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त्योहार · 2026

अक्षय तृतीया 2026 — रविवार, 19 अप्रैल 2026

अक्षय तृतीया अक्षय पुण्य का दिन है, जब मान्यता है कि दान और नई शुरुआत का फल कभी घटता नहीं।

2026 में

रविवार, 19 अप्रैल 2026

तिथि
शुक्ल तृतीया (शुक्ल): 19 अप्रैल, 10:49 – 20 अप्रैल, 07:28
चांद्र मास
वैशाख
सूर्योदय / सूर्यास्त
05:51 / 18:49
मुहूर्त और काल
पूजा मुहूर्त10:49 – 12:20
पूर्वाह्न (सूर्योदय से मध्य दिन)05:51 – 12:20

नियम: वैशाख शुक्ल तृतीया जो पूर्वाह्न को छुए; दोनों दिन छुए तो पहला दिन।

2027 में

शनिवार, 8 मई 2027

तिथि
शुक्ल तृतीया (शुक्ल): 8 मई, 11:43 – 9 मई, 09:03
चांद्र मास
वैशाख
सूर्योदय / सूर्यास्त
05:35 / 19:00
मुहूर्त और काल
पूजा मुहूर्त11:43 – 12:17
पूर्वाह्न (सूर्योदय से मध्य दिन)05:35 – 12:17

नियम: वैशाख शुक्ल तृतीया जो पूर्वाह्न को छुए; दोनों दिन छुए तो पहला दिन।

समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर

अक्षय तृतीया क्या है

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है और हिंदू पंचांग के सबसे शुभ दिनों में गिनी जाती है। अक्षय का अर्थ है जिसका क्षय न हो, जो कभी घटे नहीं। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप या कोई नई शुरुआत स्थायी फल देती है। राजस्थान और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इसे आखा तीज भी कहा जाता है।

इस दिन से कई कथाएँ जुड़ी हैं। इसे भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मदिवस माना जाता है। एक परंपरा के अनुसार इसी दिन त्रेता युग आरंभ हुआ, और दूसरी के अनुसार वेदव्यास ने गणेश जी को महाभारत लिखवाना शुरू किया। घरों में सबसे प्रिय कथा सुदामा की है, जो अपने बचपन के मित्र कृष्ण के लिए मुट्ठीभर चिवड़ा लेकर गए और लौटकर अपनी कुटिया बदली हुई पाई; यह कथा धन की नहीं, निःस्वार्थ प्रेम की है।

लोक-मान्यता में अक्षय तृतीया अबूझ मुहूर्त है, यानी पूरा दिन शुभ है और अलग से मुहूर्त निकालने की ज़रूरत नहीं मानी जाती, इसलिए इस दिन बहुत-से विवाह, गृह प्रवेश और नए काम होते हैं। पिछले कुछ दशकों में यह दिन सोना ख़रीदने से ख़ूब जुड़ गया है, पर पुरानी परंपरा दान पर ज़ोर देती है, जैसे गर्मी की शुरुआत में जल, अन्न, पंखे और छाते का दान। गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट भी परंपरा से इसी दिन खुलते हैं।

कैसे मनाया जाता है

  • ज़रूरतमंदों को जल से भरे घड़े, अन्न, फल, वस्त्र, पंखे या छाते का दान।
  • जौ, तुलसी और पीले फूलों के साथ भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा।
  • नया काम शुरू करना, नए बही-खाते खोलना या नए घर में प्रवेश।
  • विवाह संस्कार, क्योंकि लोक-मान्यता में पूरा दिन शुभ है।
  • सोना या चाँदी ख़रीदना, जो आजकल व्यापक रूप से प्रचलित रीति है।
  • राजस्थान और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में किसानों द्वारा प्रतीकात्मक बुवाई से कृषि वर्ष की शुरुआत।
  • गर्मी में सत्तू, ककड़ी और ठंडक देने वाले पदार्थों का भोग और दान।

तिथि कैसे तय होती है

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया है, यानी वैशाख के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि। हमारा पंचांग देखता है कि तृतीया पूर्वाह्न में, यानी सूर्योदय से मध्याह्न तक, मौजूद है या नहीं, क्योंकि परंपरागत रूप से इस दिन की पूजा इसी समय होती है। जिस दिन तृतीया पूर्वाह्न को छूती है, वही अक्षय तृतीया है; यदि लगातार दो दिन ऐसा हो, तो पहला दिन लिया जाता है।

क्षेत्रीय अंतर

राजस्थान और मध्य प्रदेश में इसे आखा तीज कहते हैं और यह विवाहों का पारंपरिक दिन है। ओडिशा में इसी दिन पुरी की रथ यात्रा के रथों का निर्माण शुरू होता है और किसान नई बुवाई आरंभ करते हैं। जैन समुदाय इसे वह दिन मानता है जब प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने लंबे उपवास के बाद इक्षु रस, यानी गन्ने के रस से पारणा किया था। वैशाख शुक्ल पक्ष का नाम पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में एक ही है।

तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अक्षय तृतीया को शुभ क्यों माना जाता है?

अक्षय का अर्थ है जिसका क्षय न हो, और मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कर्म और नई शुरुआत का फल घटता नहीं। यह दिन परशुराम जन्म और अन्य पवित्र प्रसंगों से भी जुड़ा है।

क्या अक्षय तृतीया पर सोना ख़रीदना ज़रूरी है?

नहीं। सोना ख़रीदना आजकल की लोकप्रिय रीति है, पर पुरानी परंपरा ज़रूरतमंदों को जल, अन्न और आवश्यक वस्तुओं के दान पर ज़ोर देती है।

क्या अक्षय तृतीया पर मुहूर्त देखना पड़ता है?

लोक-मान्यता पूरे दिन को अबूझ मुहूर्त मानती है, यानी अलग से समय तय करने की ज़रूरत नहीं। पूजा परंपरागत रूप से पूर्वाह्न में होती है, और हमारा पंचांग भी तिथि तय करने के लिए इसी समय को देखता है।