त्योहार · 2027
बैसाखी 2027 — बुधवार, 14 अप्रैल 2027
बैसाखी, जिसे वैसाखी भी कहते हैं, सूर्य के मेष राशि में प्रवेश और सौर मास वैशाख की शुरुआत का दिन है; पंजाब में यह फ़सल का पर्व है और सिखों के लिए खालसा पंथ की स्थापना का दिन।
2026 में
मंगलवार, 14 अप्रैल 2026
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:56 / 18:46
- संक्रांति क्षण
- 09:32
नियम: जिस दिन सूर्य निरयण मेष में प्रवेश करें (मेष संक्रांति), यदि सूर्यास्त से पहले; नहीं तो अगला दिन।
2027 में
बुधवार, 14 अप्रैल 2027
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:57 / 18:46
- संक्रांति क्षण
- 15:28
नियम: जिस दिन सूर्य निरयण मेष में प्रवेश करें (मेष संक्रांति), यदि सूर्यास्त से पहले; नहीं तो अगला दिन।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
बैसाखी क्या है
बैसाखी एक सौर पर्व है। यह मेष संक्रांति को पड़ती है, यानी वह दिन जब सूर्य निरयण मेष राशि में प्रवेश करता है, जिससे सौर मास वैशाख शुरू होता है और कई भारतीय पंचांगों में सौर नववर्ष भी। क्योंकि यह चंद्रमा के बजाय सूर्य के अनुसार चलती है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में इसकी तारीख़ बहुत कम बदलती है और प्रायः अप्रैल के मध्य में आती है। यही खगोलीय क्षण भारत में दूसरे नामों से भी मनाया जाता है: केरल में विषु, तमिलनाडु में पुथांडु, बंगाल में पोइला बैसाख, असम में बोहाग बिहू और ओडिशा में पणा संक्रांति।
पंजाब और हरियाणा में बैसाखी सबसे पहले फ़सल का पर्व है। रबी की गेहूँ की फ़सल सुनहरी होकर कटने को तैयार खड़ी होती है, और किसान कटाई शुरू करने से पहले इसके लिए धन्यवाद करते हैं। गाँवों के मेले, कुश्ती, भांगड़ा और गिद्धा, नए कपड़े और साझा भोजन इस दिन को भर देते हैं। यह पर्व लंबे समय से मेल-जोल का अवसर रहा है, और तलवंडी साबो जैसे स्थानों और नदी-किनारों पर लगने वाले मेलों में भारी भीड़ जुटती है।
सिखों के लिए वैसाखी का अर्थ और भी गहरा है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु अमरदास जी ने सिखों को वैसाखी पर गुरु के पास एकत्र होने को कहा था, और सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में वैसाखी के इसी समागम में खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने एकत्र संगत से पूछा कि धर्म के लिए अपना शीश कौन अर्पित करेगा। अलग-अलग जातियों और क्षेत्रों से पाँच व्यक्ति एक-एक करके उठे; वे पंज प्यारे कहलाए। गुरु जी ने लोहे के पात्र में खंडे से तैयार अमृत से उन्हें दीक्षा दी, और फिर उन्हीं से स्वयं अमृत ग्रहण किया। खालसा को एक साझा नाम मिला, पुरुषों के लिए सिंह और स्त्रियों के लिए कौर, और एक ऐसी मर्यादा जिसने जाति को पीछे छोड़ दिया।
इसलिए वैसाखी खालसा का जन्मदिन भी है, जो दुनिया भर के गुरुद्वारों में अरदास, कीर्तन और नगर कीर्तन के साथ मनाया जाता है। पंजाब में यह दिन एक और स्मृति भी संजोए है: बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में एक शांतिपूर्ण सभा पर औपनिवेशिक सेना ने गोलियाँ चलाईं, और मारे गए लोगों को शांत सम्मान के साथ याद किया जाता है। फ़सल, आस्था और इतिहास, तीनों इसी एक दिन मिलते हैं।
कैसे मनाया जाता है
- सुबह जल्दी गुरुद्वारे जाना, अक्सर नदी या सरोवर में स्नान के बाद, और कीर्तन व अरदास सुनना।
- कई गुरुद्वारों में अखंड पाठ, यानी गुरु ग्रंथ साहिब का निरंतर पाठ, जिसका समापन इसी दिन होता है।
- नगर कीर्तन, जिसकी अगुवाई पंज प्यारों के रूप में पाँच सिख करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब को सम्मान के साथ ले जाया जाता है।
- कई गुरुद्वारों में इस दिन अमृत संचार, यानी खालसा दीक्षा का आयोजन।
- लंगर, यानी सामुदायिक रसोई, जो हर किसी के लिए खुली रहती है, चाहे उसका धर्म या पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
- गाँवों में गेहूँ की फ़सल के लिए धन्यवाद, मेले, भांगड़ा और गिद्धा, और पड़ोसियों के साथ बाँटा गया पर्व का भोजन।
तिथि कैसे तय होती है
बैसाखी सूर्य के अनुसार चलती है। हमारा पंचांग वह क्षण निकालता है जब सूर्य निरयण मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे मेष संक्रांति कहते हैं। यदि यह क्षण सूर्यास्त से पहले आए, तो बैसाखी उसी दिन होती है; यदि सूर्यास्त के बाद आए, तो अगले दिन। ऊपर दी गई तिथि आपके चुने हुए स्थान के लिए इसी तरह निकाली गई है, इसीलिए यह हर वर्ष लगभग एक ही अंग्रेज़ी तारीख़ के आसपास, एक-आध दिन के अंतर से, रहती है। इसमें कोई तिथि शामिल नहीं होती, क्योंकि यह पर्व चांद्र नहीं, सौर पंचांग का है।
क्षेत्रीय अंतर
बैसाखी सबसे अधिक उत्साह से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और जम्मू में मनाई जाती है, और विदेशों में जहाँ भी पंजाबी और सिख समुदाय रहते हैं; अमृतसर के हरमंदिर साहिब, आनंदपुर साहिब और तलवंडी साबो के तख़्त श्री दमदमा साहिब में बड़े समागम होते हैं। कुछ सिख संस्थाओं और गुरुद्वारों द्वारा अपनाया गया नानकशाही कैलेंडर वैसाखी को अंग्रेज़ी कैलेंडर की एक तय तारीख़ पर रखता है, इसलिए कुछ गुरुद्वारे इसे यहाँ दिए गए सौर दिन से अलग दिन भी मना सकते हैं। हिमाचल और उत्तराखंड में यही संक्रांति बिसु या बिखौती कहलाती है, और नेपाल में इससे विक्रम संवत का नया वर्ष शुरू होता है।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बैसाखी क्यों मनाई जाती है?
बैसाखी पंजाब का फ़सल पर्व है और सौर मास वैशाख की शुरुआत भी। सिखों के लिए यह गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना का दिन भी है, इसलिए यह फ़सल के लिए धन्यवाद और आस्था का उत्सव, दोनों है।
बैसाखी लगभग हमेशा एक ही तारीख़ को क्यों आती है?
क्योंकि यह चांद्र तिथि से नहीं, सूर्य के निरयण मेष राशि में प्रवेश से तय होती है। सौर वर्ष लगभग अंग्रेज़ी वर्ष जितना ही लंबा होता है, इसलिए संक्रांति के सटीक क्षण और सूर्यास्त के अनुसार तारीख़ कभी-कभार ही एक दिन खिसकती है।
आनंदपुर साहिब में वैसाखी के दिन क्या हुआ था?
सिख परंपरा के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह जी ने एकत्र सिखों से पूछा कि धर्म के लिए अपना शीश कौन देगा। पाँच व्यक्ति आगे आए और अमृत से दीक्षित होकर पंज प्यारे बने, जो खालसा के पहले सदस्य थे, और फिर गुरु जी ने स्वयं उनसे अमृत ग्रहण किया।
क्या बैसाखी, विषु और पुथांडु एक ही पर्व हैं?
ये एक ही खगोलीय घटना, यानी सूर्य के मेष राशि में प्रवेश, को चिह्नित करते हैं और एक ही या आसपास के दिनों में पड़ते हैं। हर क्षेत्र इसे अपने ढंग से मनाता है: पंजाब में बैसाखी, केरल में विषु, तमिलनाडु में पुथांडु, बंगाल में पोइला बैसाख और असम में बोहाग बिहू।