतुर्थ भाव में गुरु
लग्नइस भाव की राशिबलस्वामित्व के भावविशेष
मेषकर्कउच्च9वाँ, 12वाँहंस योग
वृषभसिंहमित्र राशि8वाँ, 11वाँ—
मिथुनकन्याशत्रु राशि7वाँ, 10वाँ—
कर्कतुलाशत्रु राशि6वाँ, 9वाँ—
सिंहवृश्चिकमित्र राशि5वाँ, 8वाँ—
कन्याधनुस्वराशि4वाँ, 7वाँहंस योग
तुलामकरनीच3वाँ, 6वाँ—
वृश्चिककुंभसम राशि2वाँ, 5वाँ—
धनुमीनस्वराशि1वाँ, 4वाँहंस योग
मकरमेषमित्र राशि3वाँ, 12वाँ—
कुंभवृषभशत्रु राशि2वाँ, 11वाँ—
मीनमिथुनशत्रु राशि1वाँ, 10वाँ—

भाव पूर्ण राशि पद्धति से लग्न से गिने गए हैं। मूलत्रिकोण अंशों पर निर्भर है, इसलिए स्वराशि में उसे अलग नहीं दिखाया गया।

इस पृष्ठ पर

चतुर्थ भाव में गुरु का अर्थ है ज्ञान, आस्था और संरक्षण के ग्रह का माता, घर, भूमि, वाहन, आरंभिक शिक्षा और मन के संतोष वाले भाव में बैठना। परंपरा ऐसे व्यक्ति के निजी जीवन की नींव शांत मानती है: ऐसा घर जहाँ पढ़ाई या श्रद्धा का माहौल हो, और ऐसा मन जो उथल-पुथल की जगह ठहरना पसंद करे।

यहाँ भाव लग्न से पूरी राशि के हिसाब से गिने जाते हैं, यानी लग्न से चौथी राशि ही आपका चतुर्थ भाव है। बहुत से ज्योतिषी दूसरी दृष्टि के लिए कुंडली को चंद्र राशि से भी दोबारा पढ़ते हैं।

सुख भाव में देवगुरु

चतुर्थ भाव को सुख भाव कहते हैं। यह वह ज़मीन है जिस पर व्यक्ति खड़ा है: माँ और उनसे मिला संस्कार, पैतृक घर, अचल संपत्ति, स्कूली पढ़ाई और भीतर का चैन। गुरु जिस चीज़ को छूता है, उसे विस्तार और अर्थ देता है। इस भाव में यह प्रायः ऐसे दिखता है:

  • घर ही पहली पाठशाला। परिवार में किताबें, बड़े-बुज़ुर्ग, पूजा-पाठ या चर्चा का वातावरण रहता है। ऐसे कई लोग कहते हैं कि उनकी असली शिक्षा घर से शुरू हुई।
  • मार्गदर्शक माँ। परंपरा शुभ चतुर्थ को स्नेही, सिद्धांतवादी या विदुषी माता से, या माँ के साथ गहरे जुड़ाव से जोड़ती है।
  • संतोष। सुख का सीधा अर्थ प्रसन्नता है। यहाँ गुरु को ऐसी भीतरी स्थिरता माना जाता है जो पूरी तरह बाहरी हालात पर निर्भर नहीं करती।
  • संपत्ति और सुविधा। भूमि, मकान और वाहन चतुर्थ भाव के विषय हैं, और गुरु इन्हें धीरे-धीरे, अक्सर जीवन के उत्तरार्ध में, बढ़ाता है।

चतुर्थ भाव केंद्र है, इसलिए यहाँ बैठा गुरु कुंडली में प्रमुख रहता है। केंद्र में शुभ ग्रह को शास्त्रीय रूप से बल का स्रोत माना गया है, और इसी कारण यह स्थिति दिग्बल के बिना भी सराही जाती है। गुरु का दिग्बल प्रथम भाव में है; चतुर्थ वह दिशा है जहाँ चंद्रमा और शुक्र दिग्बल पाते हैं। गुरु इस भाव का कारक भी नहीं है, कारक चंद्रमा है। कालपुरुष की चौथी राशि कर्क है, जो गुरु की उच्च राशि है, इसलिए यह भाव स्वभाव से ही गुरु के अनुकूल है।

राशि से फल कैसे बदलता है

चतुर्थ केंद्र है, इसलिए यहाँ उच्च या स्वराशि का गुरु हंस योग बनाता है:

  • मेष लग्न: चतुर्थ में कर्क है और गुरु उच्च का है। हंस योग बनता है। गुरु नवम और द्वादश का स्वामी है, इसलिए घर में भाग्य और आध्यात्मिक झुकाव दोनों आते हैं।
  • कन्या लग्न: चतुर्थ में धनु है, गुरु की स्वराशि और मूलत्रिकोण। हंस योग बनता है। यहाँ गुरु चतुर्थ और सप्तम, दो केंद्रों का स्वामी है, इसलिए केंद्राधिपति दोष मानने वाले ज्योतिषी प्रशंसा कुछ संयम से करते हैं; दूसरे इसे बहुत बली चतुर्थ मानते हैं।
  • धनु लग्न: चतुर्थ में मीन है, गुरु की स्वराशि, और गुरु स्वयं लग्नेश भी है। हंस योग बनता है, और व्यक्ति की पहचान घर और विद्या में गहरी जड़ें जमाए रहती है।
  • तुला लग्न: चतुर्थ में मकर है, जहाँ गुरु नीच का है, और यह तृतीय तथा षष्ठ का स्वामी है। नीचभंग की स्थितियाँ इसे बदल सकती हैं, और बहुत कुछ राशि के स्वामी शनि पर टिका है।

मंगल और सूर्य की राशियों (वृश्चिक, मेष, सिंह) में गुरु सहज रहता है। मिथुन, कन्या, वृषभ और तुला में वह शत्रु के घर में है, और घर का वातावरण भक्ति से अधिक बौद्धिक या सुख-सुविधा की ओर झुका हो सकता है।

चतुर्थ से गुरु की दृष्टि

चतुर्थ से गुरु की तीनों पूर्ण दृष्टियाँ उन भावों पर पड़ती हैं जिन्हें सँभालना सामान्यतः कठिन होता है:

  • अष्टम भाव (पाँचवीं दृष्टि): आयु, गुप्त बातें, विरासत और अचानक बदलाव। यहाँ गुरु की नज़र परंपरा में रक्षा-कवच मानी जाती है, और यह पैतृक घर को विरासत की संपत्ति से जोड़ सकती है।
  • दशम भाव (सातवीं दृष्टि): ठीक सामने का भाव, कर्म और प्रतिष्ठा। स्थिर घर सार्वजनिक काम को सहारा देता है, और व्यक्ति की साख अक्सर उसकी ईमानदारी पर टिकी होती है।
  • द्वादश भाव (नौवीं दृष्टि): व्यय, दूर देश, नींद और मोक्ष। द्वादश पर शुभ दृष्टि को अच्छे कामों पर ख़र्च, चैन की नींद या आध्यात्मिक रुझान के रूप में पढ़ा जाता है।

यानी जिन तीन भावों को गुरु देखता है, उनमें से दो दुःस्थान हैं, जहाँ उसकी उपस्थिति विशेष रूप से स्वागत योग्य है।

चतुर्थेश और गुरु का अपना स्वामित्व

गुरु के साथ-साथ चतुर्थ राशि का स्वामी भी भाव को चलाता है; जैसे गुरु वृषभ में हो, तो शुक्र की स्थिति सुख-सुविधा और वाहन के बारे में बहुत कुछ तय करती है। फिर देखिए कि आपके लग्न के लिए गुरु किन भावों का स्वामी है:

  • सिंह लग्न: गुरु पंचम और अष्टम का स्वामी होकर मित्र राशि वृश्चिक में है। बुद्धि और संतान का विषय घर से जुड़ता है; अष्टमेश होने से पैतृक संपत्ति या निवास-परिवर्तन का प्रसंग भी आ सकता है।
  • वृश्चिक लग्न: गुरु द्वितीय और पंचम का स्वामी होकर शनि की राशि कुंभ में है। कुटुंब का धन और विद्या घर और संपत्ति के मामलों में खिंच आते हैं।
  • मीन लग्न: गुरु लग्नेश और दशमेश होकर बुध की राशि मिथुन में है। घर और कर्म आपस में गुँथे रहते हैं; घर से काम करना या पारिवारिक व्यवसाय इसकी आम व्याख्या है।

गुरु की दशा में

गुरु महादशा, गुरु की अंतर्दशा और चतुर्थेश की दशा में यह स्थिति सबसे अधिक दिखती है। अक्सर उभरने वाले विषय: घर ख़रीदना या सुधारना, वाहन, आगे की पढ़ाई, माँ से निकटता, या किसी बेचैन दौर के बाद मन का शांत होना। विवरण इस पर निर्भर है कि गुरु आपके लग्न के लिए किन भावों का स्वामी है। अपनी अवधियाँ दशा कैलकुलेटर से देखिए।

शास्त्र क्या कहते हैं

यहाँ के सिद्धांत बृहत् पाराशर होरा शास्त्र से हैं: चतुर्थ भाव माता, सुख, वाहन और भूमि का, केंद्र कुंडली के स्तंभ, गुरु की विशेष दृष्टियाँ और हंस योग। भाव-दर-भाव फल बताने वाले पुराने आचार्य चतुर्थ गुरु का वर्णन उदारता से करते हैं: सुख-सुविधा, वाहन, अच्छी माता और मित्र, और संतुष्ट मन। वे ग्रह को अकेले पढ़ते हैं; चतुर्थेश, चंद्रमा और कोई पीड़ा हो तो उसे साथ में तौलना अब भी ज़रूरी है।

आम भूलें

  • संपत्ति को पक्का मान लेना। यह स्थिति घर में स्थिरता की प्रवृत्ति बताती है, कोई निश्चित मकान या तारीख़ नहीं।
  • कारक को भूल जाना। माता और मन का मुख्य कारक चंद्रमा है, गुरु नहीं; दोनों को पढ़ना होता है।
  • केंद्राधिपति दोष की बहस को अनदेखा करना। कन्या और मिथुन लग्न में ज्योतिषी इस पर एकमत नहीं कि केंद्रों का स्वामी गुरु कितना शुभ रहता है।
  • केवल चंद्र कुंडली से पढ़ना। चंद्र राशि से देखी कुंडली उपयोगी दूसरी दृष्टि है, लग्न कुंडली का विकल्प नहीं।

इस भाव के ठीक सामने दशम भाव में गुरु है; भाव के अपने कारक के बारे में चतुर्थ भाव में चंद्रमा पढ़ें।

अपनी कुंडली में गुरु देखिए

मुफ़्त कुंडली बनाकर देखिए कि आपके चतुर्थ भाव में कौन-सी राशि है और गुरु वहाँ है या नहीं। भाव लग्न से पूरी राशि के हिसाब से गिने जाते हैं; कुंडली में भाव चलित चक्र भी है, जो भाव-संधि के पास बैठे ग्रह को पड़ोसी भाव में दिखा सकता है, इसलिए गुरु राशि की सीमा के पास हो तो दोनों देख लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या चौथे भाव में गुरु शुभ होता है?

परंपरा इसे आम तौर पर सुखद स्थिति मानती है: घर, माता, शिक्षा और संतोष के केंद्र भाव में एक नैसर्गिक शुभ ग्रह। फिर भी राशि बहुत मायने रखती है; मेष, कन्या और धनु लग्न में यहाँ हंस योग बनता है, जबकि तुला लग्न में गुरु यहाँ नीच का होता है।

चतुर्थ भाव का गुरु घर और संपत्ति के बारे में क्या बताता है?

इसे व्यवस्थित, सँभाले हुए घर, परिवार में विद्या या आस्था के वातावरण और धीरे-धीरे आने वाली संपत्ति से जोड़ा जाता है। इसके साथ चतुर्थेश और भाव के कारक चंद्रमा को भी पढ़ना ज़रूरी है।

क्या चौथे भाव का गुरु हंस योग बनाता है?

केवल तब, जब चतुर्थ में कर्क (मेष लग्न), धनु (कन्या लग्न) या मीन (धनु लग्न) हो। तब गुरु केंद्र में उच्च या स्वराशि का होता है, और यही पंच महापुरुष योगों में से एक, हंस योग की शर्त है।

आगे पढ़ें: गुरु का पूरा परिचय, और चतुर्थ भाव के सभी विषय।

गुरु दूसरे भावों में

चतुर्थ भाव में अन्य ग्रह

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति