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ग्रह · Jupiter in Sagittarius

धनु राशि में गुरु: स्वराशि, मूलत्रिकोण और हंस योग

धनु राशि में गुरु: अपनी राशि में बृहस्पति, 0 से 10 अंश तक मूलत्रिकोण, मूल और दोनों आषाढ़ा, किन लग्नों में हंस योग बनता है, दृष्टियाँ और गोचर।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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धनु राशि में गुरु — एक नज़र में

बल (राशि से)
मूलत्रिकोण 0°–10° · स्वराशि 10°–30°
राशि स्वामी
गुरु — स्वयं (स्वराशि)
तत्त्व · स्वभाव
अग्नि · द्विस्वभाव
कालपुरुष भाव
9वाँ भाव (कालपुरुष कुंडली में)
यहाँ के नक्षत्र
मूल (चारों चरण, केतु); पूर्वाषाढ़ा (चारों चरण, शुक्र); उत्तराषाढ़ा (चरण 1, सूर्य)
यहाँ से दृष्टि
मेष (पाँचवीं), मिथुन (सातवीं), सिंह (नौवीं)
इस राशि में ठहराव
लगभग 13 महीने
सूर्य इस राशि में (निरयण)
15–16 दिसंबर से 14–15 जनवरीपश्चिमी (सायन) Sagittarius: 21–22 नवंबर से 21–22 दिसंबर
महापुरुष योग
हंस योग — इन लग्नों में (राशि केंद्र में): मिथुन, कन्या, धनु, मीन

राशियाँ निरयण (लाहिड़ी अयनांश) हैं। ठहराव और तिथियाँ हमारे गणना इंजन से (17 बार के औसत से) हैं; सूर्य की तिथियाँ 2000–2050 के बीच की सबसे पहली और सबसे बाद की तिथि हैं।

गुरु कब धनु राशि में रहता है

पिछली बार
29 मार्च 2019 – 20 नवंबर 2020वक्री गति के कारण भागों में: 29 मार्च 2019 – 23 अप्रैल 2019; 5 नवंबर 2019 – 30 मार्च 2020; 30 जून 2020 – 20 नवंबर 2020
अगली बार
17 फ़रवरी 2031 – 23 अक्टूबर 2032वक्री गति के कारण भागों में: 17 फ़रवरी 2031 – 14 जून 2031; 15 अक्टूबर 2031 – 5 मार्च 2032; 12 अगस्त 2032 – 23 अक्टूबर 2032
7 बार का पूरा क्रम (1990–2070)
  • 7 दिसंबर 1995 – 26 दिसंबर 1996
  • 22 नवंबर 2007 – 9 दिसंबर 2008
  • 29 मार्च 2019 – 20 नवंबर 2020वक्री गति के कारण भागों में: 29 मार्च 2019 – 23 अप्रैल 2019; 5 नवंबर 2019 – 30 मार्च 2020; 30 जून 2020 – 20 नवंबर 2020
  • 17 फ़रवरी 2031 – 23 अक्टूबर 2032वक्री गति के कारण भागों में: 17 फ़रवरी 2031 – 14 जून 2031; 15 अक्टूबर 2031 – 5 मार्च 2032; 12 अगस्त 2032 – 23 अक्टूबर 2032
  • 27 जनवरी 2043 – 16 फ़रवरी 2044वक्री गति के कारण भागों में: 27 जनवरी 2043 – 30 जुलाई 2043; 11 सितंबर 2043 – 16 फ़रवरी 2044
  • 11 जनवरी 2055 – 31 जनवरी 2056
  • 26 दिसंबर 2066 – 16 जनवरी 2068

तिथियाँ भारतीय मानक समय में, निरयण राशि बदलने के दिन की। आज की स्थिति के लिए गुरु गोचर देखें।

इस पृष्ठ पर

यह पृष्ठ निरयण धनु के गुरु के बारे में है, यानी उस धनु के जिसे वैदिक राशिचक्र लाहिड़ी अयनांश से तय करता है और जो पश्चिमी सायन राशियों से करीब 24 अंश पीछे है। इस अंतर के कारण पश्चिमी "सैजिटेरियस" का गुरु अक्सर वैदिक वृश्चिक का होता है, और पश्चिमी मकर का गुरु यहाँ धनु में आ सकता है। धनु राशि में गुरु अपनी राशि में है, और पहले 10 अंशों में मूलत्रिकोण में: धर्म, तीर्थ और उच्च शिक्षा की अग्नि राशि में अपने घर बैठा शिक्षक, जो पूरे राशिचक्र में गुरु की सबसे साफ़ अभिव्यक्तियों में से एक है।

अपने घर में गुरु

धनु अग्नि तत्त्व, द्विस्वभाव, विषम और पुरुष राशि है, कालपुरुष की नौवीं राशि, जिसका अंग जंघाएँ, दिशा पूर्व और प्रतीक आधा मनुष्य, आधा घोड़ा धनुर्धर है। नवम भाव धर्म, पिता, गुरु, लंबी यात्राओं और भाग्य का है। ज्ञान, गुरुजन, धर्म और भाग्य का कारक गुरु ही इस राशि का स्वामी है, इसलिए ग्रह के कारकत्व और राशि का अर्थ लगभग पूरी तरह एक हो जाते हैं।

परंपरा यहाँ प्रायः ये बातें देखती है:

  • उद्देश्य की भावना। जीवन किसी विश्वास, किसी पुकार या सिद्धांतों के समूह के चारों ओर गढ़ा जाता है।
  • शिक्षक और तीर्थयात्री। दर्शन, धर्म, कानून, उच्च शिक्षा, प्रकाशन और ज्ञान के लिए यात्रा बार-बार आने वाले विषय हैं।
  • खुली दृष्टि। आशावाद, स्पष्टवादिता और सद्भाव, कभी-कभी उपदेश देने की आदत के साथ।
  • खोज की स्वतंत्रता। धनुर्धर दूर निशाना साधता है; घोड़े वाला आधा हिस्सा घूमने की जगह चाहता है। कड़े बंधन घुटन दे सकते हैं।

बल: मूलत्रिकोण और स्वराशि

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र गुरु को दो अपनी राशियाँ देता है, धनु और मीन, और उसका मूलत्रिकोण धनु में रखता है। इस साइट के लिए इसका अर्थ है:

  • 0° से 10°: मूलत्रिकोण, जहाँ गुरु सबसे अपने ढंग से काम करता है, बल में केवल उच्च से पीछे।
  • 10° से 30°: स्वराशि, यह भी बली और सहज अवस्था।

कुछ बाद के ग्रंथ मूलत्रिकोण के अंशों की सीमा थोड़ी अलग बताते हैं; पर यह सिद्धांत सबका साझा है कि धनु का आरंभ गुरु का सबसे "आधिकारिक" आसन है।

यहाँ गुरु अपना ही मेज़बान है, इसलिए किसी और को प्रसन्न नहीं करना। प्रश्न कहीं और चला जाता है: आपके लग्न के लिए गुरु किन भावों का स्वामी है, क्या वह अस्त है या पापी दृष्टि में है, और नवांश में उसका बल कैसा है?

मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा

  • मूल (0° से 13°20′, स्वामी केतु): जड़। पूरा मूलत्रिकोण मूल नक्षत्र के भीतर है। यहाँ गुरु मूल सिद्धांतों की खोज, झूठ को जड़ से उखाड़ने की तैयारी और आध्यात्मिक या दार्शनिक नींव में रुचि के रूप में पढ़ा जाता है।
  • पूर्वाषाढ़ा (13°20′ से 26°40′, स्वामी शुक्र): अजेय, शुद्ध करने वाले जल और दृढ़ विश्वास से जुड़ा। यहाँ गुरु प्रभावशाली और आत्मविश्वासी है, और शुक्र वाणी में मिठास जोड़ता है।
  • उत्तराषाढ़ा (26°40′ से 30°, केवल पहला पाद, स्वामी सूर्य): बाद की, टिकाऊ विजय। यहाँ गुरु को सूर्य की स्थिरता और सार्वजनिक कर्तव्य की भावना मिलती है।

हंस योग और लग्न

हंस योग, पंच महापुरुष योगों में से एक, तब बनता है जब गुरु अपनी या उच्च राशि में लग्न से केंद्र में हो। धनु के लिए इसका अर्थ है चार लग्न:

  • धनु लग्न: गुरु प्रथम भाव में है, लग्नेश और चतुर्थेश होकर, दिग्बल के साथ। देखें प्रथम भाव में गुरु।
  • मिथुन लग्न: धनु सप्तम भाव है, और गुरु सप्तम तथा दशम का स्वामी है। हंस योग बनता है, हालाँकि बहुत से ज्योतिषी यहाँ केंद्राधिपति दोष भी तौलते हैं।
  • कन्या लग्न: धनु चतुर्थ भाव है, और गुरु चतुर्थ तथा सप्तम का स्वामी है। फिर हंस योग बनता है, केंद्राधिपति वाले प्रश्न के साथ।
  • मीन लग्न: धनु दशम भाव है, और गुरु प्रथम तथा दशम का स्वामी है: लग्नेश अपनी राशि में कर्म के भाव में।

पंच महापुरुष योग लेख पाँचों योग साथ समझाता है। केंद्रों के बाहर स्वाभाविक पाठ मेष लग्न का है, जहाँ धनु नवम भाव है और नवमेश गुरु भाग्य के अपने ही भाव में बैठा है: देखें नवम भाव में गुरु। सिंह लग्न में धनु पंचम भाव है, और पंचमेश गुरु फिर अपने ही त्रिकोण में है।

दृष्टियाँ

धनु से गुरु की पाँचवीं दृष्टि मेष पर, सातवीं मिथुन पर और नौवीं सिंह पर पड़ती है। बली गुरु की दृष्टि मूल्यवान मानी जाती है, इसलिए आपकी कुंडली में ये राशियाँ जिन भावों में हैं, उन्हें सहारा मिला हुआ पढ़ा जाता है।

अपनी राशि से गुरु का गोचर

गोचर में गुरु सामान्यतः लगभग तेरह महीने धनु में रहता है। कभी वक्री चाल इसे जमने से पहले वापस वृश्चिक में ले जाती है। अवधियाँ ऊपर दी गई हैं; गुरु गोचर पृष्ठ पर इसकी चाल साथ-साथ दिखती है।

जन्म के चंद्रमा से गिनने पर शास्त्रीय शुभ स्थान दूसरा, पाँचवाँ, सातवाँ, नौवाँ और ग्यारहवाँ हैं। गुरु धनु में हो तो ये चंद्र राशियाँ हैं वृश्चिक (दूसरा), सिंह (पाँचवाँ), मिथुन (सातवाँ), मेष (नौवाँ) और कुंभ (ग्यारहवाँ)। अपनी राशि में गोचर करता गुरु प्रायः अपना फल अधिक खुलकर देने वाला बताया जाता है। बाकी चंद्र राशियों के लिए यह वर्ष बस कम उभरा हुआ रहता है। गोचर केवल वही जगाता है जो जन्म कुंडली और चल रही महादशा में पहले से है।

मतभेद और गलत पाठ

  • स्वराशि गारंटी नहीं। अस्त या पापी दृष्टि वाला धनु का गुरु भी कम देता है, और दुःस्थान का स्वामित्व (जैसे वृषभ लग्न में अष्टम, मकर लग्न में द्वादश) उसका रंग बदल देता है।
  • केंद्राधिपति और हंस साथ-साथ। मिथुन और कन्या लग्न में दोनों कैसे मिलते हैं, इस पर परंपराएँ अलग हैं; अधिकतर योग को वास्तविक ही मानती हैं।
  • सायन धनु। पश्चिमी धनु का गुरु अक्सर निरयण वृश्चिक में होता है।

तुलना के लिए गुरु की दूसरी अपनी राशि मीन राशि में गुरु और अगली, नीच राशि मकर राशि में गुरु पढ़ें।

अपनी कुंडली में गुरु देखिए

मुफ़्त कुंडली गुरु की निरयण राशि और सटीक अंश दिखाती है, जिससे पता चलता है कि वह मूलत्रिकोण वाले हिस्से में है या नहीं, साथ ही लग्न से भाव, नक्षत्र और पाद, और यह भी कि हंस योग बनता है या नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धनु में गुरु का मूलत्रिकोण कितने अंश तक है?

निरयण धनु के पहले 10 अंश गुरु का मूलत्रिकोण हैं; 10 से 30 अंश तक यह स्वराशि में है। दोनों बली अवस्थाएँ हैं। मूलत्रिकोण को वह हिस्सा माना जाता है जहाँ गुरु सबसे पूरी तरह अपने स्वभाव में काम करता है, उच्च से एक सीढ़ी नीचे।

धनु के गुरु से किन लग्नों में हंस योग बनता है?

मिथुन, कन्या, धनु और मीन लग्न में, क्योंकि इनके लिए धनु केंद्र है (क्रमशः सप्तम, चतुर्थ, प्रथम और दशम भाव)। बाकी लग्नों में गुरु स्वराशि में तो रहता है, पर योग नहीं बनता।

धनु से गुरु किन राशियों को देखता है?

पाँचवीं दृष्टि मेष पर, सातवीं मिथुन पर और नौवीं सिंह पर। संबंधित भाव आपके लग्न पर निर्भर हैं।

आगे पढ़ें: गुरु का पूरा परिचय, और धनु राशि का स्वभाव।

गुरु दूसरी राशियों में

धनु राशि में अन्य ग्रह

बारह भावों में गुरु

अपनी कुंडली में देखें

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने शास्त्रीय ग्रंथों (मुख्यतः बृहत् पाराशर होरा शास्त्र) के आधार पर लिखा है। जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ हमने यह स्पष्ट कहा है। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति